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उनका रंगभेद, हमारा रंगभेद

तस्लीमा नसरीन
Updated Wed, 24 Jun 2020 02:11 AM IST
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अश्वेत व्यक्ति की मौत के खिलाफ प्रदर्शन करते लोग (फाइल फोटो) - फोटो : Twitter

अमेरिका में एक अश्वेत जॉर्ज फ्लॉयड की नृशंस हत्या से पूरी दुनिया क्षुब्ध और शोकाहत है। यूरोप, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया यानी श्वेतों के देशों में जब भी हमें नस्लवादी हिंसा की सूचना मिलती है, हम गुस्से से भर उठते हैं। तब तो और भी, जब ऐसी हिंसा का शिकार हमारे अपने लोग होते हैं। लेकिन अफ्रीकी लोगों के नस्लवादी हिंसा का शिकार बनने पर आश्चर्यजनक रूप से हम क्षुब्ध नहीं होते।



क्या हम खुद अश्वेतों से घृणा नहीं करते? हम भारतीय उपमहाद्वीप के लोग दो सौ साल तक औपनिवेशिक ताकत के कुशासन और शोषण का शिकार हुए हैं। श्वेत ब्रिटिश शासक अश्वेत अफ्रीकियों से जैसी घृणा करते थे, वैसी ही घृणा वे हम भारतीयों से भी करते थे।


लेकिन विद्रूप देखिए कि भारत के लोग हमेशा ही खुद को अफ्रीकियों से श्रेष्ठ मानते आए हैं। ब्रिटिशों ने कभी कहा होगा कि कुछ अफ्रीकी नरभक्षी होते हैं। लेकिन सात दशक से अधिक का समय बीत जाने के बावजूद आज भी भारतीयों का एक हिस्सा अफ्रीकियों को नरभक्षी मानता है।


अफ्रीका से अनेक युवा पढ़ाई के लिए भारत आते हैं। लेकिन काले होने के कारण उन्हें पग-पग पर लांछित-अपमानित होना पड़ता है। वे सूडान, केन्या, नाइजीरिया, इथियोपिया कहीं से क्यों न आएं, उन्हें नाइजीरियाई कहा जाता है। और यह धारणा बना ली गई है कि नाइजीरिया के लोग मादक पदार्थों के तस्कर या लड़कियों के दलाल होते हैं।


मुझे याद है, नई दिल्ली के फॉरेनर रजिस्ट्रेशन ऑफिस में मैं एक बार वीजा बढ़वाने के लिए गई थी। एक अफ्रीकी भी वहां गए थे। चूंकि उनकी पत्नी भारतीय थी, लिहाजा वह भी वीजा के सिलसिले में ही आए हुए थे। संबद्ध अधिकारी ने मुझे बैठाकर चाय पिलाई। लेकिन उस अफ्रीकी के साथ उनका व्यवहार सहज नहीं था।


मुझे याद है, उन्होंने मुझसे कहा था कि अफ्रीकी लोग बदमाश होते हैं। वे नरभक्षी होते हैं और मादक पदार्थों का कारोबार करते हैं। वह उन भारतीय महिलाओं से सख्त नाराज थे, जो अफ्रीकियों से शादी करती हैं। वहां आए अमेरिकियों से भी उनका व्यवहार अच्छा था।


अमेरिका में एक समय अफ्रीकियों को नीग्रो कहकर बुलाया जाता था। नीग्रो शब्द अब वहां गाली है। भारत में भी नीग्रो की तरह नाइजीरियन एक गाली है। यहां आए दिन अफ्रीकी निशाना बनते हैं। वर्ष 2017 में पांच नाइजीरियाई छात्रों को खुलेआम बुरी तरह पीटा गया था और कोई उन्हें बचाने नहीं आया था।
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पिटाई की वजह यह थी कि एक भारतीय छात्र की नशीली गोली के सेवन से मृत्यु हो गई थी और पूछताछ में पता चला था कि उसे नशे की गोली एक नाइजीरियन से मिली थी। उससे एक साल पहले दिल्ली में कांगो के एक व्यक्ति की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी।


उससे पहले बंगलूरू में झगड़ा-विवाद में तंजानिया की एक छात्रा को निर्वस्त्र कर दिया गया था। वर्ष 2013 में गोवा में एक नाइजीरियाई छात्र की हत्या कर दी गई थी। अफ्रीकी छात्रों को रास्ते में गालियां सुननी पड़ती हैं। लोग उन्हें किराये पर कमरा नहीं देना चाहते, कमरा देने से पहले तमाम दस्तावेज देखते हैं।


इतना अपमान, इतनी उपेक्षा के बावजूद अफ्रीकी भारत को प्यार करते हैं और भारत आते हैं। लेकिन जो विदेशी गोरे लोग भारत पढ़ाई, नौकरी या शोध करने आते हैं, उन्हें हिंसा और अपमान का सामना नहीं करना पड़ता।


ऐसा नहीं है कि हम सिर्फ अफ्रीकियों से ही घृणा करते हैं। हम अपने बीच के काले लोगों को भी नापसंद करते हैं। अगर कोई लड़की काली है, तो सुंदर होने के बावजूद हम उसे खूबसूरत नहीं मानते। दलितों और जनजातियों को अगर हम पसंद नहीं करते, विकास की मुख्यधारा में शामिल नहीं करते, तो उसकी एक वजह उनका काला होना भी है।


नगालैंड, मणिपुर, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश आदि के लोग काले नहीं होते, लेकिन वे मुख्यधारा के भारतीयों की तरह नहीं दिखते। इसलिए दिल्ली, गुरुग्राम और दक्षिण भारत में पूर्वोत्तर के लोग भी हिंसा का शिकार होते हैं।


दिग्गज फिल्म निर्माता माइकल मूर ने अमेरिका में नस्लवाद का नमूना देखने के लिए एक बार न्यूयॉर्क की एक सड़क पर दो लोगों को टैक्सी रुकवाने के लिए खड़ा किया था। उनमें से एक आदमी अश्वेत था, जो हार्वर्ड विश्वविद्यालय में प्रोफेसर था। जबकि दूसरा एक कुख्यात अपराधी था, हालांकि वह गोरा था। मूर ने देखा कि अध्यापक के पास एक भी टैक्सी नहीं रुकी।


जबकि अपराधी के हाथ देते ही टैक्सियां रुक जा रही थीं। न्यूयॉर्क में अनेक बांग्लादेशी टैक्सी चलाते हैं। लेकिन वे भी अफ्रीकी-अमेरिकियों को काला कहकर उन पर हंसते हैं। हमारी त्वचा कितनी भी काली क्यों न हो, हम खुद को अश्वेतों से, अफ्रीकियों से एक दर्जा ऊपर मानते हैं।


श्वेतों की नजर में हम काले क्यों न हों, लेकिन अश्वेतों के सामने हम खुद को गोरा समझते हैं! दक्षिण अफ्रीका में भारत के लोग नस्लवादी हिंसा के शिकार हो चुके हैं। इसके बावजूद भारतीयों में गोरों वाली श्रेष्ठता ग्रंथि बरकरार है।


कोरोना की इस महामारी के बीच भी अमेरिका में नस्लवाद के खिलाफ जो गुस्सा देखा गया, वह अतुलनीय है। इस बारे में मैंने जितनी भी बार ट्विटर पर टिप्पणी की, मुझे असंख्य लोगों का कटाक्ष झेलना पड़ा। मुझ पर हमला बोलने वाले भारतीय उपमहाद्वीप के ही लोग थे।


उनका कहना है कि सड़क पर उतरने की आड़ में अश्वेतों ने दुकानों में लूटपाट की और हिंसा फैलाई। मैं खुद मानती हूं कि यह अक्षम्य अपराध है। किंतु इससे जॉर्ज फ्लायड की अमानुषिक हत्या को जायज नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन टि्वटर पर कुछ लोगों ने उल्टे जॉर्ज फ्लायड को ही दोषी ठहरा दिया। यही हमारा चरित्र है।


हम अश्वेतों से जितनी घृणा करते हैं, उतनी घृणा तो शायद गोरे भी नहीं करते होंगे। बच्ची अगर काली हुई, तो प्यार करने के बजाय उसे मार डालना हम ज्यादा पसंद करते हैं। हमारा रंगभेद दुनिया में सबसे भीषण किस्म का रंगभेद है। अपने रंगभेद का हम विरोध नहीं करते, इसके खिलाफ सड़कों पर नहीं उतरते। इसकी वजह यह है कि हम अब भी उतने सभ्य नहीं हुए हैं कि विषमताहीन समाज के लिए संघर्ष कर सकें।

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