कितनी राहत की बात है कि यह लोकप्रिय आवेग को प्रतिबिंबित नहीं करता है, जिसने पहले ही राजनीति को अस्वीकृति की कवायद बना दिया है। यह सब भारी सांस्कृतिक लहजे से बताया जा रहा है। प्रतिनिधित्व का यही संकट भारत को भी झेलना पड़ रहा है। चाहे वह वर्तमान को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना हो या असहमति का अति-नाटकीयकरण, जो भारत की कहानी को विवाद में बदल देता है। यह संकट आंशिक रूप से हमारी नई-नई उत्सुकता के कारण है कि हम खुद को अपनी कहानी का एकमात्र प्रामाणिक किस्सागो मानते हैं।
इतने लंबे समय तक भारत दूसरों की धारणाओं के बोझ तले दबा रहा, जिनकी नजर एक पूर्व उपनिवेश की दुर्दशा पर ही रहती थी, जो अपनी स्वतंत्रता का ठीक ढंग से इस्तेमाल नहीं कर सका। अगर यह हिंदुस्तान की सांस्कृतिक सनक थी, चीन से परे का आश्चर्य था, जिसने पूर्व से आने वाले यात्रियों के पन्नों को जीवंत कर दिया था, तो यह स्वतंत्रता का अंतिम ह्रास कहा जाएगा, जिसने कैथरीन मेयो (अमेरिकी उपन्यासकार, मदर इंडिया की लेखिका, जिन्होंने भारत को दरिद्रता का घर कहा था) जैसी दुखी आत्माओं को आकर्षित किया।
अवमानना और हीनता ने भारत के मायो संस्करण को, जिसे पढ़ने वाले भी तमाम थे, एक ऐसा संस्करण बना दिया, जिसमें कहानीकार ने सांस्कृतिक रूप से अपनी समझ से परे की बातों को पूरी तरह से नकार दिया। बाद में जो हुआ, वह अलग था। यह नकार नहीं था, बल्कि चोट की तीव्रता थी, जिसने नायपॉल और रश्दी के भारत को अलग कर दिया। एन एरिया ऑफ डार्कनेस, साठ के दशक में अंग्रेजीभाषी दुनिया के लिए भारत के एक शक्तिशाली परिचय के रूप में सामने आई, लेकिन यह भी एक क्रूर वास्तविकता के दर्द को कम नही कर सकती थी।
नायपॉल के लिए यह एक बहस की शुरुआत थी। मिडनाइट्स चिल्ड्रेन में सलीम सिनाई की पहली चीख ने न केवल एक बिल्कुल नई साहित्यिक संवेदनशीलता के आगमन की, बल्कि इतिहास के जुनून और विकृतियों की ओर झुकते भारत की घोषणा भी की। नायपॉल और रश्दी का भारत इस बात का अंतरंग चित्रण था कि इतिहास ने उसे किस चीज से वंचित कर दिया था। फिर वहां अंतरात्मा का रक्षक है, जो प्रगतिशील पाठकों के लिए दयनीय भारत के बारे में लिखता है। यह भारत न्यायविहीन भूमि है, भय का नया गणराज्य है, जहां लोकतंत्र की असहिष्णु प्रवृत्तियां चरम पर हैं। अपनी अंतरात्मा के अनुकूल कारण की तलाश में इतिहासकार इस भारत में राष्ट्रवादियों को मर्दवादी पौराणिक कथाओं पर चलते हुए पाता है। यह अस्वीकृतिवाद के रूप में असहमति है, यह मायोवाद का भारतीयकरण है।
इस भारत को 2014 के आम चुनाव के बाद बढ़त मिली, जब नेहरूवादी भारत की महिमामंडित निश्चितताएं उजागर हुईं। असहमत वर्ग ने स्वतंत्रता के बाद भारत के जीवन में आए सबसे बड़े सांस्कृतिक बदलाव को कुछ छवियों तक सीमित कर दिया। वे वर्जित समाजवादी धर्मनिरपेक्ष राज्य से उबर रहे भारत के साथ बहस करने में कम से कम रुचि रखते थे; वे हिंदू राष्ट्रवादी को देखकर इतने भयभीत हो गए कि उन्होंने इसकी वजह भी नहीं पूछी। उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया। इसकी निंदा की। वे अब भी ऐसा ही कर रहे हैं। अतीत के आचार-विचार को चुनौती देने वाला भारत इतना बड़ा आख्यान है कि इसे अस्वीकारकर्ताओं और जय-जयकार करने वालों, दोनों के लिए नहीं छोड़ा जा सकता। राष्ट्र ने लोकतंत्र की स्वीकृत के बाद यहां वापसी की है। इसे गलत लोकप्रिय आवेग के रूप में पढ़ना लोकतंत्र की इच्छा को कमतर आंकना है, विशेषकर ऐसे समय में, जब कुछ अन्य स्थानों पर राष्ट्रवादी लोकतंत्र को प्रतिबंधात्मक मानते हैं।
हम पूछ सकते हैं कि भारत में परिवर्तन के आकार और विस्तार को वह बौद्धिक प्रतिनिधित्व क्यों नहीं मिलता, जिसका वह हकदार है? ब्रेग्जिट और ट्रंप के उदय के बारे में सोचिए, ये दो घटनाएं हैं, जिन्होंने इस सदी में राष्ट्र को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया। और देखिए कि कैसे इन घटनाओं ने उदारवाद की सीमाओं को रेखांकित किया है। इस बदलाव के कारण चीजें एक स्थान से दूसरे स्थान पर गईं, जिसकी वे हकदार थीं। परिवर्तन की शाब्दिक जटिलताओं के
बावजूद, भारत की कहानी अब भी पर्याप्त रूप से नहीं कही गई है। इसके इतिहासकार या तो दयनीय भारत के वही पुराने रूमानी लोग हैं या फिर विद्वत्ता की प्रामाणिकता से रहित उत्सुक संशोधनवादी हैं। अंतरराष्ट्रीय पाठकों के लिए, भारत को अपने व्याख्याकार या तो संपादन कक्षों से या उदारवादी आक्रोश के अधिक विशिष्ट क्षेत्रों से मिलते हैं।
अंग्रेजी में लिखी गई भारत की कहानी भी ज्यादातर केवल भारतीयों के लिए ही सुलभ है। जब हम यह सुनते हैं कि ‘हम पश्चिम के लिए नहीं लिख रहे हैं’, तो हम वहां सांस्कृतिक संरक्षणवाद की जानी-पहचानी आवाज को अनदेखा नहीं कर सकते। अंतरराष्ट्रीय किताबों की अलमारियों में भारत की अनुपस्थिति शायद हमें हमारी कहानी कहने की सीमाओं के बारे में बताती है। जब भारत जैसा विशाल और धैर्यवान लोकतंत्र अपनी भावनाओं को व्यक्त करता है, धार्मिक अतीत के लागू किए गए वादों को त्यागता है तथा अपने प्राचीनतम संबंधों को पुनः प्राप्त करने वाले राष्ट्र के सांस्कृतिक दृष्टिकोण को अपनाता है, तो इसकी कहानी को व्यापक लोगों तक पहुंचाना आवश्यक हो जाता है। सांस्कृतिक बदलाव की व्यापकता को समझने के लिए बौद्धिक और रचनात्मक इच्छाशक्ति तथा संसाधनशीलता की आवश्यकता है, अन्यथा ऐसा न हो कि भारत अभी तक पूरी तरह से बताई न जाने वाली सबसे बड़ी कहानी बनकर रह जाए।