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मैदान जैसा नहीं हो सकता पहाड़ की सड़कों का मानक

शेखर पाठक
Updated Sun, 09 Aug 2020 06:52 AM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

हर सरकार की आकाक्षाएं होती हैं। वाजपेयी युग में मंत्री खंडूड़ी ने राजमार्गों के विकास में बहुत योगदान दिया। उत्तराखंड में अनेक मार्गों में चौड़ीकरण के कार्य हुए। मोदी सरकार के सबसे काबिल मंत्रियों में गिने जाने वाले गडकरी ने फिर राजमार्गों को गति दी। इस क्रम में उत्तराखंड के चारधामों हेतु एक नई परियोजना घोषित हुई। लगभग 900 किलोमीटर लंबी ‘हर मौसम में खुली सड़क’ परियोजना को पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन (ई.आई.ए.) से बचाने के लिए 53 छोटी परियोजनाओं में विभाजित किया गया था। 100 किमी से अधिक लंबी सड़क के लिए पर्यावरण प्रभाव आकलन अनिवार्य होता है।



संभव है आगे इसे भी हटा दिया जाए। 12,000 करोड़ रुपये की यह परियोजना चारधामों तथा टनकपुर-पिथौरागढ़ के मोटर मार्गों के चौड़ीकरण के लिए थी। दुर्भाग्य से केंद्रीय सड़क और राजमार्ग मंत्रालय ने अपने 2012 के सर्कुलर में नाजुक हिमालय में भी सड़क की चौड़ाई का मानक मैदानी क्षेत्रों का जैसा बनाया। यानी पहाड़ों के लिए मान्य 5.5 या छह मीटर (कुल चौड़ाई आठ मी. तक जाती है) के स्थान पर आठ या 8.5 मी. (कुल चौड़ाई 12 मी. तक) चौड़ी सड़क का निर्माण। यह हिमालय के पर्यावरण को देखते हुए बहुत विध्वंसक और समस्यापूर्ण था। हर जगह कुछ न कुछ विचारवान लोग होते हैं। सड़क मंत्रालय में भी थे। उनकी समझदारी ने 23 मार्च 2018 के नए सर्कुलर में पहाड़ों के लिए सड़क चौड़ाई पांच-सात मी. को ही मान्यता दी और डीएलपीएस यानी डबल लेन विद पेव्ड शोल्डर को अमान्य कर दिया। पर यह सर्कुलर चर्चा में नहीं आ पाया।


जब बड़ी-बड़ी मशीनों से लैस राजमार्ग विभाग के ठेकेदार चारधाम सड़कों का चौड़ीकरण करने लगे तो कुछ नागरिकों ने सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने अगस्त 2019 में रवि चोपड़ा की अध्यक्षता में एक उच्चाधिकार समिति का गठन किया। इस समिति में अनेक वैज्ञानिक तथा सरकारी विभागों के प्रतिनिधि लिए गए। समिति को चारधाम सड़कों की चौड़ाई तय करने के स्पष्ट निर्देश थे। पर 23 मार्च 2018 के सर्कुलर की किसी को जानकारी नहीं थी, वरना यह तो तय हो गया था कि पहाड़ों में सड़कों की चौड़ाई 5.5-7 मी. ही रहेगी। समिति ने सक्रियता से काम किया।


अंतरिम रपट में सभी ने पर्यावरण की चिंता की और एक स्वर में कहा कि चौड़ीकरण नए मानकों के अनुसार न हो। लेकिन फिर किन्हीं अज्ञात कारणों से सरकारी सदस्य बदलने लगे और उन्होंने अधिसंख्य वैज्ञानिकों को भी एक मत कर लिया। इसी बीच सड़क मंत्रालय का सर्कुलर आ गया। अब किसी भी तरह का विवाद थम जाना चाहिए था। वह थमा नहीं, क्योंकि निहित स्वार्थ अपना काम कर रहे थे। अध्यक्ष सहित चार सदस्यों को छोड़ 18 सदस्यों ने अपनी अलग रपट बनाकर पर्यावरण मंत्रालय को सौप दी। अध्यक्ष ने सड़क की चौड़ाई का मानक तय करना सर्वोच्च न्यायालय पर छोड़ दिया है।


दुनिया के पर्वतीय देशों/प्रदेशों में, जो हिमालय के मुकाबले कम नाजुक हैं, भी दो लेन की सड़कें ही प्रचलन में हैं। आल्प्स या स्कैन्डिनेविया के देशों या स्काटलैंड ही नहीं, तिब्बत जैसे पठार में दो लेन वाली सड़कें हैं। उनकी मरम्मत और सुरक्षा का काम जारी रहता है। उत्तराखंड में चारधाम दशकों पहले सड़क मार्ग से जुड़ गए थे (हनुमानचट्टी से यमुनोत्री और गौरीकुंड से केदारनाथ तक क्रमशः छह तथा 15 किमी के पैदल मार्ग हैं)। भागीरथी, अलकनंदा या पूर्वी धौली (काली की सहायक) में स्थापित जलविद्युत परियोजनाओं के कारण पहले ही सड़कें चौड़ी हो चुकी थीं। खंडूड़ी युग में पुनः सड़कों का चौड़ीकरण हुआ, जिससे जनित भूस्खलन अभी तक सक्रिय हैं।


उत्तरकाशी से ऊपर राष्ट्रीय राजमार्ग 108 में हस्तक्षेप ईको जोन होने से रुका है। अन्यत्र जैसे राजमार्ग 125 में टनकपुर से पिथौरागढ़ के बीच 174 संभावित स्थानों में से 102 पर भूस्खलन आ गए हैं। बांसबाड़ा, धरासू पुल, लाम बगड़ और लोहाघाट-पिथौरागढ़ के बीच तथा धारचूला से आगे लिपुलेख मार्ग से लगातार भूस्खलनों के समाचार आ रहे हैं। जबकि अभी वर्षा अपने चरम रूप में नहीं आई है। अंग्रेजी में इन भूस्खलनों को ’स्लोप फेलियर’ कहा जाता है पर यह ‘सोच फेलियर’ है। इसलिए अभियांत्रिक तथा प्रशासनिक विफलता भी है।


2015 में टौल टैक्स से अधिक कमाई के लिए अति चौड़ी सड़क का मानक ‘डबल लेन विद पेव्ड शोल्डर’ बनाया गया। पहाड़ी क्षेत्रों में यह संभव नहीं है। आगंतुक पहाड़ों में कार रेस के लिए नहीं आ रहे हैं। यहां अधिकांश जन परिवहन (बसें, जीपें तथा टैक्सियां) प्रचलन में हैं। चारधाम नवंबर से मई के बीच बर्फ से ढके रहते हैं। यह पारिस्थितिक संतुलन की प्रकृति प्रदत्त व्यवस्था कही जा सकती है। इसीलिए जाड़ों में चारों धाम क्रमशः जोशीमठ, उखीमठ, मुखवा और खरसाली आ जाते हैं। यह सदियों में विकसित समझदारी है। एक बार नारायणदत्त तिवारी भी उत्साह में कह गए कि चारधाम सालभर खुले रहें। जब उन्होंने माकूल तर्क सुने तो चुप हो गए। जैसे समझ में आने के बाद नदी जोड़ो परियोजना से दिवंगत राष्ट्रपति कलाम ने अपने को अलग कर लिया था।
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यहीं पर विज्ञान सम्मत और नैतिक होने का सवाल है। क्या वैज्ञानिक अपनी बात कहने से डिगने लगे हैं। क्या उत्तराखंड के अधिकारी, अभियंता, वैज्ञानिक हाल के सालों की सड़क और भूस्खलन से जुड़ी दुर्घटनाओं को भूलने का जोखिम उठा सकते हैं ? (हिमालयी मुद्दों के विशेषज्ञ और पहाड़ के संपादक)

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