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सरकार सोई है, जनता को जगा रहे हैं

Mon, 01 Feb 2016 06:57 PM IST
कृष्णप्रताप सिंह
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पिछले दिनों एक मतदाता जागरूकता गोष्ठी का आमंत्रण मिला, तो मुझे अपने लोकतंत्र के ढेर सारे ताप और संताप याद आने लगे। मैंने जाने में असमर्थता जताई, तो जो सरकारी सज्जन आमंत्रण देने आए थे, वह मुझे नागरिक कर्तव्य की याद दिलाने लगे। मैंने झुंझलाकर कहा-इस देश में यही एक बड़ा भारी ऐब है। हर कोई दूसरे को कर्तव्य याद दिलाता है, लेकिन खुद अपने कर्तव्य याद नहीं रखता। इसलिए तमाम उलटबांसियां चलती रहती हैं।
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उन्होंने हकलाकर पूछा, कैसी उलटबांसियां?

मैंने सीधे उत्तर देने के बजाय प्रतिप्रश्न कर डाला, आपको याद है कि पिछली बार सरकार की नींद कब टूटी थी? सोई हुई है वह और आप जगा मतदाताओं को रहे हैं, जो मत देने से पहले भी बेबस होते हैं और बाद में भी।

लेकिन वह कहने लगे, आपकी सारी तोहमतें सिर माथे, पर यह बताइए कि जो मतदाता सरकार को जगने के लिए विवश न कर सके, क्या उसे खुद को जागा कहने का अधिकार है?

मैंने हार मान ली और गोष्ठी में चला गया। बोलने के लिए कहा गया, तो मतदाताओं की प्रशस्ति शुरू कर दी-हमारे लोकतंत्र में मतदाता ऐसा भाग्य विधाता है, जो नेताओं का भाग्य तो बिगाड़ता और बनाता है, पर अपने भाग्य का लेखा समझ नहीं पाता। बेचारा जब बैलट पेपर पर मोहर लगाता था, तब तो नहीं ही समझ पाता था, अब ईवीएम का बटन दबाने पर भी नहीं समझ पाता कि हाथ जोड़े खड़ा नेता कब मुस्कराता है, कब फंसाता है और कब ग्रसने और डंसने लग जाता है। जिस दिन वह समझ जाएगा, न सरकारें झपकी ले पाएंगी, न नेता सो पाएगा!
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आयोजकों की सहनशक्ति जवाब दे गई। उनमें से एक ने कहा-अब बस भी कीजिए। हमने आपको मतदाताओं को जगाने के लिए बुलाया था, झिंझोड़ने के लिए नहीं!

मैंने कहा-भाई, जगाने का अपना-अपना स्टाइल है। क्या करूं, मुझे ऐसे ही जगाना आता है।

बाहर निकला, तो एक मतदाता पूछने लगा-अपने देश में यह कैसा लोकतंत्र है? मैं कोई उत्तर नहीं दे सका।
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