इस्लामिक देश ऐतिहासिक रूप से एक दूसरे के खिलाफ लड़ते रहे हैं और आज भी उनमें एकता नहीं है। इस्लामिक देशों ने इतिहास से कोई सबक नहीं सीखा है और यहां तक ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कॉन्फ्रेंस का गठन भी विफल रहा है। सभी सदस्य देशों के आपस में मिलने और सभी व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए लंबे-लंबे प्रस्ताव पारित करने के बावजूद जमीनी स्तर पर कोई बदलाव नहीं हुआ है। कोई भी इससे किसी कार्रवाई या समस्याओं के समाधान की अपेक्षा नहीं करता, क्योंकि यह सब जुबानी कवायद है। पश्चिम एशिया में, चाहे वह सीरिया हो, इराक या लीबिया इन देशों में मची उथल-पुथल इसका एक उत्तम उदाहरण है।
जमीनी स्तर पर, बाहरी शक्तियां भी यहां किसी न किसी के पक्ष में आती रही हैं, यहां तक कि एक समय अमेरिका ने भी इस्लामिक स्टेट (आईएस) का समर्थन किया था, क्योंकि वाशिंगटन द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे हथियार अंततः इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों के हाथों में पहुंचते थे। जैसे-जैसे रासायनिक हथियारों के उपयोग के साथ सीरिया के साथ लड़ाई में तीव्रता आ रही है, इ्स्लामिक देशों की एकता स्वाभाविक रूप से बिखर रही है। कुछ इस्लामिक देश सीरियाई नेता के समर्थन में हैं, जबकि कुछ विरोधी बलों का समर्थन कर रहे हैं। यहां तक कि यमन में, जहां अकाल ने आबादी को त्रस्त कर रखा है, पिछले शासन और सऊदी अरब से लड़ने वालों का समर्थन किए जाने को लेकर इस्लामिक देश बंटे हुए हैं।
इन मतभेदों और ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्विता के बीच सऊदी अरब ने आतंकवाद से लड़ने के लिए 39 इस्लामिक देशों का इस्लामी सैन्य गठबंधन स्थापित किया है। इसमें एक महत्वपूर्ण और ताकतवर क्षेत्रीय देश शिया मुसलमानों का ईरान गायब है, जो ऐतिहासिक रूप से सऊदी अरब का प्रतिद्वंद्वी है। वे न केवल यमन में, बल्कि सीरिया, लीबिया और इराक की लड़ाई में अपने मुखौटों का इस्तेमाल करते हैं। इस इस्लामिक मिलिट्री एलायंस (आईएमए) यानी इस्लामिक सैन्य गठबंधन (जिसका मुख्यालय रियाद में है) की स्थापना करते हुए सऊदी अरब ने घोषणा की थी कि यह अंतरराष्ट्रीय गठबंधन इराक, लीबिया, मिस्र और अफगानिस्तान में आतंकवाद के खिलाफ लड़ेगा। कुछ लोगों ने इसे इस्लामिक नाटो तक कहा है। यह गठबंधन न केवल सुरक्षा के मुद्दे पर सदस्य देशों के बीच सहयोग करेगा, बल्कि उन्हें प्रशिक्षण, जवान और उपकरण भी उपलब्ध कराएगा।
पाकिस्तान ने पारंपरिक रूप से अपने जवानों को सऊदी अरब में तैनात कर रखा है, जहां वे प्रशिक्षण और अभ्यास में शामिल होते हैं। लेकिन उन्होंने कभी भी सऊदी अरब के पक्ष में किसी लड़ाई में हिस्सा नहीं लिया है। पाकिस्तान आतंक ग्रस्त इलाकों में आतंकवाद के खिलाफ अपनी लड़ाई लड़ता रहा है और आतंकियों का सफाया किया है। आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान की लड़ाई के लिए जिम्मेदार व्यक्ति और कोई नहीं, बल्कि पूर्व सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ हैं। यहां तक कि जब वह सेवारत थे, तभी कई बार उन्हें आईएमए का प्रमुख बनने के लिए कहा गया, लेकिन उन्होंने सेवानिवृत्त होने तक इंतजार किया।
इसे लेकर पाकिस्तान में काफी हंगामा हुआ, क्योंकि ज्यादातर लोग नहीं चाहते थे कि कोई पाकिस्तानी इस गठबंधन का प्रमुख बने, जिसमें सभी इस्लामिक देश सदस्य नहीं थे। यह ईरान के संदर्भ में बिल्कुल सही है, जिसे सैन्य गठबंधन में शामिल होने के लिए आमंत्रित नहीं किया गया।
पाकिस्तानी संसद ने यमन में लड़ने के लिए अपने जवान सऊदी अरब भेजने से सख्ती से मना कर दिया, पर अब नवाज शरीफ और नए सैन्य प्रमुख जनरल बाजवा राहील शरीफ को इस गंठबंधन का प्रमुख बनने की अनुमति देने को तैयार हो गए हैं।
इंटर सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस के डायरेक्टर जनरल मेजर जनरल आसिफ गफूर कहते हैं कि इस सैन्य गठबंधन के प्रमुख के रूप में राहील शरीफ की नियुक्ति 'पाकिस्तानी शासन का फैसला' है। आगे वह कहते हैं कि 'पाकिस्तान इस क्षेत्र में किसी तरह का तनाव पैदा नहीं करना चाहता और छद्म युद्ध में यकीन नहीं रखता।'
हालांकि ईरान ने सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन के प्रमुख के पद पर राहील शरीफ की नियुक्ति पर झुंझलाटहट जताई और इस्लामाबाद में उसके राजदूत मेहदी होनदूस्त ने कहा, हम इस मुद्दे को लेकर चिंतित हैं...इससे इस्लामी देशों की एकता पर असर पड़ेगा। हालांकि पाकिस्तान ने ईरान को विश्वास में लिया है, लेकिन इससे यह संकेत नहीं मिलता कि इस फैसले से ईरान संतुष्ट है।
अब तक इस गठबंधन के संदर्भ शर्तों को स्पष्ट नहीं किया गया है और इससे पहले कि हर कोई सहमत होता है और गठबंधन के सैनिक वास्तव में आतंकवाद के खिलाफ अपनी लड़ाई शुरू करते हैं, इसमें एक वर्ष से ज्यादा का समय लग सकता है।
पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख रहते हुए असंख्य बयान जारी करने वाले राहील शरीफ अब तक बिल्कुल खामोश हैं और इसलिए उनसे मांग की जा रही है कि भले ही वह पाकिस्तानी हैं, लेकिन सरकार का हिस्सा नहीं हैं, इसलिए उन्हें उस गठबंधन के बारे में उठाए जा रहे सवालों के जवाब देने चाहिए, जिसका प्रमुख बनना उन्होंने स्वीकार किया है।
राहील शरीफ के कुछ करीबी मित्र बताते हैं कि उन्होंने सऊदी अरब से बता दिया है कि उनकी तीन शर्तें पूरी होंगी, तो वह इस नए गठबंधन का नेतृत्व करेंगे। ये शर्तें हैं-पहला, गठबंधन में ईरान को शामिल करना, ताकि संगठन सांप्रदायिक न लगे। दूसरा, वह किसी के अधीन काम नहीं करेंगे। और तीसरा, यदि मुस्लिम देशों के बीच सद्भावना बढ़ाने की जरूरत होगी, तो उन्हें मध्यस्थ के रूप में कार्य करने का जनादेश होगा। इन शर्तों के बारे में सऊदी अरब से कोई जवाब नहीं मिला है।
एक ओर जहां इस गठबंधन को लेकर विवाद जारी है, वहीं आईएस जैसा आतंकी संगठन अपने रास्ते में आने वाली हर चीजों को नष्ट करता जा रहा है और अफगानिस्तान में उसकी मौजूदगी इस क्षेत्र के देशों के लिए आंखें खोलने वाली है।