आजादी के बाद उम्मीद की जा रही थी कि भारत में सशक्त जनतांत्रिक सरकार होगी, जिसमें जनता की भागीदारी होगी। लेकिन आज भी सवाल उठता है कि आखिर वह लोकतंत्र कहां है? वास्तविकता तो यही है कि राजनीतिक दलों ने देश में लोकतंत्र आने ही नहीं दिया। संसद के साथ ही राज्यों की विधानसभाओं में भी साफ-सुथरी छवि वाले और निष्पक्ष जन-प्रतिनिधि गिने-चुने ही हैं। सरकार में दलगत राजनीति की झलक साफ देखी जा सकती है। यह ठीक नहीं है। सरकार का चरित्र और चेहरा दलगत राजनीति से ऊपर होना चाहिए। लेकिन, राजनीतिक दल इस पैमाने पर खरे नहीं उतर पा रहे हैं।
स्वतंत्रता के 69 साल बाद भी हमारे देश में लोकतंत्र मजबूत नहीं हो सका है। लोकतांत्रिक व्यवस्था की जड़ें कमजोर करने में कमोबेश सभी राजनीतिक दलों की भूमिका बराबर है। हम आज स्वतंत्र भारत का 70वां जश्न मना रहे हैं। लेकिन अब सभी देशवासियों को अपने भीतर झांककर देखना होगा, क्योंकि आजादी के बाद के वर्षों में विकास तो हुआ, लेकिन गरीबी और अस्पृश्यता जैसी सामाजिक समस्याएं कम होने के बजाय उभरकर सामने आ रही हैं। विकास में सभी जातियों, धर्मों, समुदायों और वर्ग के लोगों की समान भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए। सरकार पर इसके लिए एकजुट होकर दबाव बनाना होगा। व्यवस्था परिवर्तन की भावना सभी देशवासियों में होनी चाहिए। लेकिन, जाति और धर्म के नाम पर जनता को राजनीतिक खेमों में बांट दिया गया है। विडंबना यह है कि हमारे देशवासी भी इस पार्टीतंत्र को ही लोकतंत्र मान रहे हैं। लेकिन ऐसा बहुत दिन नहीं चल पाएगा। यह अच्छी बात है कि हमारा युवा वर्ग इस समस्या से देश को बचाने पर विचार करने लगा है।
स्वतंत्रता के करीब सात दशक बाद भी महिलाओं एवं दलितों को बराबरी के हक के लिए जूझना पड़ रहा है, तो यह हमारे देश और समाज की बड़ी विफलता है। महिला और पुरुष, दोनों एक ही गाड़ी के दो पहिए हैं। समाज में महिलाओं के सम्मान का संस्कार पैदा करना होगा। बच्चों को भी यही सीख देनी चाहिए। लड़का-लड़की में भेद बंद होना चाहिए। इसी तरह दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों को विकास की मुख्यधारा में शामिल किए बिना सर्वांगीण विकास भला कैसे हो सकता है? सवर्ण समाज को भी समरसता के महत्व को समझना होगा। ग्रामीण भारत को विकास के रास्ते पर लेकर जाने के बजाय आज स्मार्ट सिटी की बात हो रही है। विकास के नाम पर उद्योगपतियों के लिए जिस तरह रेड कारपेट बिछाया जा रहा है, उससे तो गरीबी को ही बढ़ावा मिलेगा। सभी वर्ग के लोगों को विकास के बराबर अवसर मिलें, इसकी पहली जिम्मेदारी संसदीय लोक-प्रतिनिधि पर होती है। लेकिन, हमारे जन-प्रतिनिधि अपने इस कर्तव्यबोध से बेपरवाह बने हुए हैं। राजनीतिज्ञों को उनकी जिम्मेदारी का एहसास कराने के लिए जन-दबाव बनाना होगा, जो व्यापक जन-आंदोलन के बिना संभव नहीं है। यह भी समझना होगा कि जन-आंदोलन किसी व्यक्ति, पक्ष या पार्टी के खिलाफ कभी नहीं होता। जब सरकार जनहित को ताक पर रखकर समाज और राष्ट्र के हित के विपरीत अन्याय करती है, उस वक्त लोगों को एकजुट होकर अपने अधिकारों के लिए संविधान के दायरे में रहकर आवाज बुलंद करनी पड़ती है। लेकिन, आंदोलन का मतलब राष्ट्र और उसकी संपत्ति का नुकसान करना बिल्कुल नहीं है।
लोकसभा को लोगों की सभा कहा गया है। मगर वह तो महज पार्टीतंत्र का अड्डा बनकर रह गई है। ऐसे में, हमें आजादी कहां मिली है? गोरे गए और काले आ गए। यही बदलाव हुआ है। सुधार की गुंजाइश अब भी है। भारत को गांवों का देश कहा जाता है। लोकतंत्र की मजबूती के लिए पहल भी गांवों से ही करनी होगी। गांव और ग्रामसभा को सशक्त बनाने की जरूरत है। किसानों के हित के बजाय आज उद्योगों को केंद्र में रखकर विकास की तस्वीर पेश की जा रही है। यह सुनिश्चित करना होगा कि ग्रामीण इलाकों में जल, जंगल, जमीन समेत तमाम प्राकृतिक संसाधनों पर पहला हक स्थानीय ग्रामीणों का ही हो। मौजूदा कॉरपोरेट कल्चर में ऐसा करना जनता के दबाव के बिना कठिन है।
ऐसा नहीं है कि इन सत्तर वर्षों में सब बुरा ही हुआ है। कई क्षेत्रों में देश आगे बढ़ रहा है। लेकिन विकास के रास्ते में सबसे बड़ी समस्या बढ़ती जनसंख्या बनकर खड़ी है। बढ़ती जनसंख्या के साथ कई समस्याएं बढ़ रही हैं। गुणवत्तापरक एवं मूल्यपरक शिक्षा का अभाव, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और नशाखोरी जैसे तमाम मुद्दे हैं, जो सामाजिक असंतुलन पैदा करते हैं। सत्तर साल में ये सारे प्रश्न मिट जाने चाहिए थे। लेकिन, हमारे यहां तो उलटी गिनती चल रही है। किसान आत्महत्या कर रहे हैं। उनका हक दलालों और मंडियों पर कब्जा जमाए लोगों की जेब में जा रहा है। मुश्किल तो यह है कि प्रशासन भी इन्हीं भ्रष्ट लोगों के हित में काम कर रहा है। गांवों को केंद्र में रखकर ही विकास ही योजनाएं बनानी होंगी। खेती को उद्योग का दर्जा मिलना चाहिए। जिस तरह किसी कारखाने का मालिक खुद अपने उत्पाद का एमआरपी तय करता है, उसी तरह किसानों को भी अपनी उपज बेचने का अधिकार होना चाहिए। माल खाए मदारी और नाच करे बंदर! आज किसान की हालत कुछ ऐसी ही है। इस स्थिति को बदलने के लिए लोगों को संगठित होना पड़ेगा।
देश के कई इलाकों को सूखे से अक्सर जूझना पड़ता है। हमें जल प्रबंधन के लिए मजबूत प्रयास करने होंगे। लेकिन सिर्फ गड्ढे खोदकर भूमिगत जल स्तर नहीं बढ़ाया जा सकता। शास्त्रशुद्ध तरीके से पहल जरूरी है। जल प्रबंधन के आधार पर ही खेती का निर्णय करना चाहिए। इसके लिए किसानों को प्रशिक्षण देना होगा। कम पानी और कम लागत में ज्यादा पैदावार हासिल करने के गुर किसानों को सिखाने की जरूरत है। पर देश के गरीब किसानों के लिए संपन्न वर्ग की आंखों में पानी होगा, तभी विकास में वंचितों को उनकी जगह मिल सकेगी। आजादी की 69वीं सालगिरह के अवसर पर हमें सभी वर्ग के विकास का संकल्प लेना चाहिए और जरूरत पड़े, तो संघर्ष के लिए भी तैयार रहना चाहिए। लेकिन बदलाव के लिए सबसे पहले बेहतर नेतृत्व होना जरूरी है। तभी देश में पार्टीतंत्र के बजाय लोकतंत्र स्थापित हो सकेगा।
-सचिन मोहन चोभे से बातचीत पर आधारित