बेहद प्राथमिक स्तर पर देखें, तो आजादी के इतने वर्षों में आज भी जिसकी लाठी उसकी भैंस का रवैया काफी हद तक बरकरार है। औरतों और गरीबों पर अत्याचार हो रहे हैं। मगर गहराई से देखें, तो पाएंगे कि लोगों में काफी बदलाव आया है। जागरूकता आई है। लोगों ने प्रतिक्रिया करनी शुरू कर दी है। प्रतिकार होने लगा है, जो बहुत बड़ी बात है। आज सरकार की, प्रशासन की जवाबदेही पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। अतः सुधार जरूर हुआ है, लेकिन रामराज्य या सुराज की जो कल्पना है, उससे हम दूर हैं। खुशी इतनी है कि अब सबकी आवाज उठने लगी है।
देश में सकारात्मक बदलाव सिर्फ लोगों के जागरूक होने से आ सकता है। उन्हें समझाया जाए कि उनके लिए सही क्या है, गलत क्या है। देश आजाद हुए सत्तर बरस होने को हैं और आम जनता के लिए बहुत कुछ करने की जरूरत है। स्वच्छता, शिक्षा और बिजली, पानी तथा सड़क जैसी मूल सविधाएं सबसे आवश्यक हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जो स्वच्छता अभियान है, इस पर वाकई ध्यान दिया जाना चाहिए, क्योंकि यह पूरे देश में बड़ी समस्या है। न केवल गांवों में, बल्कि शहरों में भी। सबको शिक्षा की भी बहुत जरूरत है।
किसी को दोष देने की बात नहीं है, परंतु वर्षों से जो होना चाहिए था, वह नहीं हुआ। आज लोगों की अपेक्षाएं बढ़ गई हैं। परंतु हमें समझना होगा कि बदलाव में वक्त लगता है। समस्याएं सिर्फ गांवों में नहीं हैं, महानगरों में भी हैं। हम अपने घर से बाहर देखने और जिम्मेदार बनने को तैयार नहीं हैं। हम भूल जाते हैं कि घर के बाहर कदम रखते ही देश शुरू होता है। हमारे लिए पूरा देश और इसका हर नागरिक समान दर्जे का होने चाहिए।
सत्ता पाने की कोशिश में तुष्टिकरण नहीं होना चाहिए। 'भारत माता की जय' बोलना अच्छा है, मगर किसी का धर्म कहता है कि ऐसा नहीं बोलना चाहिए, तो भी मंजूर है। कोई भारत माता की जय बोले या न बोले, इससे देशप्रेम स्थापित नहीं होता। पर अगर कोई देश के टुकड़े करने के नारे लगता है, तो उसे बख्शा नहीं जाना चाहिए। बीते सवा दो साल में मैंने महसूस किया है कि लोगों में देशभक्ति की भावना जाग रही है। भ्रष्टाचार कम हुआ है। सरकारी कामकाज की प्रणाली सुधर रही है। विदेश में हमारी नई छवि उभरी है। मनुष्य के स्वभाव के दो रोचक पहलू हैं। वह अन्याय करता भी है और अन्याय सहन भी नहीं करता। अंततः असत्य की हार होती है, सत्य की जीत होती है। यह बात हमारे डीएनए में है। आज युवाओं की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो चुकी है, क्योंकि वे आबादी का बड़ा हिस्सा हैं। उसे विकास का अर्थ पता है। मैं इससे सहमत हूं कि एवरी यंगमैन टिल द एज ऑफ ट्वेंटीज इज एंटी इस्टेब्लिशमेंट ऐंड बाय थर्टी बिकम द पार्ट ऑफ इस्टेब्लिशमेंट।
हरेक राजनीतिक आंदोलन का स्वागत है, सिवाय एक के। कोई देश तोड़ने की बात करे, तो उसे सहन नहीं किया जाना चाहिए। हम देश को प्यार करेंगे, तो सारी समस्याओं का हल निकल आएगा। सिनेमा से बदलाव की उम्मीद की जाती है। वास्तव में सिनेमा समाज के हालात पर रोशनी डाल सकता है, पर वह कोई क्रांति नहीं ला सकता। कुछ फिल्में जरूर सोचने पर मजबूर करती हैं। फिल्म खत्म होने के बाद जैसे थियेटर में रोशनी आ जाती है, वैसे ही दर्शकों के दिल-ओ-दिमाग में भी आनी चाहिए। यह मैं अच्छे विचारों और सही फिल्मों की निशानी समझता हूं।