देश की मौजूदा राजनीतिक परिस्थिति कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से मांग करती है कि वह सख्ती से आत्मनिरीक्षण करें और अपनी दादी इंदिरा गांधी से कुछ सबक सीखें, जिन्होंने प्रतिकूल परिस्थिति में श्रेष्ठ प्रदर्शन किया था। राहुल को यह भी समझना चाहिए कि राजनीतिक संदर्भ में वफादारी सशर्त, अस्थायी और अत्यधिक खराब होने वाली चीज है। प्रतिकूल समय में विश्वासघात आम बात है, लेकिन एक सच्चे नेता को सोचना चाहिए कि वह खुद वफादारों/जनता को संतुष्ट करने में विफल हो रहा है या उसके साथ धोखा किया जा रहा है।
राहुल दिवंगत राजनारायण के उस धन्यवाद भाषण को भी याद कर सकते हैं, जो उन्होंने 1977 के आम चुनाव में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को हराने के बाद रायबरेली में दिया था। अपनी विनोदप्रियता और भोलेपन के बावजूद राजनारायण एक गंभीर और सोचने वाले राजनेता थे। बताया जाता है कि उन्होंने इंदिरा गांधी को धोखा देने वाले मतदाताओं से साफ कह दिया था कि वे उनसे कोई अपेक्षा न करें। कहा जाता है कि उन्होंने यह टिप्पणी की थी कि रायबरेली के मतदाताओं ने अपनी 'देवी जैसी नेता' (इंदिरा) तक को नहीं बख्शा। उन्हें इस बात का भ्रम नहीं था कि आने वाले वर्षों में मतदाता उनके साथ क्या व्यवहार करेंगे। राजनारायण अपने निर्वाचन क्षेत्र का दौरा करने और वहां के लोगों के प्रति लाड़ जताने से सख्ती से बचते रहे।
आज शासन के मामले में कांग्रेस मुक्त भारत का खतरा वास्तविक लग रहा है और राहुल गांधी का भविष्य निराशाजनक है। बिहार में महागठबंधन के अचानक पतन ने एक बार फिर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता की विफलता उजागर की है। मौजूदा दौर में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी भी असहाय रणनीतिकार के रूप में नजर आ रही हैं। उनके राजनीतिक सचिव अहमद पटेल को पांचवीं बार राज्यसभा का पद देने का कोई औचित्य नहीं है, जो 1993 से लगातार संसद के उच्च सदन राज्यसभा के सदस्य हैं। अहमद पटेल संसद से बाहर अपनी भूमिका निभाने में सक्षम हैं। इसलिए यह काफी हैरान करने वाला है कि सोनिया गांधी क्यों उन्हें बार-बार वफादारी का इनाम देती हैं।
राहुल गांधी और कांग्रेस, दोनों को जागने और सक्रिय होने की जरूरत है। नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली भाजपा को रोकने का विचार असंभव नहीं, तो मुश्किल जरूर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तेजी से प्रेरक बन रहे हैं और लोगों के बीच उनकी लोकप्रियता दिनोंदिन बढ़ रही है। इसलिए जिस तरह इंदिरा हटाओ अभियान कामयाब नहीं हुआ था, उसी तरह मोदी हटाओ अभियान से ही काम नहीं चलने वाला है। जेरेमी कोर्बिन (ब्रिटेन में विपक्ष के नेता) के विपरीत, राहुल विचारधारा या मूल्यों पर टिके रहने में असमर्थ हैं। कांग्रेस के भीतर से उन पर दबाव इतना ज्यादा है कि वह अक्सर अपने सहज ज्ञान और इच्छाओं के विपरीत काम करते हैं। वाम और दक्षिणपंथी विचारधाराओं ने अपने सिद्धांतों पर टिके रहकर जो कुछ हासिल किया, राहुल उनका अनुकरण करने में असमर्थ हैं।
देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के लिए महागठबंधन और इंद्रधनुषी गठबंधन के बजाय बुनियादी बातों पर लौटना चाहिए। कांग्रेस को फिर से अपनी प्रासंगिकता साबित करने और योजनाओं को अंजाम देने के लिए छोटे-छोटे कदम उठाने की जरूरत है। उसे अपनी छोटी-छोटी इकाइयों और समूहों को फिर से संगठित कर मजबूत बनाने की जरूरत है, जो पार्टी के पुराने सिद्धांतों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। संघ परिवार ने 1940-50 के दशक से 1980-90 के दशक में जो दर्जनों संगठन बनाए, और जो कांग्रेस और नेहरू-गांधी प्रतीकों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते रहे, उन्हें अब गति और सार्वजनिक समर्थन मिला है। समय का चक्र कुछ ऐसा है कि थिंक टैंक, स्थानीय-लोकप्रिय अभियानों, सामान्य ज्ञान और अपनी विचारधार पर टिके रहने से ही नतीजे आएंगे।
जब कांग्रेस उपाध्यक्ष को इतना ही भरोसा था कि बिहार के मुख्यमंत्री दूसरी तरफ जाने मन बना चुके हैं, तो फिर उन्होंने नीतीश कुमार से मिलने का फैसला क्यों किया? समय रहते ही तेजस्वी से इस्तीफा दिलवाकर नीतीश और भाजपा की योजना को फलीभूत होने से रोका क्यों नहीं गया? राहुल के लिए यह एक अच्छा अवसर था, जब वह महागठबंधन सरकार से अपने मंत्रियों को बाहर खींचकर यह दिखाते कि भले ही वह स्वयं परिवारवादी राजनीति के लाभार्थी हैं, पर एक सीमा से ज्यादा वह इसके खिलाफ हैं। इसके बजाय सोनिया गांधी ने तेजस्वी के साथ खड़े होना पसंद किया, और इस तरह उन्होंने जनता में अपनी और पार्टी की छवि खराब होने दी।
राहुल को समझना चाहिए कि उनका परिवार और कांग्रेस, दोनों तीसरे मोर्चे के नेताओं से निपटने में असमर्थ हैं। यह 1996-97 के संयुक्त मोर्चा सरकार के दौरान स्पष्ट हो गया था, जब कांग्रेस नेतृत्व ने देवगौड़ा और गुजराल सरकार पर कहर बरपाया था। निजी तौर पर कांग्रेस के ज्यादातर वरिष्ठ नेता जनता परिवार के नेताओं के प्रति उनके जाति आधारित समीकरण, गंवारू आचरण और अपने हित में अप्रत्याशित ढंग से पलटी मारने की क्षमता के कारण बेहद तिरस्कार की भावना और खराब राय रखते हैं।
मौजूदा दौर में पार्टी कांग्रेस कार्य समिति की सलाह के बिना ही बड़े फैसले करती है। कांग्रेस ने जब उत्तर प्रदेश में सपा से गठजोड़ का फैसला किया, तो पार्टी की राज्य इकाई तक की सलाह नहीं ली गई। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने गठबंधन का प्रस्ताव रखा, लेकिन कांग्रेस ने वाम दलों के साथ गठजोड़ किया। नोटबंदी और जीसटी का विरोध सिर्फ घबराहट में किया गया। वर्ष 2019 में कांग्रेस की चुनावी संभावना तो धूमिल है ही, जिस तरह से सोनिया-राहुल पार्टी को चला रहे हैं, उसका अस्तित्व भी निराशाजनक दिख रहा है। कोई हैरानी नहीं कि 2018 में भारत के नक्शे पर पंजाब को छोड़कर कोई भी ऐसा राज्य न दिखे, जहां कांग्रेस का शासन हो।