पिछले कुछ महीनों से कश्मीर घाटी में हर दूसरे-तीसरे दिन किसी नए हंगामे की खबर आती रही है। पिछले दिनों मेरी मुलाकात एक कश्मीरी राजनेता से हुई, जिनका कश्मीर से पुराना रिश्ता है और जिन्होंने कश्मीर घाटी में फैलते इस्लामीकरण को अपनी आंखों से देखा है।
मैंने जब इस बारे में उनसे पूछा, तो थोड़ा नाराज होकर उन्होंने कहा, हां, कश्मीर घाटी में भारत के लिए बच्चों से लेकर बूढ़ों तक नफरत है। लेकिन आप लोग भूल जाते हैं कि इस राज्य में लद्दाख और जम्मू भी हैं, जहां के लोग पूरी तरह नई दिल्ली के साथ हैं। इसके बावजूद आप लोग लद्दाख और जम्मू की बात करने को तैयार नहीं हैं। जम्मू के इस राजनेता की बातों में दर्द था। दर्द इसलिए कि कश्मीर में जितनी भी सरकारें रही हैं, उनका सारा ध्यान घाटी में ही रहा है। सर्दियों में सरकार का कामकाज जम्मू से होता है, लेकिन तब भी मुख्यमंत्रियों का ध्यान श्रीनगर पर ही रहता है।
लद्दाख और जम्मू के साथ बहुत पहले से सौतेला बर्ताव होता रहा है। पिछले साल कुछ विदेशी दोस्तों के साथ मैं लद्दाख गई थी और जब उन्होंने कश्मीर के इस भूले प्रांत को देख हैरान होकर पूछा कि यहां पर्यटन पर जोर क्यों नहीं है। लेह शहर अगर किसी दूसरे देश में होता, तो शायद वहां श्रीनगर से ज्यादा पर्यटक आते। सिंधु नदी के किनारे स्थित यह शहर ऊंची पहाड़ियों से घिरा हुआ है। लेकिन शहर की हालत इतनी खराब है, जैसे यहां दशकों से विकास का काम ही न हुआ हो। टूटी सड़कें, बेहाल बाजार और पर्यटन व्यवस्था न के बराबर। फिर भी कुछ दिलेर विदेशी पर्यटक लद्दाख की प्राकृतिक सुंदरता और प्राचीन बौद्ध मंदिर देखने लेह आते हैं। जम्मू-कश्मीर की सरकारों ने लद्दाख में विकास और आधुनिकता लाने की दिशा में थोड़ा भी ध्यान दिया होता, तो कश्मीर घाटी में आतंकवाद की आग फैलने के बाद पर्यटक वहां जाते।
घाटी के लोगों का दिल जीतने के लिए ही शायद कश्मीर पर ज्यादा ध्यान दिया जाता रहा है। लेकिन अगर एक बुरहान वानी की मौत से घाटी में इतनी अशांति फैल सकती है कि सौ दिन कर्फ्यू लगाने की जरूरत पड़े, तो क्या इस राज्य के लिए नए सिरे से नीतियां बनाने का वक्त नहीं आ गया है? इस नई नीति में लद्दाख और जम्मू को भी कश्मीर घाटी जितना महत्व मिलना चाहिए। इस राज्य के इन दो हिस्सों में अगर विकास होगा, निवेशकों को आकर्षित करने का प्रयास होगा, तो मुमकिन है कि घाटी में भारत-विरोधी माहौल खत्म हो।
कश्मीर की स्थिति यह है कि वहां 1989 में आजादी के नाम पर जो आंदोलन शुरू हुआ था, वह अब जेहाद का रूप ले चुका है। यहां बीच-बीच में आईएस के झंडे लहराते दिखते हैं। कश्मीर घाटी की खतरनाक स्थिति को हमारे यहां अभी तक बहुत गंभीरता के साथ नहीं लिया गया है। बहुत संभव है कि जल्दी ही इराक में आईएस की कमर टूट जाए, लेकिन इससे उसकी विचारधारा खत्म नहीं होने वाली। हारने के बाद यह आतंकी संगठन एक ऐसी जगह की खोज करेंगे, जहां से वह फिर उभर सके। वह जगह कश्मीर भी हो सकती है। पाकिस्तान शुरू से ही कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुद्दा बनाने की अपनी मंशा पर काम कर रहा है। इसलिए भी हमें सजग होना चाहिए। कश्मीर के लिए एक नई नीति बनाने की आवश्यकता जितनी आज है, उतनी इससे पहले शायद ही कभी रही हो।