सीरिया, अल्जीरिया, लीबिया, मिस्र व अफगानिस्तान के बाद इस समय इराक भीषण गृह युद्ध से जूझ रहा है। इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक और सीरिया (आईएसआईएस) नाम के आतंकी संगठन ने इराक और सीरिया के अपने कब्जे वाले इलाके को इस्लामिक स्टेट और अपने सरगना को मुसलमानों का नया खलीफा घोषित कर दिया है! चिंता की बात यह है कि इराक की इस बर्बादी को रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका सहित बड़ी ताकतें कुछ नहीं कर पा रही हैं।
इराक में जारी गृहयुद्ध की नींव अमेरिका ने 2003 में इराक पर हमला करके रख दी। अमेरिका ने राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को सत्ता से बेदखल कर दिया, मगर जिस लोकतंत्र की स्थापना का उसने वायदा किया था, वह आज तक पूरा नहीं हो सका है। अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने इराक पर हमला कर उसे तहस-नहस कर दिया।
वास्तव में 2003 में वहां की सेना संगठित और अनुशासित थी और उसने अमेरिकी सेनाओं का मुकाबला किया था। लेकिन पराजय के बाद अमेरिका ने सद्दाम हुसैन के वफादार सैनिकों को सेना से बाहर कर दिया। इन्हीं सैनिकों ने पहले 2013 में सीरिया के गृहयुद्ध में हिस्सा लिया और इराक की अमेरिका समर्थित सरकार से नाखुश सुन्नी बहुल क्षेत्र के युवकों को संगठित किया। यही नहीं, आईएसआईएस अल कायदा से अलग हुआ गुट ही है, जिसका सरगना अबु बकर बगदादी है। आज स्थिति यह है कि इराक की सेना इस आतंकी संगठन के आगे बेबस नजर आ रही है।
इस संगठन का उद्देश्य केवल इराक पर कब्जा करना नहीं है, बल्कि वह सीरिया, इस्राइल और कुवैत पर कब्जा करके बड़ा सुन्नी देश बनाना चाहता है। इस संगठन को बल प्रदान करने में अमेरिका की ज्यादतियां व इराक की नूरी अल मालिकी सरकार की कमियों का हाथ अधिक रहा है। इसके खतरे को भांपकर ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरून ने आशंका जताई है कि आईएसआईएस उनके देश में भी हमला कर सकता है।
उधर सऊदी अरब की धमकियों के कारण पड़ोसी ईरान चाहकर भी इराक की शिया सरकार की मदद नहीं कर पा रहा है। आज इराक की आग पूरी दुनिया के लिए खतरा बन गई है। इराक के गृहयुद्ध का प्रभाव एशियाई देशों पर तो पड़ेगा ही, परंतु इसका सबसे बड़ा असर भारत पर पड़ेगा। भारत की तेल जरूरतें ज्यादातर इराक से पूरी होती हैं।
इराक के साथ भारत के व्यापारिक रिश्ते हैं तथा वहां भारतीयों को रोजगार मिलता है। खुफिया रिपोर्ट्स का दावा है कि जेहादी गुटों ने कुछ भारतीय लड़ाके भर्ती किए हैं। अगर हमारे कुछ भटके हुए नौजवान आतंकी गुटों में शामिल होते हैं, तो निश्चय ही वे कभी भारत भी लौटेंगे। अफगानिस्तान, ईरान, सीरिया, अल्जीरिया आदि के अनुभव बताते हैं कि वहां से जो लोग जिहाद के लिए बाहर गए, उन्होंने लौटकर अपनी मातृभूमि को गृहयुद्ध की आग में धकेल दिया।
जेहाद के कारण आज पाकिस्तान तनाव व आंतरिक गृहयुद्ध जैसी स्थिति से गुजर रहा है। इसलिए हमारे देश की सरकार को शिया-सुन्नी सौहार्द को बनाकर रखना चाहिए। इसके अलावा गुप्तचर संस्थाओं को भी चौकन्ना रहना चाहिए।