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बांग्लादेश में बदले की सियासत: यह संशोधन लोकतंत्र के लिए खतरनाक

तस्लीमा नसरीन
Updated Thu, 23 Apr 2026 08:35 AM IST

सार

बांग्लादेश की संसद में आतंक विरोधी कानून में संशोधन कर अवामी लीग को प्रतिबंधित करने का जो फैसला लिया गया है, वह गंभीर सवाल खड़े करता है। पहले इस कानून के जरिये कभी किसी व्यक्ति के अपराध के लिए उसकी पार्टी को जिम्मेदार ठहराने का प्रावधान नहीं था। यह संशोधन लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।
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बांग्लादेश में बदले की सियासत - फोटो : अमर उजाला


राजनीतिक पार्टियों पर प्रतिबंध लगाने की प्रवृत्ति नई नहीं है, लेकिन यह रास्ता गणतंत्र को धीरे-धीरे ध्वंस के रास्ते पर धकेल देता है। आज जो लोग यह मानकर चल रहे हैं कि एक बड़ी पार्टी को प्रतिबंधित कर वे राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से बच जाएंगे, वे या तो इतिहास नहीं जानते या संभवत: इतिहास की भयावह परिणति की उपेक्षा कर रहे हैं। एक पार्टी को प्रतिबंधित करने का मतलब सिर्फ नेताओं की नहीं, बल्कि करोड़ों वोटरों की आवाज बंद करना है। किसी पार्टी पर प्रतिबंध लगाने से राजनीति खत्म नहीं हो जाती, बल्कि वह नेपथ्य में चली जाती है। इससे अतिवाद, हिंसक भावना व राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के बढ़ने की आशंका पैदा होती है।


किसी देश की बड़ी राजनीतिक पार्टी को प्रतिबंधित करने पर उस देश की लोकतांत्रिक छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्षतिग्रस्त होती है। निवेश, कूटनीति और वैश्विक संबंधों पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ता है। किसी पार्टी के खिलाफ भ्रष्टाचार, तानाशाही और हिंसा के गंभीर आरोप क्यों न हों, उन सबकी जांच और गलत नीतियों में सुधार लाना जरूरी है, प्रतिबंध इसका समाधान नहीं है। प्रतिबंध लगाए जाने पर उसके समर्थक खुद को वंचित और उपेक्षित समझने लगते हैं। इससे संघर्ष, प्रतिशोध और अस्थिरता का माहौल बनने की आशंका होती है। प्रतिबंधित पार्टी को कई बार जनता ‘पीड़ित’ तथा ‘अन्याय का शिकार’ समझती है। इससे ऐसी पार्टी के प्रति सहानुभूति उमड़ती है, जो भविष्य में उसे और ताकतवर बना सकती है।


किसी राजनीतिक पार्टी को थोड़े समय के लिए तो हटाया जा सकता है, लेकिन दीर्घावधि में इसका नतीजा बदला, जवाबी बदला और अनिश्चय के रूप में सामने आता है, जो किसी भी राष्ट्र के लिए नुकसानदेह है। इतिहास में इसके भयावह उदाहरण हैं। वर्ष 1933 में जर्मनी के संसद भवन में आग लगने की घटना को आधार बनाकर हिटलर ने कम्युनिस्ट पार्टी पर प्रतिबंध लगा दिया था। फिर, एक के बाद एक सभी राजनीतिक दलों को प्रतिबंधित किया गया। नतीजतन, बहुदलीय लोकतंत्र एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द सिमट गया। बांग्लादेश का इतिहास खुद इसका उदाहरण है। वर्ष 1971 में पाकिस्तानी शासक याह्या खान ने अवामी लीग पर प्रतिबंध लगा दिया था। क्या उससे वह पार्टी खत्म हो गई? नहीं, इसके बजाय उस पार्टी ने ही मुक्ति युद्ध का नेतृत्व कर स्वतंत्र बांग्लादेश के गठन में अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी, यानी जिस पार्टी का ठोस सामाजिक-राजनीतिक आधार हो, प्रतिबंध लगाकर भी उसे मिटाया नहीं जा सकता।


मुस्लिम विश्व के अधिकांश देशों में लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की जगह सीमित है। उस दृष्टि से बांग्लादेश का मुस्लिम देशों में विशिष्ट स्थान था। लेकिन अब वहां की राजनीतिक तस्वीर बदल चुकी है। बांग्लादेश की संसद में इस्लामी जिहादियों का प्रवेश हो चुका है, जो लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के लिए बड़ी चिंता की बात है। धर्म आधारित राजनीति सिर्फ राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को ही विकृत नहीं करती, बल्कि धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर भी हमला करती है, महिलाओं के अधिकारों पर हमला करती है, मानवाधिकारों का उल्लंघन करती है, और संविधान की मूल नीति का भी उल्लंघन करती है। राष्ट्र में धर्म को प्रधानता मिलने पर कानून, शिक्षा, नीति-सभी क्षेत्रों में नागरिकों को समान अवसर दिए जाने की नीति भी बाधित होती है। ऐसे में, अवामी लीग को प्रतिबंधित करने का फैसला सिर्फ उस पार्टी को नहीं, बल्कि पूरी राजनीतिक व्यवस्था को ही संकट की ओर धकेल दे रहा है। बदले की राजनीति से बाहर निकलकर कानून के शासन, लोकतांत्रिक प्रक्रिया और जनता के फैसलों के प्रति सम्मान दिखाना ही लोकतंत्र को बचाए रखने का एकमात्र ठोस रास्ता है। नहीं तो, यह सिलसिला चलता रहेगा, जिससे राष्ट्र और लोकतंत्र, दोनों को बेहद नुकसान उठाना पड़ेगा।


बड़ी राजनीतिक पार्टी पर प्रतिबंध लगाए जाने से वोटिंग के विकल्प सीमित होने पर सत्ता पर एकदलीय या नियंत्रित व्यवस्था के स्थायी होने की आशंका बढ़ती है। ऐसे में, कट्टरवादी या अलगाववाद में विश्वास करने वाली पार्टी को मजबूती मिल सकती है। इससे राजनीतिक संतुलन खत्म हो सकता है, जो देश की स्थिरता को नुकसान पहुंचाता है।


किसी राजनीतिक दल को प्रतिबंधित करने पर सवाल उठता है कि कानून कितना निरपेक्ष है। अगर कानून का इस्तेमाल राजनीति के हथियार के तौर पर किया गया, तो सत्ता की राजनीति और कानून-व्यवस्था पर से भरोसा डगमगाता है। चुनाव आयोग, संसद, न्यायपालिका- ये सब अगर सत्ता की राजनीति के प्रभाव के दायरे में आ गए, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर हो जाती है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस प्रतिबंध से एक खतरनाक नजीर बन सकती है। ऐसे में, कोई भी राजनीतिक पार्टी खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करेगी। लोकतंत्र की असली शक्ति प्रतिस्पर्धा में है, प्रतिबंधों में नहीं। अगर कोई राजनीतिक पार्टी सचमुच जनसमर्थन खो बैठती है, तब मतदाता ही वोट की ताकत से उसे खारिज कर देंगे। वही रास्ता अपनाना चाहिए।
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राजनीतिक दलों को प्रतिबंधित करना कभी भी स्थायी समाधान नहीं हो सकता। अतीत में सत्तासीन होने पर शेख हसीना ने खालिदा जिया को गिरफ्तार करवाया था। वह बदले की राजनीति के जैसा उदाहरण था। आज अवामी लीग को प्रतिबंधित करने का फैसला भी उसी बदले की राजनीति से चालित है। ऐसी राजनीति अंतत: राष्ट्र को ही कमजोर कर देती है।


बांग्लादेश की संसद में आतंक विरोधी कानून में संशोधन करके जिस तरह एक राजनीतिक दल को प्रतिबंधित करने का फैसला लिया गया है, वह भी गंभीर सवाल खड़े करता है। इससे पहले इस कानून के जरिये कभी किसी व्यक्ति के अपराध के लिए उसकी पार्टी को जिम्मेदार ठहराने का प्रावधान नहीं था। कानून में यह संशोधन देश के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए खतरनाक है। - edit@amarujala.com
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