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नए कानून में कुछ ‘नया’ नहीं: मौजूदा समय, हालात में आपराधिक कानून कैसे हों? बदलाव के वक्त यह व्यापक सोच जरूरी

पी. चिदंबरम
Updated Tue, 28 Nov 2023 07:35 AM IST

सार

कानूनों में सुधार का मतलब यह नहीं है कि मौजूदा प्रावधानों को ही दोबारा व्यवस्थित कर दिया जाए। बदलाव करते हुए यह व्यापक सोच हमारे सामने होनी चाहिए कि मौजूदा समय और परिस्थिति में आपराधिक कानून कैसे हों।
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P Chidambaram - फोटो : Amar Ujala


देश भर की सैकड़ों अदालतों में रोज इन तीनों कानूनों का इस्तेमाल होता है। हजारों जज और 1,50,000 से अधिक वकील (जिनमें से ज्यादातर फौजदारी मामलों से जुड़े होते हैं) लगभग रोज ही इन तीन कानूनों से गुजरते हैं। हर जज या वकील यह जानता है कि आईपीसी की धारा 302 हत्या के मामले में लगती है। वे जानते हैं कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 25 के तहत किसी पुलिस अधिकारी के सामने दिए गए बयान से अदालत में आरोपी के खिलाफ अपराध तय नहीं होते। वे यह भी जानते हैं कि सीआरपीसी की धारा 437, 438 और 439 में अग्रिम जमानत और जमानत देने के प्रावधान हैं। इन तीनों कानूनों में ऐसे अनेक प्रावधान हैं, जिनके बारे में जजों और वकीलों को गहराई से जानकारी है।


गंवाया सुधार का मौका

कानूनों में सुधार करना अच्छा विचार है, लेकिन सुधार का मतलब यह नहीं है कि मौजूदा प्रावधानों को ही दोबारा व्यवस्थित कर दिया जाए या उनकी फिर से क्रम दिया जाए। बदलाव करते हुए यह व्यापक सोच हमारे सामने होनी चाहिए कि मौजूदा समय और परिस्थिति में आपराधिक कानून कैसा होना चाहिए। निश्चित रूप से कानून को बदले हुए जीवन मूल्यों, आदर्शों, आचार-विचार और आकांक्षाओं के अनुरूप होना चाहिए। आधुनिक अपराध विज्ञान, आपराधिक न्याय शास्त्र तथा सजा व जेलों से जुड़े आधुनिक अध्ययनों के जरूरी हिस्से नए कानून में दिखने ही चाहिए।


पुनर्व्यवस्थित प्रावधान

लेकिन इन तीन विधेयकों में हम क्या पाते हैं? कानून के क्षेत्र के अनेक विद्वानों ने इन तीन विधेयकों की गंभीरता से जांच की है। हम यह पाते हैं कि भारतीय दंड संहिता के 90-95 फीसदी प्रावधान उठाकर नए मसौदे में जोड़ दिए हैं। आईपीसी के 26  में से 18 अध्याय (तीन अध्यायों में सिर्फ एक-एक धाराएं ही थीं) नए विधेयक में ज्यों के त्यों रख दिए गए हैं। स्थायी समिति की रिपोर्ट में भी यह स्वीकारा गया है कि विधेयक में आईपीसी की 511  धाराओं में से 24 को हटा दिया गया है और 22 धाराएं जोड़ी गई हैं-बाकी को जस का तस रखा गया है, हालांकि उन्हें दोबारा व्यवस्थित किया गया है और उनके क्रम बदले गए हैं। जबकि इन बदलावों को आईपीसी में संशोधन करके बहुत आसानी से लागू किया जा सकता था। 


साक्ष्य अधिनियम और सीआरपीसी में भी यही कहानी दोहराई गई। साक्ष्य अधिनियम की सभी 170 धाराओं को नए विधेयक में जोड़ा गया है। ऐसे ही, सीआरपीसी का 95 फीसदी हिस्सा कट-पेस्ट है। जाहिर है, यह पूरी कवायद श्रम, समय और संसाधन की बर्बादी थी। यही नहीं, विधेयक के पारित होने पर कई अनपेक्षित परिणाम होंगे। यह कोई छोटी परेशानी नहीं है कि हजारों जजों,  वकीलों, पुलिस अधिकारियों, कानून के छात्रों-यहां तक कि आम नागरिकों को भी भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। उन्हें कानूनों की फिर से जानकारी हासिल करनी पड़ेगी। जहां तक विधेयकों की विषय-वस्तुओं का सवाल है, तो इनमें कुछ अच्छी चीजें हैं, जिनके बारे में सरकार संसद में बताएगी, लेकिन मैं इन विधेयकों के उन बिंदुओं पर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं, जिनसे सवाल उठते हैं। उनमें से महत्वपूर्ण ये हैं :

  • प्रतिगामी प्रावधान: मृत्युदंड की सजा को खत्म किए जाने की सार्वभौमिक मांग के बावजूद इसे बनाए रखा गया है। बीते छह वर्षों में शीर्ष अदालत ने सिर्फ सात मामलों में मौत की सजा सुनाई है। किसी भी व्यक्ति को सुधार का मौका दिए जाने के नाम पर बगैर जमानत आजीवन कारावास में रखना कहीं ज्यादा सख्त दंड है।
  • व्यभिचार को, जो पति और पत्नी के बीच का मामला माना जाता है, फिर से अपराध की श्रेणी में लाया गया है। इसके आधार पर, पीड़ित पति या पत्नी तलाक के लिए मुकदमा कर सकते हैं। सरकार को उनकी जिंदगी में हस्तक्षेप करने का कोई हक नहीं है। इससे भी बुरा यह है कि आईपीसी की धारा 497, जिसे शीर्ष अदालत ने रद्द कर दिया था, उसे लिंग के प्रति तटस्थता रखते हुए वापस लाया गया है।
  • बगैर कारण बताए, मृत्युदंड या आजीवन कारावास की सजाओं को कम करने या बदलने की कार्यपालिका की शक्ति संविधान के अनुच्छेद-14 का उल्लंघन है। एकांत कारावास एक क्रूर और असामान्य सजा है।
  • कुछ मामलों में अदालत की कार्यवाहियों की मीडिया द्वारा होने वाली रिपोर्टिंग को विधायिका द्वारा रोका जाना असंवैधानिक है। आतंकवाद से जुड़े मामलों को गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत अच्छी तरह से देखा जाता है। इन्हें नई दंड संहिता के तहत लाने की जरूरत नहीं है। इसके अलावा, सहायक सत्र न्यायाधीश के पद को खत्म करना भी सही नहीं है, क्योंकि, इससे सत्र न्यायाधीश पर बोझ बढ़ जाए। इस व्यवस्था में पहली अपील उच्च न्यायालय में होगी, जिससे उच्च न्यायालयों पर भी बोझ बढ़ेगा।
  • हथकड़ी लगाने की अनुमति केवल तभी देनी चाहिए, जब हिरासत में रखा गया व्यक्ति हिंसक हो या उसके भागने की आशंका हो। जिस मजिस्ट्रेट के सामने हिरासत में लिए गए व्यक्ति को रिमांड के लिए लाया जाता है, उसे व्यक्ति की गिरफ्तारी की जरूरत और वैधता को लेकर संतुष्ट होना आवश्यक है। नई अपराध संहिता का खंड 187 (2) पुलिस अधिकारियों और न्यायाधीशों के बीच गलत धारणा पैदा करता है कि गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को पुलिस या न्यायिक हिरासत में भेजा जाना चाहिए। मुझे न्यायमूर्ति कुष्णा अय्यर की वह चेतावनी याद आती है कि मजिस्ट्रेट 'किसी हिरासत की जरूरत नहीं' के तीसरे विकल्प की अनदेखी करते हैं। खंड 254 जांच अधिकारी को श्रव्य-दृश्य माध्यमों से गवाही देने की अनुमति देता है, खुले सार्वजनिक न्यायालय में निष्पक्ष कार्यवाही के सिद्धांत का स्पष्ट उल्लंघन है। नया विधेयक यह स्पष्ट करने में विफल है कि 'जमानत नियम है, जबकि कारागार अपवाद है।' नतीजतन, खंड 482 प्रतिगामी है।
  • सरकार की मंशा तो मैकाले और जेम्स स्टीफन की तरह कुछ ऐतिहासिक बदलाव लाने की थी, लेकिन ज्यादातर मौजूदा कानूनों को कॉपी, कट और पेस्ट करने से कथित बदलाव महज दो औपनिवेशिक हस्तियों को श्रद्धांजलि बन कर रह गए हैं।
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