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दबाव से कैसे मुक्त हों स्वास्थ्यकर्मी

डॉ. आर कुमार,  वरिष्ठ नेत्र विशेषज्ञ Published by: योगेश साहू Updated Wed, 24 Jun 2020 02:05 AM IST
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भारत में कोरोना वायरस - फोटो : pti
जिस तरह से कोविड-19 महामारी ने पूरे देश में अपने पैर पसार लिए हैं, डॉक्टर एवं अन्य स्वास्थ्यकर्मी नायक के रूप में उभरे हैं, जो न केवल बीमार लोगों की सेवा करते हैं, बल्कि भोजन, नींद, आराम, सुरक्षा, मेहनताना और परिवार से भेंट जैसी बुनियादी चीजों से खुद को वंचित रखकर अंत तक इस वायरस से जूझते रहते हैं।


शारीरिक थकावट, मानसिक तनाव जैसे शारीरिक एवं मानसिक चुनौतियों के बीच मरीजों की स्थिति को संभालने और लाशों के ढेरों के बीच खुद को शक्तिहीन महसूस करने के बावजूद स्वास्थ्यकर्मी अद्भुत क्षमता प्रदर्शित करते हैं।


लैंसेट के एक अध्ययन के अनुसार स्वास्थ्यकर्मी महामारी के प्रकोप के दौरान कई तरह के दबावों का सामना करते हैं, जिनमें नौकरशाहों और मरीजों के परिजनों के दबाव, श्रमशक्ति की कमी, भ्रम, भेदभाव, अलगाव, नकारात्मक भावनाओं वाले मरीज और शारीरिक व मानसिक थकावट शामिल हैं।


इन दबावों से मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं, जैसे तनाव, चिंता, अवसाद, अनिद्रा, क्रोध, और भय, जो न केवल स्वास्थ्यकर्मियों की समझ और निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करते हैं, बल्कि उनके शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य पर भी स्थायी प्रभाव डाल सकते हैं।


ऐसे संकट में स्वास्थ्यकर्मियों की सहायता न करने से कई तरह की समस्याएं सामने आ सकती हैं। कुछ स्वास्थ्य कर्मचारी काम छोड़ सकते हैं, काम से बार- बार अनुपस्थित हो सकते हैं, या पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर के शिकार हो सकते हैं, और किसी भी तरह की मानसिक दुर्बलता के शिकार हो सकते हैं।


इसके अलावा, स्वास्थ्यकर्मी भी हम सबकी तरह मनुष्य हैं, जो अत्यधिक तनाव में गलतियां कर सकते हैं, जो मरीजों के लिए ठीक नहीं होगा। कई डॉक्टरों को उनकी विशेषज्ञता क्षेत्र से बाहर आईसीयू में तैनात किया गया है। घर-परिवार से अलग होटलों में रहने पर अकेलेपन की भावना से उन्हें नींद कम आती है, जो अवसाद के लक्षणों और आत्मघाती विचारों से जुड़ी होती है।


चिकित्सा शिक्षा में निहित निरंतर भागदौड़ युवा डॉक्टरों को उनके परिवारों, रोगियों और समुदायों से अलग करती है। चिकित्सा प्रशिक्षण आसान नहीं होता है। औसत चिकित्सक अपना प्रशिक्षण पूरा करने के बाद जब चारों तरफ देखते हैं, तो अपने पेशे को खंडहर के रूप में पाते हैं। इस पेशे में तनाव काफी ज्यादा होता है।
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डॉक्टर हर रोज आत्महत्या कर रहे हैं। कई लोग स्वायत्तता की कमी और इसके लिए आवाज उठाने से हुए नुकसान से दुखी प्रतीत होते हैं। कुल मिलाकर, डॉक्टरों में इस बात को लेकर बहुत गुस्सा और निराशा है कि प्रशिक्षण और ड्यूटी के दौरान कड़ी मेहनत और त्याग के बावजूद उनकी उपेक्षा बढ़ती जा रही है।


उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम और नैदानिक स्थापना अधिनियम लागू होने के बाद विशेष रूप से कई मोर्चों पर उनका अवमूल्यन हो रहा है। 'चिकित्सक' के बजाय 'प्रदाता' शब्द का उपयोग डॉक्टरों के लिए अपमानजनक है।


स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञों ने गलत तरीके से स्वास्थ्य सेवा की लागत बढ़ने का दोष चिकित्सकों पर मढ़ दिया है और कानून बनाने वालों को आगे और चिकित्सक मुआवजा कम करने के तरीके खोजने के लिए प्रेरित किया है। अस्पतालों में चिकित्सकों के बैठने के लिए कम जगहें होती हैं। अगर डॉक्टर इस बारे में शिकायत करते हैं, तो राजनेताओं, प्रेस और साथी चिकित्सकों द्वारा भी उन्हें ‘लालची’ बताया जाता है।


निजी प्रैक्टिस अब लाभप्रद नहीं रह गई है। यह वित्तीय स्थिरता का मामला है। इसके अलावा, क्लिनिक की जगह, उपकरणों की खरीद, स्वास्थ्य रिकॉर्ड को बनाए रखने और प्राधिकरण और बिलिंग मुद्दों से निपटने के लिए कर्मचारियों को रखने की लागतों ने निजी प्रैक्टिस को बहुत मुश्किल बना दिया है।


कई चिकित्सक मदद की गुहार लगाते हैं, पर उनकी कोई सुनने वाला नहीं है। दुखद है कि ऐसे में कुछ लोगों को जीवन का अंत करना ही एकमात्र विकल्प सूझता है। आखिर कौन-सी चीज है, जो शानदार डॉक्टरों को हाशिये पर डाल रही है। हम कॉरपोरेट अस्पतालों की लूट का समर्थन नहीं करते हैं, जो कोविड मरीजों से भारी शुल्क वसूल रहे हैं!
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