हर गुजरते दिन के साथ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को पता चल रहा है कि उनके सामने आने वाली हर बड़ी समस्या ओबामाकेयर जैसी है, यदि इनका कुछ अच्छा समाधान होता, तो वह काफी पहले ही मिल गया होता। कुछ कम बेहतर समाधान हैं, मगर उनकी पार्टी इससे अधिक कीमत चुकाने को तैयार है या दूसरे शब्दों में देश उन्हें बर्दाश्त करने को तैयार है। पर दुर्भाग्य से विदेश नीति के मामले में ट्रंप को सीरियाई नागरिकों पर नीचतापूर्ण ढंग से किए गए जहरीली गैस के हमले से एक सबक मिला। इस हमले के पीड़ितों में ज्यादातर बच्चे हैं, जिसे कथित रूप से रूस और ईरानी समर्थक बशर असद के हत्यारे शासन ने अंजाम दिया।
राष्ट्रपति ट्रंप इस भोले विचार के साथ सत्ता में आए कि वह इस्लामिक स्टेट (आईएस) को अपनी मध्य-पूर्व नीति का केंद्र बनाकर उससे लड़ेंगे और पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा से ज्यादा बम गिराकर और स्पेशल फोर्स भेजकर अपनी कठोरता साबित करेंगे। ऐसा भी लग रहा था कि ट्रंप सोचते थे कि आईएस से लड़ाई रूसी राष्ट्रपति पुतिन के साथ साझीदारी में पुल का काम करेगी।
यह एक भोला विचार था, क्योंकि आईएस शून्य में नहीं है और न ही वही इस क्षेत्र में एकमात्र उद्दंड है। ईरान द्वारा इराक को चतुराई से हराने के खिलाफ सुन्नी मुस्लिम प्रतिक्रिया के रूप में इस्लामिक स्टेट पैदा हुआ, जहां ईरान के लोग शिया लड़ाकों का समर्थन करते थे और नूरी-अल मलिकी की इराकी सरकार की सेना ने सुन्नी सत्ता के सभी अवशेषों को कुचलने का प्रयास किया और इसे ईरान का जागीरदार बना दिया। अगर आपको लगता है कि आईएस कमजोर है, तो गूगल पर 'वर्चस्व के लिए शक्ति अभ्यास और इराक में शिया लड़ाके' लिखकर खोज कीजिए और आपको पता चल जाएगा कि दुनिया के उस हिस्से में दुष्टता का जनक कौन है।
इराकी सुन्नियों के खिलाफ ईरानी/शिया हमला सीरिया में असद के शिया-अलवाइट शासन के समानांतर चला, जिसने सीरिया में बहुपंथी लोकतांत्रिक आंदोलन को शिया और सुन्नी के बीच सांप्रदायिक लड़ाई में तब्दील कर दिया। असद ने सोचा कि अगर वह पर्याप्त संख्या में सीरिया के सुन्नियों को मार डालें, तो वह अपने लोकतांत्रिक आंदोलन को शिया-अल्वाइट शासन के खिलाफ सांप्रदायिक संघर्ष में बदल कर ताकतवर हो सकते हैं। उनकी यह सोच काम कर गई। विपक्ष ने उन्हें लगभग सत्ता से हटा ही दिया था, लेकिन रूस, ईरान और ईरान के हिजबुल्ला लड़ाकों के सहयोग से असद सीरियाई सुन्नियों को कुचलने में सक्षम हो गए।
इस्लामिक स्टेट दोतरफा आंदोलन की एक विकृत उपज है-जिसमें रूस, ईरान, असद और सीरिया के हिजबुल्ला एक तरफ थे और ईरान तथा इराक के ईरानी लड़ाका समर्थक दूसरी तरफ। जब ट्रंप ने कहा कि वह आईएस को कुचलने के लिए रूस से साझेदारी करना चाहते हैं, तो यह असद, रूस, ईरान और हिजबुल्ला को काफी अच्छा लगा। हर किसी की तरह उन्होंने सोचा कि वे ट्रंप की अज्ञानता को अपने लाभ में बदल सकते हैं।
इसलिए पिछले हफ्ते 'रेक्स टिलर्सन' नामक व्यक्ति (मुझे बताया गया है कि वह अमेरिका के विदेश मंत्री हैं) ने घोषणा की कि राष्ट्रपति असद की दीर्घकालीन स्थिति का फैसला सीरिया के लोग करेंगे, मानो सीरिया के लोगों को इस विषय पर आयोवा की तरह प्राथमिकता होगी। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत निक्की हेली ने यही बात काफी कायरतापूर्ण ढंग से कही। उन्होंने पत्रकारों को बताया कि अमेरिका की प्राथमिकता अब वहां टिके रहने की नहीं है और वह असद को बाहर करने पर ध्यान केंद्रित करता है। क्या इसमें कोई आश्चर्य है कि इस हमले के बाद असद को कोई फर्क नहीं पड़ा, जिसके बारे में न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा है-सीरिया में वर्षों बाद सबसे खतरनाक रासायनिक हमलों में से एक, जिसमें सीरियाई विद्रोहियों के कब्जे वाले आखिरी प्रमुख शहर इडलीब प्रांत में दर्जनों लोग मारे गए।
ध्यान रहे, डोनाल्ड ट्रंप सीरिया समस्या के लिए जिम्मेदार नहीं हैं और वह सही शिकायत करते हैं कि इसे तो उनकी गोद में ओबामा की टीम ने डाल दिया, सीरिया के साथ निपटने की जिनकी अपनी रणनीति निरर्थक थी। वह जमीनी स्तर पर कोई उत्तेजना पैदा किए बिना वहां के प्रमुख खिलाड़ी रूस और ईरान के साथ बातचीत करना चाहते थे।
विदेश नीति के विशेषज्ञ माइकल मेंडेलबम कहते हैं कि 'सीरिया में वास्तविक सैन्य लाभ उठाने की राह में एकमात्र बाधा अमेरिका का लोकतंत्र होना है। अमेरिकी लोग सिर्फ इस बात के लिए अपना लहू और पैसा खर्च नहीं करना चाहते कि सीरिया में नतीजा भले ही कम खतरनाक हो, मगर वास्तव में कुछ अच्छा न हो।
हालांकि मुझे अब लगता है कि कुछ भी नहीं करना गलती है। असद को सीरिया पर नियंत्रण बहाल करने देने का मतलब अंतहीन नरसंहार होगा। बातचीत से सत्ता साझेदारी वाला समाधान असंभव होगा, क्योंकि वहां विश्वास की कमी है।
अंतिम खराब समाधान सीरिया का विभाजन और प्रमुख रूप से सुन्नी संरक्षित क्षेत्र का निर्माण है। इस क्षेत्र की सुरक्षा अंतरराष्ट्रीय बल द्वारा की जाएगी, जिसमें यदि जरूरी हुआ, तो कुछ अमेरिकी जवान भी शामिल होंगे। उससे कम से कम हत्याएं रुकनी चाहिए-और शरणार्थी प्रवाह पर भी नियंत्रण लगेगा, जो पूरे यूरोपीय संघ में एक लोकलुभावन राष्ट्रवाद को बढ़ावा दे रहा है।
यह सुंदर और आसान नहीं होगा, लेकिन शीतयुद्ध में हमने यूरोप में सांप्रदायिक शांति और यूरोप को लोकतांत्रिक पटरी पर रखने के लिए चार लाख जवान तैनात किए थे। नाटो और अरब लीग को सीरिया में इसी उद्देश्य से एक सुरक्षित क्षेत्र बनाने की कोशिश करनी चाहिए। और अगर पुतिन या ईरान दमिश्क में हत्यारे असद को बनाए रखना चाहते हैं, तो वे उन्हें वश में कर सकते हैं।
अगर ऐसा होता है, तो ठीक अन्यथा राष्ट्रपति ट्रंप को आगे भी मंगलवार जैसे बुरे दिन के लिए तैयार रहना चाहिए। जैसा मैंने कहा, हर समस्या ओबामाकेयर की तरह है, आप जितना समझते हैं, चीजें उतनी आसान कभी नहीं रहीं।