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पुतिनवाद से मुक्ति का रास्ता

Wed, 19 Mar 2014 06:24 PM IST
थॉमस एल. फ्रीडमैन
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मास्को और वाशिंगटन में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो शीत युद्ध जैसे हालात फिर से पैदा होने की मंशा रखते हैं। मैं उनमें से नहीं हूं। गौरतलब है कि पहले शीतयुद्ध काल में अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में जैसा विकास देखने को मिला, उसकी बड़ी वजह अमेरिका और सोवियत रूस के बीच की प्रतिद्वंद्विता थी। अगर एक बार फिर से वैसे ही हालात पैदा होते हैं, तो मेरी दिली तमन्ना होगी कि इस बार दोनों देशों के बीच प्रतिद्वंद्विता का केंद्र चंद्रमा नहीं, बल्कि पृथ्वी बने। मेरी चाह है कि अमेरिका एक ऐसी ऊर्जा नीति का विकास करे, जिससे तेल और गैस के संदर्भ में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मनमानी पर अंकुश लगाया जा सके। इसका सुखद परिणाम यह होगा कि जलवायु में हो रहे बदलावों पर रोक लगाने वाली तकनीकें बनाई जा सकेंगी।  इतना ही नहीं, तकनीकी और नैतिकता के मामले में अमेरिका को पूरी दुनिया का सिरमौर बनने में मदद मिलेगी, ताकि इस पृथ्वी पर अगली पीढ़ी का जीवन सुनिश्चित हो सके।
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आश्चर्य है कि इतने वर्षों से अमेरिका की ऊर्जा नीति रणनीतिक तौर पर किस कदर पंगु बनी हुई है। दोनों ही राजनीतिक दलों (डेमाक्रेट्स और रिपब्लिकंस) ने देश की अर्थव्यवस्था को किस तरह तेल और ऊर्जा संकट के नाम पर मध्य-पूर्व और लैटिन अमेरिकी देशों का गुलाम बनाकर रख दिया है।

'एनर्जी इनोवेशन' फर्म के मुख्य कार्यकारी हाल हार्वे अमेरिका की नई ऊर्जा रणनीति के लिए जरूरी कारकों को गिनाते हैं। बकौल हार्वे, 'कम खर्च पर भरोसेमंद और स्वच्छ ऊर्जा की प्राप्ति ही नई ऊर्जा नीति का प्रमुख उद्देश्य होना चाहिए। इसके अलावा नई तकनीक का फायदा उठाने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए। आज हम एक बेहतर ऊर्जा तंत्र बनाने की ताकत रखते हैं। हमारी यह पहल ऊर्जा क्षेत्र में तमाम नई तकनीकों को प्रेरित करेगी। नई नीति को अपनाते हुए यह भी ध्यान रखना होगा कि स्वच्छ ऊर्जा आधारित भविष्य के निर्माण में प्राकृतिक गैस के हमारे भंडारों का भी समुचित उपयोग हो।'
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जरूरत इसकी है कि ओबामा रिपब्लिकंस और डेमोक्रेट्स के सामने एक प्रस्ताव रखें। वह यह कि यदि आप सचमुच देश में प्राकृतिक गैस के उत्खनन के लिए तैयार हैं, तेल के स्वतंत्र निर्यात के साथ ही वैश्विक बाजार को इस तरह प्रभावित करने को तैयार हैं, जिससे पुतिनवाद कमजोर पड़े, तो यह सब आपको मिल सकता है, बशर्ते कि आप अमेरिका के स्वच्छ ऊर्जा आधारित भविष्य निर्माण में सहयोग करें।

प्राकृतिक गैस देश के लिए कोई अभिशाप न होकर वरदान है, इस सोच को मजबूती देने के लिए हार्वे का मानना है कि तेल एवं गैस उद्योग और इनके नियंत्रणकर्ताओं को प्राकृतिक गैस के खनन के लिए बनाए गए राष्ट्रीय नियमों को स्वीकारना होगा। खनन के दौरान मीथेन गैस के रिसाव में कमी लाने की योजना भी इन्हीं नियमों के तहत आती है। गौरतलब है कि मीथेन गैस कॉर्बन डाई ऑक्साइड से भी ज्यादा भयानक ग्रीन हाउस गैस है। इसके अलावा हार्वे स्वच्छ ऊर्जा आधारित बिजली के एक राष्ट्रीय मापदंड की जरूरत पर भी जोर देते हैं। इस दिशा में एक उपयोगी पहल यह हो सकती है कि पवन, सौर या परमाणु ऊर्जा जैसे शून्य-कार्बन स्रोतों से मिलने वाली बिजली में हर वर्ष दो फीसदी का इजाफा किया जाए। इससे नवीकरणीय ऊर्जा के लिए एक बाजार पैदा करने में मदद मिलेगी। इसके अलावा हमें अपने अनुसंधान और विकास कार्यक्रमों का निरंतर प्रसार करना होगा, ताकि स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों को बढ़ावा दिया जा सके। ऐसे अनुसंधान भविष्य के लिए भी फायदेमंद साबित होंगे।

गैर-मौद्रिक कार्बन टैक्स भी एक बेहतर उपाय है। यह विचार अमेरिका के 40वें राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के कार्यकाल में विदेश मंत्री रहे और अमेरिका के सबसे सम्मानित राजनीतिज्ञों में शुमार किए जाने वाले जॉर्ज शुल्ट्ज के दिमाग की उपज था।

स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में यह एक उल्लेखनीय पहल है, जो अमेरिका के विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा और पर्यावरणीय नीति के लिए बेहद अहम साबित होगी। अगर नाटो के सहयोगी राष्ट्रों का साथ मिला, तो ऊर्जा को लेकर अपने पड़ोसियों को ब्लैकमेल करने की पुतिन की क्षमता पर अंकुश लगाया जा सकेगा। इससे तेल के मूल्यों में होने वाले उतार-चढ़ाव से भी आम अमेरिकियों का बचाव किया जा सकेगा। चूंकि सौर और पवन ऊर्जा प्रकृति का मुफ्त उपहार हैं, इसलिए इससे हमारे किसान, तटीय शहर और सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र मजबूत होंगे। इससे एक सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि अमेरिका की ऊर्जा नीति की निर्भरता तेल के बजाय नई तकनीकों पर बढ़ेगी।

एक अमेरिकी ऊर्जा कंपनी के प्रबंधक ने एक बार मैक्रो एडवाइजरी पार्टनर्स के सह-संस्थापक नादर मौजाविजादे से कहा था, 'एक ही चीज है जिसका महत्व हम कभी नकार नहीं सकते, और वह है, तकनीकी।' दरअसल तकनीक ही अमेरिका की ताकत रही है। और इसके सही इस्तेमाल के महत्व को अमेरिका नकार नहीं सकता। हेल्थ केयर विधेयक पर समर्थन जुटाने में ही अगर ओबामा अगले ढाई वर्ष बिता दें, तो इससे दुखद कुछ नहीं हो सकता। उन्हें समझना होगा कि यही उनके लिए सही मौका है। दरअसल 'पुतिन-क्रीमिया' घटनाक्रम ने स्वच्छ ऊर्जा आधारित भविष्य की दिशा में कदम बढ़ाने के लिए अमेरिका को एक सुनहरा अवसर दिया है। इसका फायदा उठाकर अमेरिका खुद को मजबूत, रूस को कमजोर और बाकी दुनिया को सुरक्षित बना सकता है।
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