इस समय पिछड़ा समाज जातियों एवं धर्मों में बिखरा पड़ा है। उन्हें विभिन्न खेमों में बांटकर बिखरे समाज का और बिखराव किया जा रहा है। ऐसा इसलिए हो रहा है कि इस वर्ग की विभिन्न जातियां इसकी सामाजिक व्यवस्था बनाए बिना राजसत्ता प्राप्त करने की कोशिश कर रही है। समाज को तैयार किए बिना शासन सत्ता की तैयारी कैसे हो सकती है? पिछड़ा वर्ग, जिसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग शामिल है, अपना एक संगठित समाज न बनाकर विभिन्न जातियों में बिखरा पड़ा है। संविधान (अ. जा.) आदेश, 1950 के अनुसार 29 राज्यों में अनुसूचित जाति की 1,108 जातियां है। ऐसे ही 22 राज्यों में अनुसूचित जनजातियाों की 744 जातियां है। अन्य पिछड़ा वर्ग की 5,013 जातियां है। 2011 की जनगणना के अनुसार, देश की आबादी 124.70 करोड़ यानी 125 करोड़ है। अनुसूचित जाति की हिस्सेदारी 16.6 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति की हिस्सेदारी 8.6 प्रतिशत तथा अन्य पिछड़ा वर्ग की हिस्सेदारी 52.01 फीसदी है। इस आधार पर अनुसूचित जाति की आबादी 20 करोड़, 75 लाख, अनुसूचित जनजाति की आबादी 10 करोड़ 75 लाख तथा अन्य पिछड़ा वर्ग की आबादी 65 करोड़ है। इन तीनों वर्गों की आबादी को उनकी जातियों से भाग करके जाति के मुताबिक औसत आबादी प्राप्त होती है, जो इस प्रकार है-अनुसूचित जाति की औसत जातिवार आबादी 1 लाख 87 हजार, अनुसूचित जनजाति की औसत जातिवार आबादी 1 लाख 44 हजार और अन्य पिछड़ा वर्ग की जातिवार औसत आबादी 1 लाख 30 हजार। इस विश्लेषण से यह तथ्य सामने आता है कि इन तीनों समूहों का जातियों में बंटना इन्हें सत्ता की कुर्सी तक नहीं पहुंचा सकता। समाज में देखने से पता चलता है कि जो भी जाति कुछ समर्थ हुई, वह अपनी जाति का संगठन बना लेती है। ब्राह्मणवादी शोषणकारी व्यवस्था यही तो चाहती है कि ये समूह वर्ण न बनकर जातियों में बटें रहें और ब्राह्मणवाद का समर्थन करते रहें।