अल्मोड़ा से कौसानी की ओर बढ़ते ही भू-दृश्य अचानक तेजी से बदलने लगता है। ऊपर पहाड़ पर कतार से चीड़ के पेड़ों के बीच सुबह के लाल सूरज को आंखमिचौली खेलते देखा जा सकता है। पहाड़ों से उतरती सीढ़ियां और सीढ़ियों पर उतरती धूप से प्रकृति के 'अपरूप रूप' का पता चलता है। मौसम खत्म हो जाने से बुरांश की शोभा नहीं दिखती, जिनके लिए कौसानी प्रसिद्ध है, और जिन पर सुमित्रानंदन पंत ने कुमाऊंनी में कविता लिखी थी। लेकिन चीड़, बांज, गुलाब और नन्हे गुड़हल का आकर्षण कुछ कम नहीं। कहीं-कहीं बांस दिखते हैं। छोटी पहाड़ी गाय के अलावा बंदर और लंगूर भी दिखाई देते हैं। नीचे घाटियों में हल जोतते किसान हैं, तो ऊपर सड़क पर स्कूल जाते बच्चे। पहाड़ी नदी में स्वाभाविक वेग और आकर्षण नहीं है। इस पहाड़ पर रास्ते पलक झपकते खुलते हैं, और उसी तेजी से पहाड़ या खाई में तब्दील भी हो जाते हैं। यानी क्षण भर की चूक का अर्थ है विनाश। यहां प्रकृति अधिक आकर्षक और विराट है। इसे देखकर मेखलाकार पर्वत अपार, अपने सहस्र दृग सुमन फाड़, अवलोक रहा है बार-बार, नीचे जल में निज महाकार जैसी पंक्तियों के अर्थ खुलने लगते हैं। हवालबाग और कोसी के बाद पातलीबगड़ आता है, जिसके सुन्यारकोट में सुमित्रानंदन पंत का पैतृक घर बताया जाता है। कौसानी के पहले चनौदा से भी महात्मा गांधी के जुड़ाव का पता चलता है, जहां क्षेत्रीय गांधी आश्रम और गांधी इंटर कॉलेज हैं। सोमेश्वर में काफल बिकते दिखते हैं, और मिठाई की दुकानों में मालू के पत्ते में लिपटी हुई सिंगोरी, जो खुद भी बहुत सुकुमार मिठाई है!
कौसानी के चौराहे पर आकर लगता है कि हम किसी पर्यटन केंद्र में आ गए हैं। इधर-उधर होटल और उनके विज्ञापन, छोटी-बड़ी गाड़ियों की कतारें और पर्यटकों को तलाशती बेचैन आंखें। ऊपर चढ़ते हैं, तो अमित गेस्ट हाउस, उसके बगल में बंगालियों का एक छोटा होटल 'मौचाक' है (मधुमक्खी का छत्ता), जिसमें कोलकाता से आने वाले सैलानियों के खान-पान का पूरा बंदोबस्त है। पास ही बैठे बंगाली पर्यटकों की एक टोली से बात होती है। वे सुमित्रानंदन पंत को नहीं जानते। लेकिन कौसानी के लोग भी उन्हें कितना जानते हैं! बीस साल का कैलाश गाड़ी चलाता है। पूछने पर कहता है, पंत जी का नाम सुना है, पर उनकी कोई कविता याद नहीं। चाय की दुकान पर महेश से बात होती है। वह दिल्ली की किसी फैक्टरी में काम करते हैं, लेकिन मां के बीमार पड़ने पर उन्हें गांव ले आए हैं। गांव में रहना मुश्किल है, क्योंकि आय का कोई साधन नहीं। पंत को वह भी नहीं जानते। इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकान चलाने वाले रमेशचंद्र जी बताते हैं, कौसानी में सौ में दस लोग ही सुमित्रानंदन पंत को जानते हैं। पुराने लोगों ने पंत की कविताएं पढ़ी हैं, पर अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को उनके बारे में पता नहीं है। ऊपर 'अनासक्ति आश्रम' है, जिसका आकर्षण बरबस ध्यान खींचता है, पर मौसम साफ न होने से हिमालय की चोटियां नहीं दिखतीं।
थोड़ी देर बाद हम पंत वीथिका की ओर जाते हैं, जहां पंत का जन्म हुआ था, और जहां सालाना कार्यक्रम बारह बजे शुरू होना है। अमित गेस्ट हाउस के बगल से नीचे उतरते हुए जिन बच्चों और लोगों से सामना होता है, उन्हें देखकर लगता नहीं कि वे हिंदी के इस 'महाकवि' पर गर्व करते होंगे, जो एक सौ पंद्रह साल पहले यहीं पैदा हुए थे, और ज्ञानपीठ सम्मान प्राप्त करने वाले हिंदी के पहले साहित्यकार थे। पंत वीथिका दरअसल वह घर है, जिसे टी स्टेट के मैनेजर पंत के पिता को रहने के लिए मिला था। उस समय के हिसाब से बड़ा घर, जिसमें छोटे-छोटे कई कमरे। सरकारी कार्यक्रम होने के बावजूद इसकी सादगी आकर्षित करती है। पंत वीथिका के प्रभारी ज्ञानप्रकाश तिवारी, लक्ष्मी आश्रम की बच्चियों, मुख्य अतिथि महावीर रवांल्टा और स्थानीय साहित्यकार कपिलेश भोज जैसों की पहल और उत्साह से यह कार्यक्रम आगे बढ़ता है। हालांकि पंथ वीथिका के अलावा कौसानी स्टेट में पंत जी पर तीन दिनों का कार्यक्रम था, जिसमें रमेशचंद्र शाह की भी मौजूदगी थी। अल्मोड़ा के पंत पार्क में भी प्रकृति के इस सुकुमार कवि को याद किया गया। फिर भी मन खटकता है कि अपने कवि के जन्मदिन पर, उनके घर पर कौसानी के उनके अपने लोग क्यों नहीं?
लेकिन क्या यह वही कौसानी है, जिसकी प्रकृति ने पंत के कवि व्यक्तित्व का निर्माण किया? या इसके बजाय यह एक पर्यटन केंद्र के रूप में सीमित हो गया है? पंत की जन्मस्थली होने के कारण जिस कौसानी का विकास होना चाहिए था, वहां अनेक बच्चे स्कूल नहीं जाते। पानी की वैसी सुविधा नहीं है। कहते हैं कि अल्मोड़ा और बागेश्वर के बीच होने के कारण भी इसका विकास अटका हुआ है। होटल वालों की शिकायत है कि यहां पर्यटकों को स्थायी तौर पर रोके रखने की कोई व्यवस्था नहीं है। पहाड़ और सूर्योदय-सूर्यास्त लोग कब तक देखते रहें? कौसानी के जिस चौराहे पर सुमित्रानंदन पंत की आदमकद प्रतिमा होनी चाहिए, वहां 'पर्यटकों' की खोज में जुटे स्थानीय लोग कब्जा जमाए बैठे हैं। दोपहर के डेढ़ बजे शराब पीकर घूमते दलाल मानते ही नहीं कि आप पर्यटक न होकर किन्हीं पंत के जन्मदिन पर यहां आए हैं। वे चाहते हैं, आप उनके होटल में ठहरें, उनकी गाड़ी से अल्मोड़ा या हल्द्वानी निकलें। इस चौराहे पर बैग या सूटकेस के साथ उतरा कोई भी आदमी 'आसामी' है, जिसे अपने ठिकाने पर ले जाने के लिए मशक्कत चलती रहती है। कौसानी से लौटते हुए पंत की ही कविता, द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र याद आती है-निष्प्राण विगत-युग, मृतविहंग/जग नीड़ शब्द औ श्वास हीन/च्युत अस्त-व्यस्त पंखों से तुम/झर-झर अनंत में हो विलीन।