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वे भी भारत का हिस्सा हैं

Sat, 18 Oct 2014 11:52 PM IST
पत्रलेखा चटर्जी
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देश में स्कूल जाने वाला हर बच्चा भारत के 'विविधता में एकता' के नारे को बुलंद करता है। मगर हाल में गुड़गांव और बंगलूरू में जिस तरह के घृणा जनित अपराध सामने आए हैं, उससे साफ होता है कि यह महज 'नारा' बन कर ही रह गया है। ये कोई दूरवर्ती पिछड़े इलाके नहीं हैं।ये वे शहर हैं, जो मॉल और आईटी कंपनियों की तड़क-भड़क के साथ नए वैश्वीकृत भारत का चेहरा बन कर उभरे हैं। फिर भी पिछले दिनों घटित हुई वारदातें इन शहरों के तले पनपते विद्वेष और असहिष्णुता की गवाह हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर वे कौन से हालात होते हैं, जब दो समुदायों के बीच के मतभेद घृणा पैदा करने वाले अपराधों की शक्ल लेते हैं।
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अभी पिछले हफ्ते की बात है, जब बंगलूरू में मणिपुरी विद्यार्थियों और गुड़गांव के सिकंदरपुर क्षेत्र में नगा युवक के साथ स्थानीय लोगों ने बर्बरतापूर्वक मारपीट की। सूत्रों की मानें तो इन दोनों मामलों में नस्लवादी टिप्पणियां भी की गई थीं। गौरतलब है कि बंगलूरू में मणिपुरियों पर इस वजह से हमला हुआ, क्योंकि वे कन्नड़ बोलने में असमर्थ थे। वहीं गुड़गांव में नगालैंड के युवाओं के रूप-रंग और उनके बालों का मजाक बनाया गया। हमलावरों ने एक युवक के बाल काट दिए और कहा, 'उत्तरपूर्व के सभी लोगों को हम एक संदेश देना चाहते हैं। अगर मणिपुर या नगालैंड से तुम लोग यहां आओगे, तो हम तुम्हें मार डालेंगे।' मैं पहले भी कई बार उत्तर पूर्व जा चुकी हूं, और वहां मेरे बहुत-से दोस्त भी हैं। एक लेखिका के तौर पर मैं महसूस करती हूं कि यह कोई पहली बार नहीं हुआ है। ज्यादा समय नहीं हुआ, जब अरुणाचल प्रदेश के एक युवक नीडो तानिया की जघन्य हत्या पर मैंने और दूसरे तमाम लोगों ने अपना रोष जताया था।

सभी को ध्यान होगा कि 29 जनवरी को दिल्ली के व्यस्त माने जाने वाले लाजपत नगर बाजार में कुछ दुकानदारों ने 19 वर्ष के तानिया का उसके भूरे बालों के लिए मजाक बनाया था। उसने भी प्रतिक्रिया दिखाते हुए, कांच के एक काउंटर को तोड़ दिया। बस फिर क्या था, वहां के दुकानदारों ने उसे इतने क्रूरता के साथ पीटा कि अगले ही दिन उसकी मौत्ा हो गई। दिन के समय एक युवक की अंधाधुंध पिटाई की गई, और सब तमाशा देखते रहे। चार लोगों को हिरासत में लिया गया। उत्तर पूर्व के सैकड़ों युवक और युवतियों ने जंतर-मंतर पर धरना दिया, मगर सवाल फिर वही है, क्या लोगों का नजरिया बदला?
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तानिया की मौत से नाराज असम के 21 वर्ष के राष्ट्रीय बॉक्सिंग चैंपियन शिवा थापा कहते हैं, 'देश में कोई मुझे बेगाना न माने, इसके लिए और मुझे क्या करना होगा?' अभी कुछ दिन पहले की बात है, जब दिल्ली में वसंत विहार पुलिस स्टेशन के सामने इकट्ठा हुए कुछ युवाओं से भी मुझे यही सवाल सुनने को मिला। दरअसल, मिजोरम की एक लड़की मुनीरका के पास मृत पाई गई थी, और साफ है कि यह कोई प्राकृतिक मौत नहीं थी। दिल्ली में रहने वाले उत्तर पूर्व के युवा इस मांग के साथ वहां एकत्रित थे, कि उनकी एफआईआर दर्ज की जाए।

दिल्ली में रहने वाले नगालैंड के एक पूर्व विद्यार्थी और कार्यकर्ता चम्बेमो पैटन सवाल उठाते हैं, 'हमेशा चर्चा इस पर क्यों होती है कि हम कितने अलग हैं, हमारे कपड़े और बालों की शैली दूसरों से अलग है। हमने चोल, गुप्त और मौर्यकालीन इतिहास पढ़ा है। आखिर यहां के लोग नगालैंड या दूसरे उत्तर पूर्वी राज्यों के बारे में कितना जानते हैं?' दूसरी ओर स्थानीय लोग हैं, जो पूछते हैं कि उत्तर पूर्व के युवा आखिर दिल्ली, बंगलूरू, गुड़गांव इत्यादि शहरों में आते ही क्यों हैं? इसका जवाब साफ है, 'वे इन शहरों में क्यों न आएं?' भारत में कहीं भी रहना, उनका मौलिक अधिकार है। वे अलग दिख सकते हैं, उनके कपड़े और खान-पान अलग हो सकता है, मगर वे भी उतने ही भारतीय हैं, जितना धोती, मुंडू या लुंगी पहना हुआ कोई व्यक्ति, या रोटी, दोसा या कबाब खाने वाला कोई व्यक्ति। उन्हें भी भारतीय कहलाने का उतना ही हक है, जितना खुद को आर्य या द्रविड़ की तरह दिखने का दावा करने वाले किसी व्यक्ति को।

उत्तर पूर्व के लोगों को भी बदलते भारत का भाग बनने का उतना ही अधिकार है, जितना कि किसी अन्य भारतीय को। पैटन के मुताबिक पूरा जोखिम उन पर ही क्यों होना चाहिए, क्या सिर्फ इसलिए कि वे भी उभरते अवसरों का लाभ उठाना चाहते हैं, खासकर तब जब कि उनके राज्यों में रोजगार की संभावनाएं न के बराबर हैं? मणिपुर के एक शोध छात्र माइकल समजेत्साबम पूछते हैं, ''असहिष्णुता की हिंसक अभिव्यक्तियों के साथ-साथ क्या गहरे तक पैठ जमाए नाराजगी का एक भाव भी है। आखिर क्या वजह है कि मोमोज बेचने वाले पर तो हमला नहीं होता। हमे लेकर भेद-भाव और नस्लवादी टिप्पणियां सामान्य बात है, मगर हमारे साथ हिंसा की असल वजह है कि लोग हमें उठता हुआ नहीं देख पा रहे, और न ही वे अपने विकास की हमारी इच्छा को भी पसंद नहीं कर रहे हैं। इस संदर्भ में हमारे साथ हुई वारदातें सामंती और पुरुष वर्चस्वादी समाज के मापदंडों को चुनौती देते दलितों या किसी महिला पर होने वाले हमलों से अलग नहीं हैं। ''

दरअसल सच यह है कि हम विविधता के सम्मान की बात तो करते हैं, मगर हममें से कई लोग दरअसल समरूपता के जरिये एकता को ज्यादा तवज्जो देते हैं। इसका विरोध होना चाहिए, और यह केवल पुलिस के बस की बात नहीं है। इसमें संदेह नहीं कि अपराधियों को दंड मिलना चाहिए, मगर लोगों को अपना नजरिया भी बदलना होगा। इसके अलावा प्राथमिक स्तर से शिक्षा प्रणाली में बदलाव लाने की भी जरूरत है। स्वतंत्रता संग्राम में उत्तर पूर्व के योगदान के बारे में हम में से कितनों को मालूम है? कितने लोगों को इसकी जानकारी है कि उन्नीसवीं शताब्दी से खासी और गारो नेता अंग्रेजों से लड़ते आए थे। ज्यादातर लोगों को तो उस राज्य की भी कम ही जानकारी है, जहां खासी और गारो जनजातियां रहती हैं। तानिया की हत्या के बाद गठित्ा समिति ने इन सभी मुद्दों पर गौर करते हुए सिफारिश की कि स्वतंत्रता संग्राम में उत्तर पूर्वी लोगों का जो योगदान है, उसे स्कूलों की इतिहास की किताबों में शामिल किया जाए। यह पहला कदम है, जिसे तुरंत उठाने की जरूरत है।
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