केंद्र सरकार ने पिछले महीने नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (एनडीएफबी) के साथ एक राजनीतिक समझौते पर हस्ताक्षर किया है, जो काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। पहली बात यह है कि यह समझौता रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र में खूनी विद्रोह को समाप्त कर सकता है। बोडो पश्चिमी असम के उस क्षेत्र में रहते हैं, जो असम और पूर्वोत्तर के बाकी हिस्सों को भारतीय मुख्यभूमि के बीच लंबा प्रवेश द्वार उपलब्ध कराता है। इसलिए वहां शांति स्थापित होने का मतलब भारत की मुख्यभूमि और पूर्वोत्तर के बीच सुरक्षित संपर्क स्थापित होना है, जो कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ऐक्ट ईस्ट पॉलिसी के लिए सकारात्मक है। दूसरी महत्वपूर्ण बात है कि बोडो समझौता नए राज्यों के निर्माण और क्षेत्रीय पुनर्गठन किए बिना पूर्वोत्तर में जातीय संघर्षों के समाधान के लिए एक उचित मॉडल प्रदान करता है। यह उस क्षेत्र की राजनीतिक स्थिरता के लिए अच्छा संकेत है।
तीसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि चूंकि एनडीएफबी लड़ाकों को म्यांमार में उनके ठिकानों से वापस लाया जा सकता है, इसलिए यह उम्मीद है कि पूर्वोत्तर के अन्य उग्रवादी समूहों को भी, जो उस देश के सीमावर्ती प्रांत सेगैंग में ठिकाना बनाए हुए हैं, वापस लाया जा सकता है और इस तरह नगा विद्रोह जैसे पूर्वोत्तर के अन्य विद्रोहों का समाधान किया जा सकता है। चौथी महत्वपूर्ण बात यह है कि बोडो समझौते से नगालैंड की समस्या का अंतिम निराकरण किया जा सकता है, जो भारतीय जनजातियों के विद्रोह का सबसे पुराना केंद्र है।
इस त्रिपक्षीय समझौते पर असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल, एनडीएफबी के चार गुटों के नेतृत्व, ऑल बोडो स्टुडेंट्स यूनियन (एबीएसयू), गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव सत्येंद्र गर्ग और असम के मुख्य सचिव कुमार संजय कृष्णा ने गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में हस्ताक्षर किए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कई ट्वीट के जरिये इस समझौते पर खुशी जताते हुए कहा कि 'पूर्व में जो लोग सशस्त्र संघर्ष समूहों के साथ जुड़े हुए थे, वे अब मुख्यधारा में शामिल हो रहे हैं और राष्ट्र की प्रगति में योगदान दे रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि बोडो समूहों के साथ हुआ समझौता बोडो लोगों की विशिष्ट संस्कृति को और संरक्षित और लोकप्रिय बनाएगा। उनकी पहुंच कई विकासपरक कार्यक्रमों तक होगी। बोडो लोग अपनी आकांक्षाएं पूरी करें, इसमें मदद करने के लिए हम हरसंभव मदद करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
बोडोलैंड को अब तक बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल (बीटीसी) कहा जाता है, लेकिन इस समझौते के लागू होने पर यह बोडोलैंड टेरिटोरियल रीजन (बीटीआर) हो जाएगा। गृहमंत्री की मौजूदगी में हुए इस समझौते की शर्तों के मुताबिक, बोडोलैंड टेरिटोरियल रीजन को ज्यादा अधिकार दिए जाएंगे। समझौते में बताया गया है कि बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल की मौजूदा 40 सीटों को बढ़ाकर 60 किया जाएगा और इस क्षेत्र में कई नए जिलों का गठन किया जाएगा। गृह विभाग को छोड़कर विधायी, प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार बीटीआर के पास रहेंगे। नए समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद एनडीएफबी के 1,500 से ज्यादा कैडरों ने सशस्त्र आत्मसमर्पण किया, जिन्हें सरकार आर्थिक सहायता प्रदान करेगी।
बोडो असम की सबसे बड़ी जनजाति है, जो ब्रह्मपुत्र नदी घाटी के उत्तरी हिस्से में बसी है। यह जनजाति खुद को असम का मूल निवासी बताती है। एक अनुमान के मुताबिक, बोडो जनजाति असम की आबादी का लगभग 12 फीसदी हिस्सा है। इस जनजाति की यह शिकायत रही है कि असम में उनकी भूमि पर अन्य समुदायों द्वारा अलग-अलग पहचान के साथ कब्जा कर लिया गया है। वर्ष 1966 में बोडो जनजातियों ने प्लेन्स ट्राइबल काउंसिल ऑफ असम (पीटीसीए) का गठन कर एक अलग केंद्र शासित प्रदेश उदयाचल की मांग की थी।
बोडो समझौते के इतिहास पर नजर डालें, तो केंद्र सरकार ने बीते 27 वर्षों के दौरान बोडो जनजातियों के साथ अब तक तीन समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। असम के चरमपंथी गुटों और सरकार के बीच कई झड़पें हो चुकी हैं, जिनमें सैकड़ों लोगों की जानें जा चुकी हैं। ऑल बोडो स्टुडेंट्स यूनियन (एबीएसयू) और केंद्र सरकार के बीच पहले समझौते पर 1993 में हस्ताक्षर किए गए थे। उस समझौते के परिणामस्वरूप कुछ राजनीतिक शक्तियों के साथ एक बोडोलैंड स्वायत्त परिषद का गठन हुआ था। वर्ष 2003 में केंद्र सरकार और बोडो लिबरेरशन टाइगर्स (बीएलटी) नामक चरमपंथी संगठन के बीच दूसरा ससझौता हुआ था। उस समझौते के परिणामस्वरूप चार जिलों-उदलगुड़ी, चिरांग, बाक्सा और कोकराझार-के साथ बोडोलैंड प्रादेशिक परिषद (बीटीसी) का गठन हुआ। इन क्षेत्रों को आमतौर पर बोडोलैंड प्रादेशिक जिला क्षेत्र (बीटीएडी) कहा जाता है।
और तीसरा समझौता अब जाकर नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (एनडीएफबी) के साथ हुआ है। बोडोलैंड प्रादेशिक परिषद (बीटीसी) का गठन भारतीय संविधान की छठी अनुसूची के तहत शिक्षा, बागवानी और वनों जैसे बोडो जनजातियों के मुद्दों की देखभाल के लिए किया गया था। हालांकि पुलिस, सामान्य प्रशासन और राजस्व पर असम सरकार का नियंत्रण है।
बोडो आंदोलन 1980 के दशक के बाद हिंसक हो गया और तीन धाराओं में विभाजित हो गया। पहला समूह एनडीएफबी अपने लिए एक अलग राज्य की मांग कर रहा था। दूसरा समूह बोडो लिबरेशन टाइगर व्यापक स्वायत्तता की मांग कर रहा था और गैर-बोडो समूहों पर निशाना साधता था। जबकि तीसरा समूह ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन ज्यादा राजनीतिक शक्ति और राज्य प्रशासन में संलग्नता की मांग कर रहा था।
इस वर्ष हाल ही जो बोडो समझौता हुआ है, वह काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह सभी हितधारकों और गुटों को एक बाध्यकारी समझौते के दायरे में लाता है, और यह हिंसक गतिविधियों को जारी रखने और किसी भी तरह के सवाल के लिए कोई गुंजाइश नहीं छोड़ता है। यह भारतीय व्यवस्था में एक सह-विकल्प का मॉडल प्रदान करता है, जिसे नगा समस्या के समाधान के लिए अपनाया जा सकता है, जिसके तहत फिर से कई गुटों से निपटा जाना है।