धुलना तो चाहिए था जी आसमान को और आसमान पर छाए प्रदूषण को, ताकि थोड़ी धूप खिलती और लोग सर्दी की दोपहरी में धूप में बैठने का आनंद उठा पाते, पर वह तो नहीं धुला। विज्ञापन कहता है कि हिंदुस्तान में तो आजकल फॉग चल रहा है, लेकिन वास्तव में तो स्मॉग चल रहा है। खैर, धुलना तो चाहिए था जी सोलह दिसंबर के दाग को, पर वह भी नहीं धुला और निर्भया के माता-पिता को लगा कि वे न्याय की लड़ाई हार गए हैं, पर जुवेनाइल बिल तो पास हो ही गया, भले ही जिसका बेसब्री से इंतजार था, वह जीएसटी बिल संसद से पास न हो पाया हो। वैसे इधर संसद के सत्र ऐसे धुलने लगे हैं, जैसे वे धोबीघाट पर पड़े हों। हालांकि कुत्ता शब्द का इस्तेमाल इधर थोड़ा सोच- समझ कर करना चाहिए, क्योंकि यह फौरन ही राजनीतिक अर्थ ग्रहण कर लेता है, फिर भी मुहावरे में कहें, तो सरकार बनाकर जनता धोबी का कुत्ता तो हो ही जाती है। फिर न वह घर की रहती है, न घाट की। और संसद है कि लगता है कि उसे निरंतर धोया जा रहा है।
पर पहले से ही संसद के इस सत्र के भी धुलने की आशंका से ग्रस्त जेटली जी को कहां पता था कि लोग उन्हें ही धोने पर आमादा हो जाएंगे। एक तरफ विरोधी थे, जो उन्हें धोने की कोशिश कर रहे थे, दूसरी ओर सरकार और उनके सहयोगी थे, जो उन्हें इतना धुला साबित करने की कोशिश रहे थे, जैसे वह अभी-अभी गंगा में डुबकी लगाकर आए हों। बजट बनाते-बनाते जेटली जी के धुलने की नौबत आ गई। हालांकि आजकल सरकार गंगा का मैल धोने में भी लगी हुई है, कम से कम उमा भारती जी का तो दावा यही है। वैसे भी अभी जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे मोदी जी के साथ गंगा की आरती उतार कर गए हैं, देखो शायद मैल कुछ धुले। पर अब सरकार और खुद जेटली जी के सामने यह काम और आ पड़ा है कि उन्हें उस मैल को भी धोना है, जो विरोधियों ने उन पर लगाने की कोशिश की है। सत्र को धोना जितना आसान है, उतना आसान शायद खुद को धोना नहीं। दूसरा धोए, तो फिर उसका अर्थ बदल जाता है।