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देशभक्ति का मौसम

Wed, 13 Aug 2014 07:34 PM IST
अशोक सण्ड
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जिस प्रकार तेज जुकाम से पहले छींकें आती हैं और नाक बहने लगती है, उसी प्रकार राष्ट्रीय उत्सव के आगमन से पूर्व वातावरण में देशभक्ति के लक्षण नजर आते हैं। राजधानी की लालबत्तियों पर रुकी गाड़ियों के शीशे खटखटा तिरंगा बिकने लगता है। गली-मुहल्लों में लाउडस्पीकर पर हेमंत कुमार के कंठ से बच्चों से इंसाफ की डगर पर चलने की सालाना नसीहत के साथ यह एहसास दिलाया जाता है कि ये देश तुम्हारा है और नेता तुम्ही हो कल के।
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एक बार फिर रफी साहब न केवल डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती हैं बसेरा, वह भारत देश है मेरा की टेर लगाएंगे, बल्कि अपने अंदाज में देश है वीर जवानों का अलबेलों का मस्तानों का अलापते फिरेंगे। अपनी लता दी भी कुर्बानी करने वालों की याद में वतन के लोगों से आंख में पानी भरने का विनय करती सुनाई पड़ जाती हैं। माहौल भारी न हो, इस वास्ते ऑन पब्लिक डिमांड चिकनी चमेली से लेकर बलम पिचकारी और बदतमीज दिल की टेर पर डांस कर बीच-बीच में रिलैक्स हो लेते हैं देश के आजाद नागरिक।

स्वतंत्रता दिवस की ऑफिशियल शुरुआत पंडित नेहरू के समय से राजधानी स्थित लाल किले से ही हुई। देशवाशियों को वहीं से हमारे प्रधानमंत्रियों के जरिये ज्ञात होता है कि कौन-कौन-सी शक्तियां देश को दुर्बल बनाने में सक्रिय हैं। खुली गाड़ी और काली वर्दी के बगैर चलने वाले नेताओं की स्वतंत्रता गुजरे जमाने की बातें हैं। उत्तर आधुनिक भारत के पीएम अपने काफिले के साथ बुलेट प्रूफ गाड़ी से बुलेट प्रूफ मंच पर पहुंच खंड-खंड होती अखंडता को पिरोने और गिरते चरित्र को उठाने का आह्वान करते हैं। किसान और जवान भी विशेष याद आते हैं इस दिन।
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कभी आराम हराम है, फिर जय जवान जय किसान उसके बाद गरीबी हटाओ फिर जवान और किसान से जुड़ता विज्ञान। लाल किले के प्राचीर से इस बार नए प्रधानमंत्री क्या नया जोड़ेंगे, यह कल ही ज्ञात होगा। सुनते हैं, राष्ट्र के नाम उनके संदेश को मंत्रिमंडल के चार रत्न तैयार कर रहे हैं। आखिर वह सबका साथ सबका विकास के हिमायती जो ठहरे।
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