भाई जी ने बहुत उत्साहित होकर क्षणिका सुनाई, कल एक नेता ने/बिल्ली का रास्ता काटा/अपशकुन हुआ देख/बिल्ली डर गई/ट्रक के नीचे/ दबकर मर गई! इसके बाद वह इस उम्मीद में मुझे देखने लगे कि मैं तालियां बजाऊंगा। पर मैंने पूछ लिया कि इस क्षणिका में वह नेताओं की बुराई कर रहे हैं या शकुन-अपशकुन को लेकर जनमानस में गहरे पैठे अंधविश्वास की बड़ाई?
वह असुविधा के गहरे खड्ड में जा गिरे। पर ऐसे आड़े-तिरछे सवालों पर आपा खो देने की पुरानी आदत के विपरीत वह हलके से मुस्कराए और कहने लगे, माफ करना भाई! मुझे मालूम नहीं था कि तुम्हारी दुर्बुद्धि ने तुम्हें इतना भी समझने लायक नहीं छोड़ा है। मैं तिलमिलाकर रह गया। पर जब तक कुछ कहता, वह फिर शुरू हो गए, तुम्हारी भी गलती नहीं है। यह समय ही कुछ ऐसा है कि सयाने लोग समझकर भी नहीं समझते।
उनकी तोहमत ने मेरी सहनशीलता की सारी सीमाएं तोड़ डालीं। मैंने कहा, खुद को इतना तुर्रम खां आप क्यों समझते हैं कि सामने वाला भुनगे जैसा नजर आने लगे? पर जब तक वह कोई उत्तर देते, रंग में भंग डालते उनके दो कवि मित्र आ पहुंचे। उनमें से एक औपचारिक आग्रह की प्रतीक्षा किए बिना ही सुनाने लगा-मच्छर ने नेता से कहा/सचमुच तुम बड़े हो/काम हम दोनों का ही है/खून चूसना/पर कमबख्त मच्छरदानी/बस खत्म अपनी कहानी/और तुम गजब की सोच लेते हो/मच्छरदानी के अंदर लेटे हुए को भी/नोच लेते हो!
मुझे मजा नहीं आया। उलटे कोफ्त होने लगी कि नेता, पत्नियां और पाकिस्तान नहीं होते, तो हिंदी के व्यंग्य कवियों का पता नहीं, क्या होता। पर तभी दूसरा कवि जैसे मुझे गलत सिद्ध करने के लिए सुनाने लगा-अब कवि सम्मेलनों से/इतनी कहां आय होती है/दिन भर में बस/दो-तीन ही चाय होती है/दूध भी इन दिनों नहीं मिलता/मीठे सपनों में/मगर गाय होती है!
मुझे लगा कि अब मुझे भी तत्काल कोई क्षणिका सुनानी पड़ेगी, सो मैं आगे बढ़कर बोल पड़ा, मित्र! तेरा दुख समझने की मुझमें भी तमीज है/पर क्या करूं/मेरे पास/एक ही कमीज है।