उच्चतम न्यायालय ने लोकपाल की नियुक्ति का मामला फिर से सतह पर ला दिया है। पता नहीं, हमारे देश की स्मृति कैसी है! जिस लोकपाल के लिए देश भर में अभियान चला और ऐसा वातावरण बना कि राजनेताओं ने स्वीकार किया कि अब हमें लोकपाल को मूर्त रूप देना ही पड़ेगा, वह मुद्दा ही मोदी सरकार के गठन के साथ नेपथ्य में चला गया। आश्चर्य की बात है कि इसके लिए कोई आवाज नहीं उठ रही है। यह तो कॉमन कॉज नामक संस्था की याचिका का कमाल है कि उच्चतम न्यायालय ने सरकार को आड़े हाथों लिया और यह मामला फिर से सुर्खियों में आ गया।
दिसंबर 2013 में संसद ने इस कानून को पारित तो कर दिया, पर कानून से आगे लोकपाल नामक संस्था को जन्म भी देना है, यह पूर्व सरकार भूल गई और वर्तमान सरकार भी इस दिशा में कोशिश करती नहीं दिख रही है। खैर, अब जब उच्चतम न्यायालय ने इस मुद्दे को सुर्खियों में ला दिया है, तो सरकार को इसके लिए एक समय सीमा तय करनी होगी।
लोकपाल की नियुक्ति के बिना लोकपाल कानून पारित होने का कोई मतलब नहीं रह जाता है। कानून तो इसलिए बना कि उसके अनुसार लोकपाल नियुक्त हो और अपनी भूमिका का निर्वहन कर सके। उस कानून में लोकपाल की नियुक्ति के लिए जिस आठ सदस्यीय चयन समिति की व्यवस्था है, उसमें विपक्ष के नेता के होने का भी प्रावधान है और इस समय लोकसभा में विपक्ष का कोई नेता नहीं है। यह नियुक्ति में एक बड़ी बाधा है। जाहिर है, इसके लिए कानून में संशोधन करना होगा। विपक्ष के नेता की जगह विपक्ष के सबसे बड़े दल के नेता शब्द डालना होगा या राज्यसभा में विपक्ष के नेता को इसमें शामिल कर लेना होगा। हालांकि सरकार ने इससे संबंधित एक विधेयक सदन में पेश किया है। केंद्र की ओर से शीर्ष न्यायालय को बताया गया कि विधेयक संसद में लंबित है। प्रश्न है कि यह विधेयक कब तक लंबित रहेगा और इसके नाम पर लोकपाल की नियुक्ति कब तक नहीं होगी?
आश्चर्य की बात तो यह है कि वर्तमान मुख्य विपक्षी दल, जिसने अपने कार्यकाल में इसे पारित कराया, उसकी भी रुचि लोकपाल की नियुक्ति में नहीं दिखती है। साफ है कि तमाम मतभेदों के बावजूद लोकपाल की नियुक्ति अधर में लटकी रहे, इसे लेकर राजनीतिक दलों में लगभग एकता है। न्यायालय ने महाधिवक्ता से जिस कड़े अंदाज में पूछा कि सबसे बड़े विरोधी दल के नेता को चयन समिति में शामिल करने के लिए वह आदेश क्यों नहीं दे सकता, उससे सरकार पर दबाव बनना स्वाभाविक है। यदि उच्चतम न्यायालय ने यह आदेश दे दिया कि सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता को शामिल कर आप नियुक्ति कीजिए, तो सरकार के पास क्या विकल्प बचेगा? संभव है कि न्यायालय के रुख को देख सरकार स्वयं संशोधन विधेयक आगे बढ़ाए या विपक्ष के कुछ नेता लोकपाल के गठन की मांग उठाएं।
वास्तव में नरेंद्र मोदी सरकार दावा करती है कि वह भ्रष्टाचार पर पूरी तरह असहिष्णुता की नीति अपना रही है। उसने कई कदम उठाए भी हैं, लेकिन लोकपाल जैसी संस्था का होना भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए अपरिहार्य है। साढ़े चार दशक से ज्यादा समय के बाद जो लोकपाल कानून हमें मिला है, वह बेहतर, सख्त, सरकार के नियंत्रण से स्वायत्त व पारदर्शी है। पर इसका तब तक कोई अर्थ नहीं है, जब तक लोकपाल की नियुक्ति न हो और यह काम करना शुरू न करे। अगली सुनवाई में सरकार न्यायालय को क्या जवाब देती है यह देखना होगा। लेकिन देश चाहेगा कि जितनी जल्दी हो लोकपाल की नियुक्ति की प्रक्रिया आरंभ हो।