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पिछड़े होने का सुख

Wed, 23 Sep 2015 07:38 PM IST
मुरली मनोहर श्रीवास्तव
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अभी दो-चार दिन पहले मैं बाल कटाने गया, तो देखा कि मेरा हेयर ड्रेसर एक से दूसरी कटिंग के बीच मोबाइल पर स्टेटस अपडेट कर रहा था। उसी समय बाल कटवाने की सीट पर बैठा बंदा सेल्फी ले रहा था। मैं समझ गया कि यह भी यहां से निकलने के बाद सेल्फी लगाकर अपना स्टेटस चमकाएगा। आजकल बिना स्टेटस जीना मुश्किल है। स्कूल गोइंग बच्चे तक फेसबुक आईडी बनाते और पासवर्ड पैरेंट्स को नहीं बताते। पैरेंट्स भी खुश होते हैं कि बच्चा अपने राइट्स के लिए अभी से इतना कांसस है। कई बार उन्हें लगता है कि बर्थडे पार्टी में जा रहे बेटे को ड्रिंक्स की लिमिट के बारे में बता दें, पर वे ऐसा नहीं कर पाते।
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यह तो वही मिडिल क्लास मेंटेलिटी हुई कि बारहवीं पास होने के बाद भी बाबूजी कान खींचकर दो-चार थप्पड़ जड़ देते थे और शाम साढ़े छह के बाद घर लौटने पर अम्मा आसमान सिर पर उठा लेती थी। वह भी कोई लाइफ थी कि जन्मदिन की बधाई देने वालों को बताशे बांटकर ढोलक पर गीत गा दिए। आज अगर बच्चा मॉडर्न ड्रेस पहन कर लटके-झटके देते देर रात नहीं लौटेगा, तो पड़ोसी यही सोचेंगे कि इनकी कोई सोसाइटी नहीं है। और कहीं ड्रिंक्स पर रेस्ट्रिक्शन लगा दी, तो दोस्त के पैरेंट्स हमें कितना पिछड़ा हुआ समझेंगे।

कुछ लोग स्टेटस के लिए ही ताउम्र जीते हैं। वहां बातचीत ब्रांडेड शर्ट, जींस, चश्मा, फ्लैट और गाड़ी के मॉडल के इर्द-गिर्द घूमती है। एक आदमी बड़ी गाड़ी एक्सचेंज ऑफर में लेने की बात करता है, तो दूसरा पचास हजार के मोबाइल सेट पर मैसेज पढ़ते हुए उसकी बात इग्नोर कर सिर झटक देता है।
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एक मैं हूं कि मेरे शर्ट, पैंट और मोबाइल पर कोई अचरज नहीं जताता, न ही अपनी पुरानी गाड़ी पार्क करने में मुझे समस्या आती है। सुबह टहलने और घर के सात्विक भोजन से संतुष्ट रहने रहने के कारण नामी होटलों और बड़े अस्पतालों में जाकर सेल्फी लेने से भी बचा हुआ हूं। स्टेटस न होने के बावजूद मैं स्टेटस रखने वालों से ज्यादा सुखी हूं, तो इसमें मेरा क्या कुसूर है!
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