जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री व सांसद डॉ. फारूक अब्दुल्ला को हिरासत में लिए जाने तथा उन पर जन सुरक्षा अधिनियम (पीएसए) लगाने की जितनी व्यापक चर्चा हुई, उतनी उनकी रिहाई की नहीं हो रही है। यही अंतर साबित करता है कि पांच अगस्त, 2019 और मार्च, 2020 में जम्मू- कश्मीर को लेकर देश का वातावरण काफी बदल चुका है। करीब साढ़े सात माह बाद उनकी रिहाई को कई लोग चौंकाने वाली घटना बता रहे हैं। हालांकि रिहाई के बाद उनके द्वारा बयान देने में बरती जा रही सतर्कता अवश्य चौंकाने वाली है। माना जा रहा था कि वह केंद्र सरकार पर हमला करेंगे तथा कश्मीर को लेकर ऐसा बयान देंगे, जिससे नए सिरे से राजनीति गरम होगी। किंतु उन्होंने ऐसा कोई बयान नहीं दिया, जिससे राजनीतिक विवाद पैदा हो।
फारूक अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर के कोई सामान्य नेता नहीं हैं। उन्हें पता है कि भाजपा विरोधी पार्टियों और नेताओं ने अवश्य उनकी रिहाई के लिए आवाज उठाई, किंतु जम्मू-कश्मीर की राजनीति में वे उनकी कोई सहायता नहीं कर सकते। उनकी रिहाई के पांच दिन पूर्व विपक्ष के कई नेताओं ने प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री को पत्र लिखकर जम्मू-कश्मीर के तीनों पूर्व मुख्यमंत्रियों समेत प्रमुख राजनीतिक नेताओं की रिहाई का आग्रह किया था। लेकिन यह मानना गलत होगा कि उसी पत्र के आधार पर केंद्र ने उन्हें रिहा किया है, क्योंकि उस पत्र में विपक्ष ने सरकार पर तीखे हमले किए थे।
रॉ के पूर्व प्रमुख ए एस दुलत ने दावा किया है कि गृह मंत्रालय की अनुमति से उन्होंने फारूक अब्दुला से मुलाकात की, उसी के आधार पर रिहाई का फैसला हुआ। दुलत के दावे पर कुछ भी कहना कठिन है, पर उन्होंने मुलाकात की, यह सच है। हालांकि केंद्र की ओर से कुछ समय पहले ही बयान आया था कि अब चूंकि जम्मू-कश्मीर के हालात सामान्य हो रहे हैं, इसलिए नेताओं को रिहा किया जाएगा। संभव है कि आने वाले समय में अन्य नेताओं को भी रिहा कर दिया जाए। लेकिन केंद्र सरकार पहले फारूक की रिहाई के प्रभाव का आकलन करेगी, फिर ऐसा करेगी।
वैसे सरकार ने काफी पहले से जम्मू-कश्मीर में लगी पाबंदियां खत्म करनी आरंभ कर दी थीं। आज के समय में लगभग सभी पाबंदियां खत्म हैं। गृह राज्यमंत्री जी. किशन रेड्डी ने पिछले दिनों राज्यसभा में कहा था कि सभी मामलों की एक-एक कर समीक्षा की जा रही है और एजेंसियों की रिपोर्ट के आधार पर हिरासत अवधि बढ़ाने या छोड़ने का निर्णय लिया जा रहा है। ज्यादातर नेता रिहा हो चुके हैं।
दरअसल, मोदी सरकार की नीति जम्मू-कश्मीर की परंपरागत राजनीति को बदलने की है। इसलिए हर पार्टी के नेताओं से संपर्क बनाए रखने की कोशिश हुई है। इस नीति का एक हिस्सा प्रदेश में पारिवारिक राजनीति को कमजोर करना है। मोदी सरकार को इसमें कितनी सफलता मिली है, कहना कठिन है। पर पीडीपी टूट चुकी है। महबूबा के विश्वसनीय साथी माने जाने वाले अल्ताफ बुखारी ने नई पार्टी बना ली है। मुजफ्फर हुसैन बेग को भी सरकार ने भरोसे में ले लिया है। दूसरी, तीसरी, चौथी श्रेणी के नेताओं से भी संपर्क किया गया है। जम्मू में भी भाजपा की कोशिश इन दोनों पार्टियों को तोड़ने की रही है, जिसमें कुछ सफलता मिली है। फारूक अब्दुल्ला की रिहाई के पीछे इन कारकों का भी योगदान है। आखिर सरकार को वहां राजनीतिक प्रक्रिया शुरू करनी है। इन दो परिवारों के वर्चस्व वाली राजनीति वहां न रहे, यही केंद्र की कोशिश है। फारुख को भी शायद इसका कुछ अहसास है, इसीलिए वे पहले की तरह आक्रामक नहीं हैं।