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गांधी जो राह दिखा गए हैं

रामचंद्र राही Updated Mon, 02 Oct 2017 09:39 AM IST
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गांधी जी
अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि आज महात्मा गांधी के विचारों, उनके दर्शन की क्या प्रासंगिकता है। लेकिन मेरा मानना है कि थोड़ी देर के लिए आप गांधी को भूल जाइए और यह सोचिए कि आज मानव समाज के सामने जो चुनौतियां हैं, उनसे निपटने के लिए हमारे पास क्या रास्ता है। अगर इन चुनौतियों से निपटने के रास्ते की तलाश करेंगे, तो आपको गांधी की प्रासंगिकता का एहसास होगा।


आज पूरी दुनिया में मानव समाज के सामने बढ़ती हिंसा, युद्ध के खतरे, पर्यावरणीय विनाश, ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन परत में छेद, बेरोजगारी, मूल्यों का क्षरण जैसी समस्याएं मुंह बाए खड़ी हैं। आज हमने विकास का जो मॉडल अपनाया है, उनमें युवाओं के लिए रोजगार का पर्याप्त सृजन नहीं हो पा रहा है। पर्यावरण का इस तरह अंधाधुंध दोहन हो रहा है कि यह चिंता सताने लगी है कि यह सृष्टि बचेगी या नहीं। दुनिया में अशांति व युद्ध का खतरा बढ़ रहा है। नई पीढ़ी का कोई भविष्य नहीं दिखाई दे रहा है। जो विकास हो रहा है, उसमें रोजगार नहीं है। जो लोग जहां सदियों से रह रहे हैं, उन्हें वहां से विस्थापित किया जा रहा है, क्योंकि जहां वे रहते हैं, वहां लाखों-लाख वर्ष से धरती के गर्भ में प्रकृति ने अकूत भंडार संजोया है, जिसे हम उद्योगों के लिए कच्चा माल (रॉ मैटेरियल) कहते हैं। वे कच्चे माल या खनिज पदार्थ विकास के लिए बेशक जरूरी हैं, लेकिन वहां रहने वाले लोगों के पुनर्वास की कोई बेहतर व्यवस्था किए बिना उन्हें वहां से खदेड़ना उचित कैसे माना जा सकता है। प्रकृति का इस कदर दोहन हो रहा है कि आने वाली पीढ़ी के लिए कुछ बचेगा ही नहीं। इस विकास का कोई भविष्य नहीं है, सिवाय विनाश के। गांधी ने इसी स्थिति को लक्ष्य कर किसी समय कहा था कि यह एक पागल अंधी दौड़ है, जो हमें विनाश की तरफ ले जाने वाली है। उन्होंने कहा था कि अगर मैं अकेला भी रहूंगा, तो चिल्ला-चिल्लाकर कहूंगा कि इस रास्ते को छोड़ो और नए रास्ते की तलाश करो। वह नया रास्ता क्या है? गांधी की दृष्टि से सोचेंगे, तो एक नए मानवीय समाज की रचना ही, जो किसी भी तरह की हिंसा और शोषण से मुक्त हो और प्रकृति के सहयोग से विकसित हो, वह नया रास्ता है।


गांधी जी की जो आर्थिक नीति थी, वह बहुत स्पष्ट एवं अहिंसक थी। उनके बारे में यह भ्रम फैलाया गया कि वह मशीनों (यंत्रों) के खिलाफ हैं। उनकी विकासात्मक अर्थनीति की बुनियाद कृषि और उद्योगों पर आधारित थी। भारत की ज्यादातर आबादी गांवों में रहती है। इसलिए उन्होंने कहा था कि जहां पर कच्चा माल उपलब्ध है, वहीं पर उसके प्रसंस्करण की व्यवस्था होनी चाहिए। उनका कहना था कि अगर सरसों का उत्पादन गांवों में होता है, तो सरसों का तेल भी गांवों में ही बनना चाहिए। इसमें ऐसे यंत्र का व्यवहार होना चाहिए, जो हाथों को बेकार न बनाएं और लोगों के काम का आनंद बढ़ाएं। निरंतर लोगों के काम के अवसर को खत्म करने वाली यांत्रिकी गांधी जी को मंजूर नहीं थी, क्योंकि वह मानते थे कि इससे धीरे-धीरे जो केंद्रीकरण होगा, वह शोषण को बढ़ावा देगा और उससे हिंसा को बढ़ावा मिलेगा।


आज शिक्षण, उद्योग, सामाजिक समरसता के क्षेत्र में लगातार एक के बाद एक चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। राजनीति हमारे समाज को एकजुट करने के बजाय टुकड़े-टुकड़े में विभाजित कर रही है। राजनीतिक सत्ता को अपने नियंत्रण में रखने के लिए नफरत, असहिष्णुता का एक ऐसा माहौल बनाया जा रहा है, जिसमें संकट बढ़ता ही जा रहा है। इसलिए आज वर्तमान संदर्भ में संकटों से निकलने का रास्ता अगर गांधी सुझाते हैं, तो उस पर विचार करना लाजिमी है।


संयुक्त राष्ट्र ने दो अक्तूबर को ‘अहिंसा दिवस’ घोषित किया था। गांधी जयंती को अहिंसा दिवस नाम इसलिए दिया गया, क्योंकि विश्व संगठन को यह महसूस हुआ कि हम हिंसा के जिस भयावह दौर से गुजर रहे हैं, उससे बाहर निकलने का एक ही रास्ता है, जो गांधी ने सुझाया है और वह है अहिंसा। गांधी की अहिंसा की बात केवल उपदेश तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उन्होंने स्पष्ट किया है कि अगर हम अहिंसक समाज बनाना चाहते हैं, तो हमारी राजनीति, हमारी अर्थनीति, हमारी संस्कृति, जो हमारी समाज रचना के बुनियादी आधार हैं, वे भी अहिंसा की बुनियाद पर होने चाहिए। जैसे, अगर शोषण पर आधारित आर्थिक नीति होगी, जो हिंसा का ही एक रूप है, तो हम अहिंसक समाज नहीं बना सकते। हमारी टेक्नोलॉजी, हमारी अर्थव्यवस्था, हमारी संस्कृति ऐसी बुनियाद पर आधारित हो, जो मानवीय हो, शोषण मुक्त हो, हिंसा मुक्त हो। उसी तरह से राजनीति में समाज को विभाजित करके आगे बढ़ने की जो प्रतिस्पर्धा चल रही है, वह भी हिंसा को बढ़ावा देने वाली है। इसलिए अहिंसक समाज की रचना के लिए राजनीतिक क्षेत्र में, आर्थिक क्षेत्र में, सांस्कृतिक क्षेत्र में-हर जगह अहिंसा के मूल्य दाखिल करने पड़ेंगे।


इस देश में व्यक्ति पूजा की परंपरा रही है, लेकिन हमारे देश के महापुरुषों और युग पुरुषों ने जो मिसाल पेश की है, वह उससे अलग है। बुद्ध ने बुद्धं शरणमं गच्छामि कहा, लेकिन हमने बुद्ध को ही भगवान बना दिया। महावीर अपरिग्रह साधना के क्रम में शिखर पर पहुंचे, लेकिन उन्हें भी हमने भगवान बना दिया। पिछले साठ साल से गांधी के विचारों में आस्था रखकर काम करने के बावजूद मैं यही कहना चाहूंगा कि गांधी को पूजा का प्रतीक बनाकर नहीं रखा जाए। गांधी जी क्रांतिकारी युगद्रष्टा थे, उन्होंने कभी नहीं कहा कि जो मैं कह रहा हूं, वही अंतिम सत्य है। उन्होंने कहा था कि सबको सत्य की तलाश करनी चाहिए, सबको सत्यनिष्ठ बनना चाहिए। इससे चिंतन के, विकास के, सभ्यता एवं संस्कृति के नए आयाम विकसित होंगे। हमें गांधी को मंदिर में स्थापित कर पूजा की वस्तु नहीं बनाना चाहिए, बल्कि उनके विचारों से प्रेरणा लेकर उनके मूल्यों को आगे बढ़ाना चाहिए। गांधी ने जीवन भर लक्ष्य को सामने रखा और खुद को पीछे रखा। अपनी सत्यनिष्ठा या विचार निष्ठा के कारण ही उन्होंने अपने जीवन का बलिदान दिया।
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