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कूड़े का राष्ट्रीय संग्रहालय

Sun, 28 Dec 2014 07:47 PM IST
सुधीर विद्यार्थी
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साधो, मेरे एक मित्र इन दिनों कूड़े का राष्ट्रीय संग्रहालय बनाने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं। उनका तर्क है कि स्वच्छता अभियान के ठेकेदारों ने यह नहीं सोचा कि वे झाड़ू लगाकर जो इतना कूड़ा इकट्ठा कर रहे हैं, वह कहां जाएगा। मित्र का तर्क है कि जो चीज आज कूड़ा है, वह कभी जरूरत बन सकती है, इसलिए कूड़े का संग्रहालय बनाना जरूरी हो गया है। हर शहर-कस्बा अब झाड़ूधारी स्वयंसेवकों से पटा पड़ा है। आपने घर के दरवाजे पर कूड़ा फेंका नहीं कि कोई न कोई कुर्ताधारी स्वयंसेवक फोटोग्राफर या न्यूज चैनल के साथ हाजिर। कई बार तो ऐसा हुआ कि दरवाजे की कॉलबेल बजने पर बाहर निकलते ही स्वयंसेवक ने तपाक-से पूछा, आज कूड़ा नहीं डालेंगे क्या?
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मैंने कहा, अकेला रहता हूं। कूड़ा कम करता हूं। खाना होटल में खा लेता हूं। वह बोले, आप तो लेखक हैं न? हिंदी वाले बहुत अधिक कूड़ा लिखते हैं, उसी में से कुछ दे दीजिए। कूड़ा तलाशते बच्चे अब मुहल्लों से गायब हो चुके हैं, जो सुबह-सबेरे कूड़े में कुछ जीने लायक चीजें तलाश कर लेते थे। वैसे हर आदमी जरूरत के हिसाब से कूड़े का निर्धारण करता है। अमीर लोगों के लिए जो कूड़ा है, वही गरीबों के लिए जिंदगी जीने का जरिया हो सकती है।

उस दिन कूड़े पर बहस हो रही थी। प्रगतिशील मित्र दक्षिणपंथियों का लिखा कूड़ा मान रहे थे, तो कुछ केसरिया रंग प्रिय मार्क्सवाद की जरूरी किताबों को कूड़े के श्रेणी में रखने पर तुले थे। कई बार समय भी कूड़े के बारे में अजीब-अजीब निर्णय देता है। जैसे, गांधी के देश में कल तक गोडसे की जीवनी कूड़ा थी, पर आज वह प्रासंगिक हो गई है। उसे कूड़े से निकाल कर नया लुक दिया जा रहा है। वैसे हर युग में गांधी और गोडसेवाद जिंदा बने रहते हैं, पर इनमें से कभी एक आगे, तो दूसरा पीछे चला जाता है। यानी जो चल गया, वह सिक्का, न चले, तो कूड़ा। पर इतिहास का कूड़ेदान बहुत निर्णायक होता है। कल तक जो कूड़ेदान में पड़े थे, आज उन्हें ड्रॉइंग रूम में सजाने की तैयारी की जा रही है।
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