फिल्म को कामयाब बनाने में आधी भूमिका पार्श्व ध्वनि की होती है। साउंड इंजीनियर लॉन एलेन के लिए तो जैसे पूरी दुनिया इसी ध्वनि तक सिमट जाती है। अपनी इसी प्रतिभा की बदौलत इन्होंने 5 बार एकेडमी अवार्ड जीते हैं। स्टार वार्स, ए क्लॉकवाइज ऑरेंज और सुपरमैन जैसी कामयाब फिल्में इनके नाम हैं।
हॉलीवुड में साउंड इंजीनियरिंग से जुड़ी तमाम तकनीकें ईजाद करने वाले 73 वर्षीय एलेन कुछ दिन पहले हिंदुस्तान के दौरे पर थे। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई के फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कई ध्वनि विशेषज्ञों से उन्होंने मुलाकात की और यहां साउंड तकनीक में हो रहे प्रयोगों को जाना।
यह बात दीगर है कि हिंदुस्तान की फिल्म इंडस्ट्री तकनीक के मामले में बहुत पीछे है, लेकिन लॉन एलेन कहते हैं, 'सीखने के लिए मैं किसी को भी गुरु बना सकता हूं।' आज भी स्टार वार्स में 'ओबी वेन केनोबी' का किरदार निभाने वाले एलेक गिनेस की आवाज याद कर उनके रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उन्हें याद आता है कि फिल्म में केनोबी किस तरह ल्यूक स्काइवॉकर को बताता है कि साम्राज्य से पहले, अंधेरा होने से पहले वक्त कैसा था।
1969 में वह हॉलीवुड से जुड़े। उस समय में हॉलीवुड की फिल्मों में ध्वनि वास्तविकता से काफी दूर होती थी। तब एलेन की कोशिश यही होती कि ध्वनि यथासंभव हकीकत के करीब रहे। फिलहाल वह अमेरिका की डॉल्बी लेबोरेटरीज के वाइस प्रेसिडेंट हैं।
उनका मानना है, 'ध्वनि की भूमिका दृश्यों के साथ मिलकर फिल्म को बेहतरीन बनाना है। इसका मतलब यह नहीं कि दर्शक सिर्फ ध्वनि की तारीफ कर सिनेमा हॉल से भाग जाएं। जब मैं स्टार वार्स (1977) में काम कर रहा था, तब मैंने जॉर्ज लुकस को पुराने बूम माइक के इस्तेमाल की सलाह दी थी। सोच यह थी कि लेपल माइक से आने वाली खराब ध्वनि रिकॉर्ड करने से बचा जाए।'
उस समय में सबसे बड़ा बदलाव था नए मल्टी चैनल डॉल्बी स्टूडियो में ध्वनि रिकॉर्ड कराना। इसे छोटे थिएटरों में पुराने मोनो साउंड सिस्टम के साथ भी इस्तेमाल किया जा सकता था। एलेन और उनकी टीम ने 40 से ज्यादा थिएटरों को अपना साउंड सिस्टम सुधारने के लिए राजी कर लिया था।
इससे ध्वनि की गुणवत्ता में काफी सुधार आया। स्टार वार्स और क्लोज एनकाउंटर्स ऑफ द थर्ड काइंड की कामयाबी के बलबूते और भी तकनीकें ईजाद हुईं। एलेन का जोर हमेशा ऐसी तकनीक पर रहा जो पुरानी व्यवस्था में भी काम कर सके। अपने मनमाफिक बदलाव लाने के लिए उन्हें थिएटर मालिकों के साथ काफी मशक्कत करनी पड़ी।
कभी यूनिवर्सल स्टूडियो के वाइस प्रेसिडेंट ने उन्हें यह कहते हुए बाहर कर दिया कि उनकी कहानी तो अच्छी है लेकिन सिनेमा में ध्वनि नहीं, टिकट बिकने से पैसे आते हैं। लेकिन इसके बाद एलेन रुके नहीं। लगातार साउंड को लेकर रिसर्च करते रहे।
1986 में डॉल्बी साउंड और 1992 में डॉल्बी डिजिटल के आविष्कार का श्रेय एलेन और उनकी टीम को ही जाता है। मोशन पिक्चर्स में रे डॉल्बी के साथ ध्वनि के लिए सराहनीय काम करने पर एलेन को ऑस्कर से भी सम्मानित किया गया है।
अब एलेन भारत में फिल्म निर्माताओं को नए एटमस सराउंड सिस्टम के बारे में बता रहे हैं जिससे ध्वनि बिल्कुल वास्तविक लगती है। वे बताते हैं, 'शहर की सड़कों पर हो-हल्ला, चहल-पहल, फेरीवालों का शोर सभी तरह की ध्वनियां बनाई जा सकती हैं। साउंड की नई तकनीक से किसी भी दृश्य को और भी प्रभावशाली ढंग से दिखाया जा सकता है।'
एक नजर में:
हॉलीवुड में 1920 से मोनो साउंड ट्रैक रहा है। 1970 में डॉल्बी स्टीरियो ने इसकी जगह ले ली। 1990 से डिजिटल साउंड सिस्टम का प्रयोग हो रहा है।
--ए क्लॉकवाइज ऑरेंज (1971)-ऐसी पहली फिल्म है, जिसमें शोरशराबा कम करने के लिए तकनीक का सहारा लिया गया। यह फिल्म पारंपरिक मोनो ऑप्टिकल साउंडट्रैक के साथ रिलीज हुई।
--रोबोकॉप (1987) पॉल वरहॉयन निर्देशित इस साइंस फिक्शन फिल्म में पहली बार डॉल्बी स्टीरियो साउंड का प्रयोग किया गया।
--बैटमैन रिटर्न्स (1992) टिम बर्टन की सुपरहीरो वाली इस फिल्म में पहली बार डॉल्बी स्टीरियो डिजिटल तकनीक का प्रयोग हुआ।
--स्टार वार्स एपिसोड1-द फैंटम मीनेस (1999) इस साइंस-फिक्शन थ्रिलर में डॉल्बी डिजिटल साउंड एक्स तकनीक प्रयोग हुई जबकि जुरासिकपार्क (1993) में डीटीएस तकनीक इस्तेमाल हुई।