लेखिका गिल हॉफ्स अपनी किताब में जीवंत तरीके से ‘आरएमएस टेलर’ के अंत का
किस्सा सुनाती हैं और उन वजहों को बताती हैं, जो इस भव्य जहाज के डूबने का
कारण बनीं।
वह विशाल जहाज जैसे-जैसे अपने अंत की ओर बढ़ रहा था, वैसे-वैसे उसके डेक पर खड़े लोग अपने काल को करीब आता देख रहे थे।
अचानक खौफजदा लोगों की चीख-पुकार की आवाजें आने लगीं। तूफान की लहरों से जहाज का संतुलन गड़बड़ हो रहा था। क्षतिग्रस्त जहाज समंदर के बेहद ठंडे पानी में गहराइयों की तरफ बढ़ रहा था।
नाइट ड्रेस पहने बहुत से लोग डेक का सहारा लेकर संभलने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन इनमें से कई पानी की तेज लहरों के साथ आंखों से ओझल होते जा रहे थे।
कहीं महिलाएं मदद के लिए चिल्ला रही थीं, कहीं डरे हुए बच्चे अपने मां-बाप की गोद में सिमटे थे, तो कहीं लोग अपने प्रियजनों और कीमती सामान को बचाने के लिए जोर लगा रहे थे।
इस असमंजस की स्थिति में थोड़ी लाइफ जैकेट के लिए भी लोगों के बीच संघर्ष हो रहा था। चंद घंटों में समंदर के पानी में हर तरफ लाशें दिखने लगीं, क्योंकि वह भव्य जहाज अब पूरी तरह समंदर में समा चुका था।
ब्रिटेन की व्हाइट स्टार लाइन कंपनी की शान था ‘आरएमएस टेलर जहाज’। अपने समय के जहाजों में सबसे बड़ा, सबसे तेज और सबसे ज्यादा सुरक्षित समझा जाने वाला 230 फीट लंबा जहाज।
बेहद भरोसेमंद समझे जाने वाले कैप्टन नोबल के साथ यह जहाज अपने पहले सफर पर बड़ी धूमधाम के साथ निकला था। सुनने में यह भले ही टाइटेनिक जैसा लगे, लेकिन यह हादसा दरअसल टाइटेनिक से काफी पहले हुआ था।
यह घटना वर्तमान समय से 160 साल पहले की है। जनवरी 1854 में घटी थी ये घटना। इस हादसे में 650 में से 360 लोगों की मौत की बात आज भले ही लोगों के जेहन से धुंधली पड़ चुकी हो, लेकिन मनोविश्लेषक और लेखिका गिल हॉफ्स अपनी किताब 'द सिंकिंग ऑफ आरएमएस टेलर- द लॉस्ट स्टोरी ऑफ द विक्टोरियन टाइटेनिक' में जीवंत तरीके से ‘आरएमएस टेलर’ के अंत का किस्सा सुनाती हैं और वे वजहें बताती हैं, जो इस भव्य जहाज के डूबने का कारण बनीं।
जब कुछ बुरा होने वाला होता है, तो उसके संकेत पहले से मिलने लगते हैं। जहाज की यात्रा भी कई अपशकुनों के साथ शुरू हुई।
जहाज बनाने वाले चीफ इंजीनियर चार्ल्स टेलर, जिनके नाम पर जहाज का नाम टेलर पड़ा था, सफर की शुरुआत में साथ नहीं थे, वह अपनी पत्नी के गुजर जाने का शोक मना रहे थे। एक और अहम बात थी जहाज के कैप्टन जॉन नोबल की गैरहाजिरी।
यात्रा शुरू होने के कुछ घंटों पहले ही वह 25 फीट ऊंचे फोरकैसल से गिर गए थे। आश्चर्यजनक रूप से उन्हें चोट नहीं आई, लेकिन वह बुरी तरह घबरा गए थे। इस जहाज की मंजिल थी मेलबर्न शहर, लेकिन ब्रिटेन के वारिंगटन (जहां जहाज बना था) से जब जहाज चला, तो उसे एक अन्य कैप्टन संचालित कर रहे थे, दुर्भाग्य से इसी कारण नोबल को जहाज संचालित करने का मौका नहीं मिल पाया।
जहाज का डिजाइन शानदार और अनूठा था, लेकिन तत्कालीन समय में जहाज के परीक्षण का चलन नहीं था। इतने बड़ा जहाज को संचालित करने के लिए सिर्फ पतवार की ही व्यवस्था थी।
जहाज के विशालकाय आकार की तुलना में उसका राडार भी बहुत छोटा था, जिसके कारण उसे संतुलित और संचालित करना मुश्किल हो गया था।
जहाज के तीनों दिशा सूचक यंत्र अलग-अलग दिशाएं बता रहे थे। इतनी सारी कमियों के बावजूद अति-उत्साहित नाविकों के दबाव में कैप्टन नोबल यात्रा शुरू करने के लिए राजी हो गए थे।
जहाज पर क्रू मेंबर्स की संख्या 70 थी, लेकिन इनमें से सिर्फ 15 अपने काम पर लगे थे। बाकी लोग सफर शुरू होने के जश्न की खुमारी के नशे में धुत्त पड़े थे। सफर के दौरान खराब मौसम और धुंध से यात्रियों की मुश्किलें बहुत ज्यादा बढ़ गईं। आखिरकार जहाज अपनी दिशा से भटक गया। तूफानी हवाओं से जहाज झटके के साथ तीन बार चट्टान से टकराया और फिर धीरे-धीरे पानी में समाने लगा।
जहाज डूबने पर कंपनी व्हाइट स्टार लाइन की बड़ी बदनामी हुई। बाद में यह कंपनी दीवालिया घोषित हो गई और इसे थॉमस इसमे ने खरीदा। इन्हीं के बेटे जे. ब्रूस ने उत्तरी अटलांटिक सागर में 60 साल बाद विशालकाय आरएमएस टाइटेनिक लॉन्च किया, जिसका हश्र क्या हुआ, हम सभी जानते हैं। गिल हॉफ्स की इस किताब को पढ़ना इतिहास के पन्ने पलटने जैसा है। इसे यॉर्कशायर के प्रकाशक पेन एंड स्वार्ड ने छापा है।