संसद पिछले कई वर्षों और दशकों के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव की गवाह रही है। मौजूदा गतिरोध प्रधानमंत्री की पांच सौ और हजार रुपये को अमान्य घोषित करने के कदम की पृष्ठभूमि में संसद में उनकी उपस्थिति की विपक्ष की मांग से जुड़ा है। दोनों सदनों में विपक्षी पार्टियां मांग कर रही हैं कि उन्हें संसद में मौजूद रहकर चर्चा सुननी चाहिए और जवाब देना चाहिए। प्रधानमंत्री ने इस घोषणा के बाद इस विषय पर उत्तर प्रदेश के गाजीपुर, आगरा और कुशीनगर में अपने भाषण में काफी कुछ कहा है; इसके अलावा संसद की लाइब्रेरी में एक किताब के विमोचन के कार्यक्रम में भी वह इस पर बोल चुके हैं, लेकिन विपक्ष की मांग के बावजूद उन्होंने इस पर संसद में कुछ नहीं कहा है।
ऐसा समय भी था, जब संसद का सत्र चल रहा होता था, तब कोई तत्कालीन प्रधानमंत्री विदेश नहीं जाता था और नीतिगत मुद्दों पर संसद से बाहर कुछ नहीं बोलता था। प्रधानमंत्री पहले संसद में बोलते थे और उसके बाद ही संसद से बाहर किसी नीतिगत मसले पर विचार रखते थे। इसके पीछे संसदीय लोकतंत्र में संसद के महत्व को रेखांकित करना था और अंततः प्रधानमंत्री संसद के प्रति जवाबदेह होते हैं। यह किसी व्यक्ति का मामला नहीं है, इसके पीछे यही भावना थी कि अंततः यह संस्थान से संबंधित है। संसद एक संस्था है, और प्रधानमंत्री का पद भी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आठ नवंबर की रात को एक राष्ट्रीय प्रसारण में जो घोषणा की थी, वह हर भारतीय से जुड़ी हुई है। उन्होंने ही संकेत दिए थे कि इस फैसले के बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी थी। ऐसे में उनसे अपेक्षा है कि वह इससे जुड़े प्रश्नों का संसद में जवाब दें। बृहस्पतिवार को प्रधानमंत्री राज्यसभा गए थे, यह दिन प्रश्न पूछने का दिन था। उनके आने के तुरंत बाद नोटबंदी पर बहस भी शुरू हो गई थी। उन्होंने मनमोहन सिंह को सुना भी, जिन्होंने इस फैसले को 'प्रबंधन की विशाल विफलता' करार दिया था। यहां तक कि वह तब अपनी हंसी नहीं रोक पाए थे, जब समाजवादी पार्टी के नरेश अग्रवाल ने कहा कि लोगों के मुताबिक वित्त मंत्री अरुण जेटली तक को इसकी जानकारी नहीं थी और खुद जेटली ने उनके कान में फुसफुसा कर यह कहा था। भोजनावकाश के समय मोदी मनमोहन सिंह के पास तक चलकर भी गए और उनसे हाथ भी मिलाया। मगर भोजनावकाश के बाद वह सदन में नहीं आए। अरुण जेटली ने विपक्ष को आश्वस्त किया कि प्रधानमंत्री बाद में आएंगे और बहस में हस्तक्षेप भी करेंगे, पर दुर्भाग्य से विपक्ष ने राज्यसभा में कार्यवाही चलने ही नहीं दी। अगले दिन प्रधानमंत्री ने विपक्ष के प्रति अपना रुख और कड़ा कर लिया। अब स्थिति यह है कि संसद का शीतकालीन सत्र ठप होता दिख रहा है।
विपक्ष का काम है कि वह सत्तारूढ़ दल से सदन में कठोर प्रश्न करे और उसे कठघरे में खड़ा कर दे, मगर विपक्षी दल बुरी तरह बंटे हुए हैं। माकपा के सीताराम येचुरी ने तो यहां तक कहा है कि हम सब अलग चलेंगे, लेकिन एक साथ मिलकर हमला करेंगे। तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी नोटबंदी के फैसले को वापस लेने की मांग कर रही हैं। कांग्रेस फैसला वापस लेने के पक्ष में नहीं है, वह चाहती है कि इस पर बेहतर तरीके से अमल हो, लोगों को तकलीफ न उठानी पड़े और कथित तौर पर भाजपा से जुड़े लोगों को पहले से जानकारी होने से संबंधित इस 'घोटाले' की जांच जेपीसी से कराई जाए। वाम दलों ने सोमवार को बंद का आह्वान किया था। तृणमूल, कांग्रेस, सपा और बसपा ने बंद का विरोध किया और खुद को धरना और प्रदर्शन तक सीमित रखा। इसलिए नोटबंदी को लेकर बंटे हुए विपक्ष के हमले का सरकार पर कोई असर नहीं हुआ।
यों, जनता दल (यू), बीजू जनता दल और अन्नाद्रमुक ने प्रधानमंत्री के प्रति नरम रुख दिखाया है, मगर लोगों का ध्यान बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा इस मुद्दे का समर्थन किए जाने की ओर कहीं अधिक गया है। दरअसल नीतीश कुमार ने भाजपा से नाता तोड़ा ही था मोदी की वजह से और बिहार में उन्होंने भाजपा को पराजित भी किया। उन्हें 2019 के चुनाव में गैर भाजपा दलों के फ्रंट के उन संभावित नेताओं के रूप में भी देखा जा रहा था, जो मोदी को चुनौती दे सकते हैं। नीतीश काले धन की नकेल कसने के लिए नोटबंदी का समर्थन करने के अपने कदम पर कायम हैं, मगर इसके खराब अमल को लेकर सवाल भी उठा रहे हैं। लेकिन इस सवाल को हवा में नहीं उड़ाया जा सकता कि क्या वह जद(यू) और राजद के तनावपूर्ण संबंधों के कारण लालू प्रसाद की नकेल खींचना चाहते हैं? या फिर वह खुद को राजनीतिक रूप से फिर से स्थापित करने के साथ ही अपनी रणनीति बनाना चाहते हैं, ताकि वह कालेधन की मुहिम के खिलाफ न दिखें?
मेरे मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या विपक्षी दलों ने समय से पहले ही अनुमान लगा लिया कि लोग गुस्से में हैं। राजनीति में कोई भी कदम उठाने से पहले हमेशा मनोवैज्ञानिक क्षणों का महत्व होता है। बड़ी संख्या में लोगों ने नोटबंदी का स्वागत किया है; वे इसे ऐसे कदम के रूप में देख रहे हैं, जिससे व्यवस्था से कालेधन और भ्रष्टाचार का सफाया हो सकता है। वे उन खबरों से खुश हुए हैं, जिनके मुताबिक कुछ अमीरों ने अपने 'काले नोट' गंगा में बहा दिए या कूड़े में डाल दिए। मगर जिस तरह से नकदी की कमी है, किसानों को बीज और अन्य जरूरी चीजें खरीदने में दिक्कतें आ रही हैं, ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को बैंक से राहत नहीं मिल रही है, यह स्थिति लंबी खिंचती है, तो लोगों की इस परेशानी को गुस्से में बदलते देर नहीं लगेगी।
लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी इंदिरा गांधी के 'गरीबी हटाओ' जैसी पहल के जरिये गरीबों और जरूरतमंदों के उस वर्ग तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं, जो पारंपरिक रूप से भाजपा का पक्षधर नहीं माना जाता था। मगर इसका विपरीत असर भी पड़ सकता है। उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य का चुनाव नजदीक ही है, इस पर मोदी के साथ ही विपक्षी दलों का भाग्य भी दांव पर होगा।