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नए टैरिफ का खतरा: भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा का प्रश्न, रणनीतिक स्वायत्तता की परीक्षा

अमर उजाला Published by: Pavan Updated Fri, 31 Jul 2026 07:26 AM IST

सार

अमेरिकी सीनेट में रूस पर नए प्रतिबंधों से जुड़े विधेयक से भारत समेत रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगने की आशंका बढ़ी है। हालांकि यह अभी कानून नहीं बना है, फिर भी इससे वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजार प्रभावित हो सकते हैं। भारत के लिए ऊर्जा स्रोतों में विविधता, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार, घरेलू उत्पादन और हरित ऊर्जा पर तेजी से निवेश करना अब और अधिक जरूरी हो गया है।
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नए टैरिफ का खतरा - फोटो : अमर उजाला


हालांकि, यह कानून राष्ट्रपति के विवेकाधीन होगा, लेकिन इसकी आशंका भर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और निवेश के वातावरण को प्रभावित करने के लिए पर्याप्त है। यह विधेयक अभी कानून नहीं बना है, इसे प्रतिनिधि सभा की मंजूरी मिलना बाकी है और उसके बाद भी इसके क्रियान्वयन में कई राजनीतिक व कानूनी बाधाएं आ सकती हैं। इसके बावजूद, भारत के लिए इसे केवल एक दूर की संभावना मानकर नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा। आज जब भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है और रूस उसका प्रमुख आपूर्तिकर्ता बन चुका है, तब इस तरह की किसी भी अमेरिकी पहल के संभावित प्रभावों का समय रहते आकलन करना जरूरी है।


भारत के लिए चिंता का विषय केवल संभावित शुल्क नहीं, बल्कि उससे उत्पन्न होने वाली व्यापक आर्थिक अनिश्चितता है। रियायती दरों पर रूसी कच्चे तेल के आयात ने पश्चिम एशियाई संकट के बावजूद भारत की ऊर्जा लागत को नियंत्रित रखने, महंगाई पर आंशिक अंकुश लगाने और विदेशी मुद्रा पर दबाव कम करने में मदद की है। फिर भी, किसी एक स्रोत पर अत्यधिक निर्भरता दीर्घकाल में जोखिम पैदा कर सकती है। इसलिए, बदलती वैश्विक परिस्थितियां यह संकेत देती हैं कि ऊर्जा सुरक्षा का अर्थ केवल सस्ता तेल प्राप्त करना नहीं, बल्कि विविध और स्थिर आपूर्ति स्रोत विकसित करना भी है।


इस दृष्टि से यह संतोषजनक है कि भारत रूस के साथ वेनेजुएला, पश्चिम एशिया, अफ्रीका और अमेरिका जैसे अन्य स्रोतों से भी आयात बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। साथ ही, भारत को अपनी दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति पर अधिक गंभीरता से काम करना होगा। रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का विस्तार, घरेलू तेल व गैस उत्पादन को प्रोत्साहन, हरित हाइड्रोजन मिशन, सौर व पवन ऊर्जा में निवेश जैसे कदम अब सिर्फ जलवायु परिवर्तन से निपटने के उपाय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता से भी सीधे जुड़ गए हैं। भारत के लिए यह केवल ऊर्जा सुरक्षा का प्रश्न नहीं, बल्कि रणनीतिक स्वायत्तता की परीक्षा भी है।

 
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