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नेतृत्व का शाश्वत सवाल

Mon, 01 Oct 2012 09:28 PM IST
पुष्पेश पंत
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भारतीय राजनीति में नेतृत्व का संकट नया नहीं। ‘नेहरू के बाद कौन?’ से लेकर आज तक इस सिरदर्द को पाला जाता रहा है। फिलहाल भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में पार्टी के संविधान को संशोधित कर नितिन गडकरी का कार्यकाल अगले तीन साल तक बढ़ाने वाले फैसले ने समसामयिक संदर्भ में इस मुद्दे के नए आयाम उद्घाटित कर दिए हैं, जिनके बारे में तटस्थता से विचार-विमर्श की जरूरत को टाला नहीं जा सकता।
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भाजपा के प्रवक्ता यह कहते नहीं थकते कि उनके दल में प्रतिभा का कोई अभाव नहीं है। एक नहीं, आधा दर्जन से अधिक ऐसे व्यक्ति हैं, जो प्रधानमंत्री पद के दावेदार होने योग्य हैं। ऐसे में यह विडंबना ही कही जा सकती है कि अध्यक्ष की कुरसी पर विराजने के लिए सिर्फ एक ही पात्र नजर आता है। इस बात को नजरंदाज नहीं किया जा सकता कि गडकरी का पहला कार्यकाल जबर्दस्त सफलताओं, उपलब्धियों वाला नहीं रहा है। संजय जोशी प्रसंग में मोदी के हठ के आगे उन्हें झुकना पड़ा था और विधानसभा चुनावों में उनकी भूमिका प्रेरक-प्रोत्साहक की नहीं रही। यहां हम उन पर लगे दूसरे आक्षेपों का जिक्र नहीं करना चाहते, पर विद्वता हो या भाषण-कला, राजनीतिक अनुभव हो या प्रशासनिक कौशल भाजपा में उनसे अधिक वजनदार नेता मौजूद हैं। भाजपा की तरफ से लीपापोती करने वालों का यह तर्क बिलकुल लचर है कि उनका दल जनतांत्रिक है और नेता का चुनाव कार्यकर्ता स्वेच्छा से करते हैं। कांग्रेस भी तो यही कहती है, पर सोनिया-राहुल के अलावा कांग्रेसी कार्यकर्ता को भी कभी कोई अन्य उम्मीदवार योग्य नहीं लगता। फिर उससे शिकायत क्यों?

दरअसल नेतृत्व का संकट केवल भाजपा और कांग्रेस तक सीमित नहीं है। साम्यवादी दलों तथा क्षेत्रीय दलों का हाल भी बेहतर नहीं। कभी कॉमरेड सुरजीत सिंदबादी बूढ़े की कथा याद दिलाते थे, तो आज करात का विकल्प नहीं। अकाली दल तथा द्रमुक में समानता है, तो यही कि एक कुनबे-कुटुंब-कबीले के बाहर से नेता नहीं चुना जा सकता। सपा हो या बसपा, बीजू जनता दल हो या नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी सदर का पद कहीं, कभी खाली नहीं दिखलाई देता है। शिव सेना, एनसीपी सभी की हालत एक-सी है।
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यहां हम यह बात जोर देकर कहना चाहते हैं कि सवाल सिर्फ वंशवाद का नहीं, विचारधारा के क्षय, सोच के सूखे का भी है। नेता का शब्दार्थ है-साथ ले जाने वाला, पथ प्रदर्शक, नायक-खेवनहार। जैसे नेत्र हमें राह दिखलाते हैं, वही जिम्मेदारी नेता की है। जिसकी आंखें खुद ही मुंदी हों, जो आंखें खोलकर सोने का आदी हो चुका हो, उसे नेता भला कैसे कह सकते हैं?

एक बार फिर भाजपा तथा कांग्रेस की तरफ लौटने की जरूरत है, क्योंकि देश के दुर्भाग्य से ये ही इस समय प्रमुख दल हैं। किसी एक चेहरे को नेता के रूप में प्रतिष्ठित कर उसकी मूर्तिपूजा या चरण चुंबन की प्रवृत्ति दोनों जगह एक जैसी दिखलाई देने लगी है। सत्तारूढ़ दल या प्रतिपक्ष में नीतियों के आधार पर अंतर करना असंभव होता जा रहा है। घरेलू आर्थिक नीतियां हों या विदेश नीति, मतभेद सिर्फ दिखावे के लिए है। नागरिक समाज के आंदोलनकारी भी नेतृत्व संकट के शिकार हो, बिखरते-विखंडित होते रहे हैं। अन्ना आंदोलन की करुण परिणति इसी का उदाहरण है।

वास्तव में असल चुनौती व्यक्तियों से परे कहीं अधिक जटिल और जोखिम भरी है। अमेरिका का सर्वशक्तिमान समझा जाने वाला राष्ट्रपति भी सर्वज्ञ नहीं समझा जाता। उसके सलाहकार (एक ही दल की प्रतिबद्ध पक्षधरता वाले भी) नीति-निर्धारण के मामले में अनेक विकल्प उसके सामने रखते हैं। तख्तनशीन राष्ट्रपति की नीतियों से खुले आम मतभेद जाहिर करने वाले उसी के दल के सीनेटरों, गवर्नरों की कभी कोई कमी नहीं रहती। ऐसी स्थिति में नीतियों या किसी एक नीति के वैकल्पिक स्वरूप पर सार्थक बहस जारी रखी जा सकती है। हमारे यहां जो पार्टी सुप्रीमो हो या आलाकमान की बागडोर थामे हो, उसकी बात काटने का दुस्साहस कोई अदना कार्यकर्ता तो छोड़िए, प्रांतीय क्षत्रप या सूबेदार भी नहीं कर सकता।

अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोप के अलावा सिंगापुर जैसे छोटे-से द्वीप तक में प्रतिभा और योग्यता के आधार पर ही कोई सार्वजनिक जीवन में पहचान बनाता है। माओ के बाद वाले चीन में भी पार्टी का शिखर नेतृत्व ‘टेक्नोक्रेटों’ के हाथ रहा है। दुर्भाग्य से आज भारत में नेता का मतलब सिर्फ राजनेता रह गया है, जहां किसी भी तरह एक बार चुन लिए जाने पर नेता में सभी गुण स्वतः विराजमान हो जाते हैं।

जिस देश में आधी से अधिक आबादी 25 वर्ष से कम उम्र की हो, पर सत्ता या विपक्ष के नेता सत्तर-अस्सी के शिखर पार ढलान पर हों, वहां भी सिर्फ ‘जोशे जवानी’ को बेलगाम बढ़ावा देना ‘हाय रे हाय’ तक ही पहुंचा सकता है। नेतृत्व के संकट की बात तभी किसी मुकाम तक ले जा सकती है, जब हम बुनियादी सरोकारों की, मुद्दों की, प्राथमिकता की तथा विचारधारा पर आधारित सहमति या मतभेद की कसौटी का इस्तेमाल करें।

समाजवाद हो या धर्म निरपेक्षता, तेज विकास दर हो या उदीयमान भारत का समावेशी सपना, इन शब्दों की तोता-रटंत न तो भाजपा की रणनीति की सफलता की गारंटी हो सकती है, न ही कांग्रेस की जान का जंजाल दूर कर सकने वाली रामबाण-मृतसंजीवनी! असल में भारतीय राजनीति का संकट तब तक दूर नहीं हो सकता, जब तक हमारा जनतंत्र अपने सामंती दरबारी सोच से मुक्त नहीं होता और राजनीति से इतर दूसरे क्षेत्रों में नेतृत्व का आदर नहीं करता।
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