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स्वास्थ्य: चिकित्सकों की कमी से बड़ी कोई बीमारी नहीं, सीटें बढ़ाने से नहीं सधेगी व्यवस्था

विजय त्रिपाठी
Updated Tue, 30 Sep 2025 07:55 AM IST

सार

उत्तर प्रदेश में स्वीकृत चिकित्सकों की संख्या का 55 फीसदी ही उपलब्ध है। क्या वजह है कि ग्रामीण इलाके लगातार चिकित्सकों के अकाल से जूझ रहे हैं?
 
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सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : Freepik


सरकारी मेडिकल कॉलेजों में कहीं 20, तो कहीं 50 फीसदी तक चिकित्सा शिक्षकों के पद खाली हैं। छोटे-छोटे शहरों को तो छोड़ ही दीजिए, राजधानी लखनऊ में डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान में 37, केजीएमयू में 20, तो पीजीआई में 16 फीसदी पद खाली हैं। डॉक्टरों की कमी का सबसे बड़ा कारण सरकारी अस्पतालों में काम का बहुत ज्यादा दबाव और उस हिसाब से कम वेतन है। क्वालिटी डॉक्टरों की एक बड़ी फौज बाबूगीरी में भी फंसी है। सरकारी क्षेत्र का खराब बुनियादी ढांचा, पदोन्नति की धीमी प्रक्रिया, और डॉक्टरों की उपलब्धता के लिए पर्याप्त प्रयास न होना भी इस समस्या को बढ़ाते हैं। प्रांतीय चिकित्सा सेवा संवर्ग में करीब 19,700 डॉक्टर तैनात हैं और करीब सात हजार से अधिक पद खाली हैं।


इंडियन पब्लिक हेल्थ स्टैंडर्ड के मुताबिक, एक हजार की आबादी पर एक डॉक्टर जरूरी है। उत्तर प्रदेश इस लक्ष्य से कोसों दूर है। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) ने यह सुविधा दे दी है कि करीब 15 साल से प्राइवेट प्रैक्टिस कर रहे डॉक्टर मेडिकल कॉलेज में पढ़ा सकेंगे। इसका विरोध हो रहा है। लेकिन चिकित्सा शिक्षकों की कमी को देखते हुए इस फैसले का स्वागत किया जा सकता है, क्योंकि सवाल यह भी उठता है कि बिना अध्यापक पढ़कर तैयार होने वाले ये विशेषज्ञ डॉक्टर भविष्य में प्रदेश की चिकित्सकीय तस्वीर बदल पाएंगे?

एमडी, एमएस और डीएम- एमसीएच की डिग्री लेने के बाद ये मेडिकल कॉलेज में अध्यापक का पेशा चुनते हैं, तो इसके पीछे सिर्फ आर्थिक कारण नहीं है, बल्कि उन्हें सम्मान और सुरक्षा चाहिए होती है। कई शिक्षकों ने बताया कि नियमित शिक्षक की निजी प्रैक्टिस करने पर रोक है। असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में करीब 1.20 लाख रुपये प्रतिमाह मिलता है, जो नाकाफी है। दो से तीन साल में तबादला भी हो जाता है। समय से पदोन्नति नहीं होती है। इन तमाम खामियों पर विभाग को ध्यान देना होगा। यही नहीं, कॉलेजों में संसाधनों का अभाव, शोध के लिए माहौल की कमी, परिवार के लिए अनुकूल माहौल न होना आदि भी उनके कॉलेज छोड़ने की वजहें हैं। शिक्षण कार्य और उपचार के अलावा ढेर सारे कार्य करने पड़ते हैं, क्योंकि मेडिकल कॉलेजों में बिजली, फायर सर्विस, सीवर निगरानी आदि सेवाओं के लिए कोई कैडर नहीं है। कोई अप्रिय घटना होने पर उनकी गर्दन फंसती है।


कई कालेजों में प्रधानाचार्य रहे व चिकित्सा शिक्षा एवं प्रशिक्षण महानिदेशक की जिम्मेदारी निभा चुके डॉ. एनसी प्रजापति बताते हैं कि निश्चित तौर पर हर जिले में एक मेडिकल कॉलेज खोलना नई सोच का परिणाम है। कुछ वर्षों बाद इसका फायदा दिखेगा। लेकिन बेहतर यह होता कि जो कॉलेज पहले से चल रहे हैं, उन्हें दुरुस्त किया जाता, फिर चरणबद्ध तरीके से नए कॉलेजों की ओर कदम बढ़ाया जाता। पूर्व चिकित्सा एवं स्वास्थ्य महानिदेशक बद्री विशाल कहते हैं कि सरकार को नई नीतियों के जरिये चिकित्सा शिक्षकों को आकर्षित करना चाहिए। छोटे जिलों में बच्चों के पढ़ने के लिए शैक्षिक गुणवत्ता वाले विद्यालय हों। जैसे संजय गांधी पीजीआई में केंद्रीय विद्यालय की व्यवस्था है, उसी तरह से अन्य कॉलेजों के आसपास भी शिक्षा की व्यवस्था हो सकती है। सीटें बढ़ाने की होड़ खत्म करके डॉक्टरों की कुशलता पर फोकस बढ़ाना होगा।


चिकित्सा शिक्षा और चिकित्सा व स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक के मुताबिक, नए सिरे से चिकित्सा शिक्षा का पौधा रोपा जा रहा है। वर्ष 2027 के बाद प्रदेश में चिकित्सा शिक्षकों और अन्य डॉक्टरों की कमी दूर होने लगेगी। फिर भी जहां जैसी जरूरत है, वहां एनएचएम और संविदा के जरिये डॉक्टर तैनात किए जा रहे हैं। लेकिन, इसका एक पहलू यह भी है कि एक तरफ जहां डॉक्टरों को नौकरी में बनाए रखने के लिए सरकार लाखों जतन कर रही है, वहीं सीएचसी में तैनात डॉक्टरों को तीन महीने से मानदेय नहीं मिल सका है। वे महानिदेशालय से लेकर सीएमओ तक के चक्कर काट रहे हैं। इनका वेतन भी बड़े अस्पतालों में तैनात अपने बैचमेट से काफी कम ही है। गौरतलब है कि सीएचसी में ही सबसे ज्यादा जरूरतमंद मरीज आते हैं।

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