भारतीय महिलाओं और भारत में लैंगिक संबंधों को लेकर स्थापित मान्यताओं को बदलने के लिए भारतीय इतिहासकारों ने काफी श्रम और विश्लेषणात्मक कौशल का प्रदर्शन किया है। ब्रिटिश राज में भारतीय महिलाओं की ऐसी छवि प्रस्तुत की गई थी, जिससे समाज में उनकी कम हैसियत का पता चलता था।
इसके लिए उन्होंने पर्दा प्रथा, सती, बाल विवाह और कन्याभ्रूण हत्या जैसी कुरीतियों का सहारा लिया था। उसके बाद से बाहरी दुनिया में यही प्रवृत्तियां भारतीय महिलाओं की पहचान बन गईं और उनकी छवि ऐसी बन गई कि उनके पास अपने कोई अधिकार नहीं हैं। इस ब्रिटिश प्रतिपादन के कारण बाहरी दुनिया में यह धारणा बन गई कि भारतीय महिलाओं की स्थिति दयनीय है और वे उत्पीड़न का शिकार हैं।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतीय लेखन और समाजशास्त्रीय अध्ययनों ने महिलाओं के जीवन पर सूक्ष्म तरीके से रोशनी डालनी शुरू की। इन अध्ययनों ने महिलाओं की परिस्थितियों और जाति, वर्ग, धर्म, क्षेत्र और उनके संपूर्ण जीवन के आधार पर उनकी हैसियतों की भिन्नता की ओर ध्यान आकर्षित किया।
महिलाओं की हैसियत उनकी शिक्षा और पारिवारिक संपत्ति के आधार पर भी भिन्न होती है। पिछले कुछ वर्षों में बलात्कार की कुछ बेहद जघन्य मामलों (विशेष रूप से दिसंबर, 2012 के निर्भया मामला) के कारण राजधानी दिल्ली को रेप कैपिटल ऑफ इंडिया तक करार दिया गया और कहा जाने लगा कि भारत महिलाओं के लिए असुरक्षित है। समाज में महिलाओं की निम्नतम स्थिति को रेखांकित करने वाले आंकड़ों के कारण दुनिया के समक्ष यह धारणा बन गई कि भारतीय महिलाओं का जीवन दयनीय बना हुआ है।
स्थिति को बेहतर करने और लैंगिक समानता की दिशा में तेजी लाने की जरूरत पर जहां शायद ही असहमति हो, मैं यह देखने का प्रयास करूंगी कि कैसे भारतीय और गैर भारतीय, जोकि पश्चिमी दुनिया के साथ संवाद करते हैं, लगातार भारतीय महिलाओं को खास नजरिये से प्रस्तुत करते हैं कि वे किस तरह से भिन्न तरह के उत्पीड़न का शिकार हैं और वे इस बात की गुंजाइश नहीं छोड़ते, जिनसे उनके अनुभवों की जटिलताओं और भिन्नताओं के बारे में पता चले।
मसलन, इसी साल अप्रैल में कैनेडियन ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन के द करंट नामक कार्यक्रम में 'क्या भारत में महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा के लिए वहां लैंगिक असंतुलन को दोषी ठहराया जा सकता है?' विषय पर चर्चा हुई। यह 18 अप्रैल को वाशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित शोध परक आलेख 'टू मेनी मैन' पर आधारित थी। इसमें मेरे साथ ही एक अन्य भारतीय रुचिरा गुप्ता मेहमान के रूप में आमंत्रित थीं।
मुझसे भारत में लैंगिक असंतुलन से संबंधित अनेक सवाल पूछने के बाद रेडियो की प्रस्तोता गुप्ता (वह न्यूयॉर्क में मानव तस्करी के खिलाफ एक ऐप का संचालन करती हैं) से मुखातिब थीं। गुप्ता ने भारतीय महिलाओं और बच्चों की बेहद दुखदायी तस्वीर पेश की कि कैसे वे मानव तस्करी, जबरिया वेश्यावृत्ति, बलात्कार, यौन दासता और घरेलू भेदभाव जैसे उत्पीड़न का शिकार हैं।
जाहिर है, गुप्ता ने जिस सनसनीखेज तरीके से भारतीय महिलाओं की स्थिति प्रस्तुत की, उसका मकसद कनाडाई (अधिकांश श्वेत) श्रोताओं की ओर ध्यान खींचना था, ताकि वे बिना कोई सवाल किए उनकी बातों पर यकीन कर लें। उन्होंने कहा, 'यदि वे कन्याभ्रूण के रूप में बच जाती हैं, किशोरावस्था में उन्हें वेश्यावृत्ति के लिए बेचा जा सकता है या फिर घरेलू नौकरानी के रूप में उन्हें काम दिया जाता है, जहां बच्चों का यौन उत्पीड़न होता है', मानो यह हर भारतीय लड़की की नियति हो।
ऐसे प्रदर्शन शिक्षा के क्षेत्र की उन उपलब्धियों को नजरअंदाज कर देते हैं, जहां भारतीय लड़कियां स्कूली परीक्षाओं में लड़कों से बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं। कोई भी उन महिलाओं की उपलब्धियों को सामने रखकर, जोकि खिलाड़ी, इसरो की वैज्ञानिक, पायलट या मीडिया में एंकर के रूप में काम कर रही हैं, इसके उलट तस्वीर पेश कर सकता है।
भारत में, 2010 में जहां एक लाख की आबादी में 1.8 फीसदी बलात्कार की घटना हुई, अमेरिका में 27.3 फीसदी। भारत में महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों की बढ़ती संख्या अधिक रिपोर्ट दर्ज किए जाने के कारण है या सचमुच ऐसी घटनाओं में वृद्धि हुई है, यह किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले गंभीर जांच का विषय है।
गुप्ता ने यह भी दावा किया कि 'भारत में जनसांख्यिकी विभाजन ने भी महिलाओं और लड़कियों की भारत के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में तस्करी को बढ़ावा दिया है। अत्यंत गरीब परिवारों की लड़कियां, जोकि निचली जातियों से भी ताल्लुक रखती हैं, उन्हें जबर्दस्ती हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के गांवों में उच्च वर्ग और उच्च जाति के लोगों के लिए उपलब्ध करवाया गया। उन्हें इन पुरुषों के लिए यौन दासी बनने को मजबूर किया गया।'
हालांकि ऐसे बयान के पक्ष में उन्होंने किसी तरह का प्रमाण नहीं दिया। मैं गुप्ता की तरह भारत की महिलाओं और तस्करी के बारे में अधिकृत तौर पर नहीं बोल सकती, लेकिन मैं तस्करी वाली दुल्हन या दुल्हन की कमी वाले क्षेत्रों के पंद्रह वर्ष के अपने अनुभव के आधार पर कुछ कह सकती हूं। गुप्ता पलायन और तस्करी में घालमेल कर देती हैं।
उन्हें इस तरह से प्रस्तुत कर पश्चिम में स्थित भारतीय महिलाओं के ऐसे हिमायती दावा करते हैं कि वे उनके हित की बात करते हैं, लेकिन उनमें वास्तविक स्थिति के प्रति जरा भी सम्मान नहीं है और न ही वे यह जानते हैं कि भारतीय महिलाएं खुद को किस तरह प्रदर्शित करना चाहती हैं। एक स्वघोषित नारीवादी कार्यकर्ता के लिए यह एक गंभीर समस्या है, खासकर 'निचले तबके' की दुल्हनें/तस्करी वाली महिलाएं पलटकर जवाब नहीं दे सकतीं, खासकर अंग्रेजी में।
हाल तक इस बात के कम ही अकादमिक साक्ष्य उपलब्ध थे, जिससे लैंगिक असमानता और तस्करी में वृद्धि या लैंगिक हिंसा के बीच संबंध स्थापित किया जा सके। हमने पाया है कि पलायन करने वाली महिलाओं की आर्थिक स्थिति बेहतर हुई है। अंतरक्षेत्रीय विवाह से उन्हें घर की असहनीय स्थिति से बाहर निकलने का अवसर मिला।