आज अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए मतदान होने वाला है, जिस पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हैं। दोनों प्रमुख प्रतिद्वंद्वियों के बीच मुकाबला कड़ा है। एक हफ्ते पहले जहां हिलेरी क्लिंटन 11 पॉइंट से आगे थीं, वह अब तीन पॉइंट के साथ सतह पर हैं। जबकि डोनाल्ड ट्रंप उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी हैं।
हम हमेशा मानते हैं कि लोकतांत्रिक चुनाव में मतदान का मतलब सही व्यक्ति का चुनाव होता है, नीति और व्यवहार, दोनों मामलों में। लेकिन हाल में यूरोप और अमेरिका में जो चुनाव और जनमत सर्वेक्षण हुए, वे बताते हैं कि औसत मतदाताओं के दृष्टिकोण में नाटकीय ढंग से कुछ बदलाव आया है। मितव्ययिता और मंदी के इस युग में विकासोन्मुखी नीतियों के बजाय दूसरे मुद्दे हावी हैं। दशकों के निर्वासन के बाद कट्टरता और नस्लवाद अचानक से आम हो गए हैं। पश्चिम के विभिन्न चुनावों में हुए इस अचानक बदलाव की भविष्यवाणी करने में चुनाव विश्लेषकों की विफलता इस घटना के लक्षण हैं।
इस तरह के परिवर्तनशील प्रचार अभियान में नतीजे की भविष्यवाणी करना मुश्किल है। अब जरा ब्रैडली प्रभाव पर विचार कीजिए। टॉम ब्रैडली लास एंजिलिस के लंबे समय तक अफ्रीकी-अमेरिकी डेमोक्रेट थे। उन्होंने 1982 में यूरोपीय मूल के रिपब्लिकन उम्मीदवार जॉर्ज ड्यूकमेजियान के खिलाफ चुनाव लड़ा था। ज्यादातर चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में ब्रैडली को आगे दिखाया गया। एग्जिट पोल को देखकर मीडिया ने पहले ही विजेता के रूप में उनका अभिनंदन करना शुरू कर दिया, जबकि सेन फ्रांसिस्को क्रॉनिकल ने अपने एक शुरुआती संस्करण में प्रकाशित किया-ब्रैडली के जीतने की संभावना। बेशक मतदान के दिन ब्रैडली ने भारी बहुमत प्राप्त किया, लेकिन जैसे ही अनुपस्थित मतपत्र को शामिल किया गया, पलड़ा दूसरी तरफ झुक गया और ब्रैडली कुछ मतों के अंतर से चुनाव हार गए। बाद में चुनाव विश्लेषकों द्वारा किए गए अनुसंधान से पता चला कि शुरू में जितने की अपेक्षा की जा रही थी, उसकी तुलना में बहुत कम श्वेत मतदाताओं ने ब्रैडली के पक्ष में मतदान किया। इसी तरह दशकों तक सत्ता में रहने के चलते अलोकप्रिय होने और थोड़े ही अंतर से आगे होने के बावजूद ब्रिटेन में संकोची टोरी प्रभाव को 1992 में लेबर पार्टी की विफलता के जिम्मेदार माना गया। आखिरकार कंजर्वेटिव पार्टी की 7.6 फीसदी मतों से जीत हुई।
बेशक मतदान वरीयताओं में इस तरह के बदलाव बहस का मुद्दा बने हुए हैं, लेकिन ज्यादातर सर्वेक्षकों का विचार है कि सामाजिक दबाव ने श्वेत मतदाताओं को इसके लिए प्रेरित किया होगा। राजनीतिक वैज्ञानिक एलिजाबेथ नियोले-न्यूमन ने अपनी पुस्तक द स्पाइरल ऑफ साइलेंस में कहा है, लोग अगर खुद को अल्पसंख्यकों में पाते हैं, तो अलग-थलग पड़ने के भय से चुनाव में सही राय नहीं व्यक्त करते। चुप्पी की यह कुंडली केवल तभी टूटती है, जब उच्च शिक्षित और संपन्न व्यक्ति उसी अल्पसंख्यक समुदाय की राय को जाहिर करते हैं। बहुत कम लोगों में इतना साहस होता है कि वे अपनी राय व्यक्त करें और यथास्थिति के खिलाफ खड़े हों। सर्वेक्षण जनसंचार माध्यमों के जरिये बहुमत की राय को ही प्रतिबिंबित करते हैं। सामाजिक वर्जनाएं विपरीत रायों के खिलाफ अपनी मजबूत भूमिका निभाती हैं। यहां सेल्फ सेंसरशिप काम करता है।
अब जरा हाल के उदाहरण देखें, जहां सर्वेक्षण पूरी तरह गलत साबित हुए। अंतिम कुछ हफ्तों में ब्रेग्जिट को लेकर हुए सर्वेक्षण में विरोधी पक्ष (न) दस पॉइंट से आगे था, लेकिन जीत अंततः ब्रेग्जिट समथर्कों (हां) की हुई। स्कॉटलैंड की आजादी को लेकर सर्वेक्षण में 'एकजुट रहने' का मुद्दा हारता दिखा, लेकिन अंततः बुजुर्ग मतदाताओं ने ब्रिटेन के साथ एकजुट रहने के पक्ष में मतदान किया। यहां भी चुप्पी कुंडली जमाए हुई दिखी। जो लोग स्कॉटलैंड की आजादी के पक्ष में नहीं थे, उन्हें आजादी समर्थकों ने धमकाया। जिन्होंने दरवाजे पर 'नहीं, शुक्रिया' का पोस्टर लगाया था, उनके घरों पर चुनाव से पहले अंडे फेंके गए।
मतदान करना अब कठिन हो गया है। बढ़ती गतिशीलता और स्मार्टफोन के बढ़ते उपयोग के मौजूदा दौर में प्रतिनिधि सैंपल एकत्र करना मुश्किल हो गया है, उन जगहों की तुलना में जहां लोग एक ही जगह पर दशकों से रहते हैं और लैंडलाइन फोन के जरिये संचार करते हैं। चुनावी नतीजे की भविष्यवाणी करना कठिन है, क्योंकि स्वतंत्र मतदाता अंतिम दिन चुनावी नतीजे को प्रभावित करते हैं।
एक बार फिर से मूक कट्टरता का उदय हो रहा है। हंटिंगडॉन के कैंब्रिजशायर में साग-सब्जियों का एक बाजार है। वहां पोलिश अप्रवासी बच्चों को ब्रेग्जिट समर्थक एक कार्ड देते हैं, जिसमें 'कीड़ा' लिखा होता है। वे लोग उन बच्चों को वापस जाने के लिए कहते हैं। ब्रेग्जिट प्रचारकों द्वारा वातावरण में भय का माहौल पैदा किया जा रहा है, यूरोपीय संघ में तुर्की के प्रवेश को लेकर चिंता बढ़ गई है। निगेल फैरेज साफ कहते हैं कि सीरियाई शरणार्थियों के कारण ब्रिटिश महिलाओं के यौन उत्पीड़न का जोखिम बढ़ गया है। सार्वजनिक शालीनता खत्म हो गई है और एक बार फिर से अचानक नस्लवादी होना सही हो गया है। वर्षों की मितव्ययिता और बजटीय कटौती के कारण बलि के बकरे की जरूरत बढ़ गई है।
डोनाल्ड ट्रंप का उदय अचानक नहीं हुआ है-रिपब्लिकन पार्टी और दक्षिणपंथी टेलीविजन द्वारा दशकों से अल्पसंख्यकों के खिलाफ गुस्सा भड़कने लगे, ऐसे हालात बनाए जा रहे थे। इसलिए आज होने वाला अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव मील का पत्थर साबित होगा, जिसमें वह व्यक्ति भी भविष्य में विश्व का नेतृत्व कर सकता है, जो प्रवासी-विरोधी बयानबाजी और खुलेआम कट्टरता को बढ़ावा देता है या जो शिष्ट यथास्थिति को बनाए रख सकता है। क्या हम नस्लीय और सांस्कृतिक लक्षणों के एक नए युग का आगमन देखेंगे? एक घबराहट के साथ हमें इसके नतीजे का इंतजार रहेगा।