दिल्ली के जंतर-मंतर और देशभर के विभिन्न शहरों में प्रदर्शन के लिए जमा हुए युवाओं का एक एजेंडा था, जिस पर अब गंभीरतापूर्वक विचार होना चाहिए। उनका एजेंडा था कि देश की शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही को मुख्य राष्ट्रीय एजेंडा होना चाहिए। भारत एक ऐसा देश है, जहां औसत उम्र 28 साल है, और जहां बिना पैसे या रसूख वाले लाखों लोगों के लिए शिक्षा ही बेहतर भविष्य का एकमात्र जरिया है। छात्र अपने भविष्य के लिए लड़ रहे थे। शिक्षा के मुद्दे को चर्चा के केंद्र में लाने के लिए हमें उन युवाओं का शुक्रिया अदा करना चाहिए।
कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व में युवा प्रदर्शनकारियों ने अपना हफ्तों लंबा आंदोलन तब खत्म किया, जब शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया। दो केंद्रीय मंत्रियों के साथ बैठक के बाद, सीजेपी ने कहा कि सरकार उन छात्रों के परिवारों को मुआवजा देने पर सहमत हो गई है, जिन्होंने आत्महत्या कर ली थी। साथ ही, सरकार ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई न करने का भी आश्वासन दिया है। नरेंद्र मोदी सरकार ने फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाने, नेशनल टेस्टिंग एजेंसी में पूरी तरह बदलाव करने और परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार करने का भी वादा किया है। जंतर-मंतर पर आई भीड़ को किसी एक श्रेणी में नहीं बांधा जा सकता था: इसमें दादी-नानियां, युवा महिलाएं और पुरुष, बच्चे, परिवार, छोटे और बड़े शहरों के निवासी, अमीर और गरीब सभी शामिल थे और उन्होंने तमाम मुश्किलों का सामना किया और सरकार से अपनी बात मनवाने के लिए डटे रहे।
लेकिन, विरोध-प्रदर्शन खत्म होने के बाद कहानी यहीं खत्म नहीं होती। देशभर में हुए विरोध-प्रदर्शनों के केंद्र में एक ही मुद्दा है: नौकरियां-एक ऐसी पीढ़ी के लिए निष्पक्ष अवसर का वादा, जिसे ऊंचे सपने देखने के लिए प्रेरित किया गया था। दुनिया की सबसे बड़ी जेन जी आबादी (37-40 करोड़) वाले देश में यह सब कैसे होगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। भारत की जेन जी के लिए, शिक्षा में जवाबदेही कोई हवाई नारा नहीं है। यह मुमकिन प्रतीत होते और पहले से तय या धांधलीपूर्ण भविष्य के बीच का फर्क है। मेडिकल सीटों, इंजीनियरिंग कॉलेजों, सिविल सेवाओं और ज्यादातर औपचारिक नौकरियों के लिए आज भी प्रतियोगी परीक्षाएं ही मुख्य पैमाना हैं। जब पेपर लीक होते हैं, मार्किंग में पारदर्शिता नहीं होती, या आखिरी समय पर दोबारा परीक्षा की घोषणा होती है, तो इसकी कीमत किसी युवा की जिंदगी के महीनों या वर्षों (और अक्सर पूरे परिवार की बचत) के तौर पर चुकानी पड़ती है। नीट पेपर लीक से जुड़ी आत्महत्याओं की खबरें प्रदर्शनकारियों के लिए महज आंकड़े नहीं थे; वे उनके सहपाठियों और दोस्तों की कहानियां भी थीं।
इसका एक गहरा मनोवैज्ञानिक पहलू भी है। यह पीढ़ी स्मार्टफोन, प्रतिस्पर्धी रैंकिंग और अंकों के जरिये अपनी अहमियत तय करने वाले माहौल में पली-बढ़ी है। उन्हें बचपन से ही सिखाया जाता है कि कड़ी मेहनत और काबिलियत का इनाम मिलता है। जब सिस्टम ही बेपरवाह या समझौता करता हुआ दिखता है, तो धोखा व्यक्तिगत लगता है। आंदोलन ने पहले से मौजूद इस भावना को और पक्का कर दिया कि उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा है। शिक्षा में जवाबदेही दबाव का एक सबसे स्पष्ट बिंदु बन गई है, क्योंकि यह व्यक्तिगत आकांक्षा और संस्थागत विश्वसनीयता के मिलन-बिंदु पर स्थित है। हमें इस पर ध्यान देना चाहिए।