फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

ट्रंप की नाकाम अफगान नीति

कुलदीप तलवार
Updated Wed, 03 Oct 2018 07:14 PM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
कुलदीप तलवार
अफगानिस्तान में अमेरिकी-नाटो सैनिकों को तैनात हुए 17 साल हो गए हैं। लेकिन हिंसा पर काबू नहीं पाया जा सका। माना जा रहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप की नई अफगान नीति से यहां के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। ट्रंप की अफगान नीति पिछले अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा जैसी है। तालिबान पहले के मुकाबले में कहीं ज्यादा प्रभावशाली हो रहे हैं। वे अमेरिकी-नाटो की शेष बची फौज और अफगान सेना से लगातार निर्णायक मुकाबला करने में सफल हो रहे हैं। अफगान सरकार का अभी 365 जिलों में से आधे पर नियंत्रण है, जो घट कर क्षेत्रफल का 51 प्रतिशत रह गया है। सच तो यह है कि युद्ध से जर्जर अफगानिस्तान सीरिया तथा ईराक से भी आगे निकल गया है। 2018 के पहले छः महीने में 1692 निर्दोष नागरिक मारे गए तथा 343 घायल हुए।  


अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने अगस्त में ईद के पवित्र त्योहार पर तालिबान के साथ तीन महीने के लिए युद्ध विराम किया था, लेकिन तालिबान ने इसे अस्वीकार कर दिया। इसके बाद से तालिबान ने अफगान फौजियों, पुलिसवालों पर लगातार हमले शुरु कर दिए। तालिबान के नेताओं ने अफगानिस्तान में शांति बहाली के लिए अमेरिका से सीधी बातचीत करने के लिए अफगानिस्तान में दो अमेरिकी फौजी अड्डे बंद करने व सैकड़ों कैदियों की रिहाई की शर्त रखी थी, जिसके लिए अमेरिका तैयार नहीं हुआ। हकीकत में तालिबान की जंग जारी रखने की वजह केवल एक है और वह है, अफगानिस्तान पर कब्जा करने के बाद वहां शरीयत का राज कायम करना। 


इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता है कि अमेरिका ने पाकिस्तान की मदद रोकने और समय-समय पर तालिबान को सहयोग बंद करने की चेतावनियां देने, तीखे तेवर दिखाने के अलावा पाक पर शिकंजा इतना सख्त नहीं किया, जितना जरूरी था। दुनिया जानती है कि अफगानिस्तान के निकट मौजूद सुरक्षित पनाहगाहों में पाकिस्तान में वर्षों तक तालिबान, हक्कानी नेटवर्क व लश्कर जैसे आतंकी संगठनों के खतरनाक मंसूबों को जगह दी है।


इन संगठनों के एजेंडे के लिए धन की उगाही व करों के जरिये तो पैसा मिलता ही है, इसके अलावा नशीली वस्तुओं का कारोबार करने वाले और अफगानिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों को लूटने वाले आपराधिक नेटवर्क से भी काफी मदद मिलती है। संयुक्त राष्ट्र ने अभी तक मादक पदार्थ तस्करी पर व्यापक ध्यान नहीं दिया है। 2018 के शुरु में सुरक्षा परिषद का एक प्रस्ताव अफगानिस्तान में आतंकवाद, मादक पदार्थ व प्राकृतिक संसाधनों के अवैध दोहन के बीच की सांठ-गांठ पर केंद्रित था, लेकिन यह तालिबान की मादक पदार्थ तस्करी पर लगाम लगाने की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर सका। 


इतिहास गवाह है कि अफगानिस्तान की भौगोलिक परिस्थितियां ऐसी हैं, जहां कोई विदेशी हमलावर आज तक जीत हासिल नहीं कर पाया। पहले अफगानिस्तान में रूस ने हस्तक्षेप किया था और फिर अमेरिका ने रूस की राजनीति को ही ध्वस्त कर के रख दिया। तोरा-बोरा की पहाड़ियों में अमेरिकी नेतृत्व वाली सेनाओं ने बहुत खाक छानी, लेकिन उन्हें कोई सफलता नहीं मिली। 


अफगान नागरिक जो देश में अमन चाहते हैं, वे वहां के बेकाबू होते हुए हालात से बहुत निराश है। ऐसे अफगान नागरिकों की कमी नहीं जिनका मानना है कि अमेरिका तालिबान पर पूरी तरह पकड़ नहीं बना पा रहा है, जिससे उनका भरोसा अमेरिका के प्रति कम हो रहा है। अब समय आ गया है कि तालीबान को निस्तोनाबूद करना होगा और इसके लिए अमेरिका को बड़ी कड़ाई से पाकिस्तान की नकेल कसनी जरूरी होगी, वरना खाली मदद बंद करने या चेतावनियां देने से काम चलने वाला नहीं है। 
विज्ञापन
विज्ञापन
Next