राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की तीन खंडों में आने वाली आत्मकथा का पहला खंड पठनीय है, तो सिर्फ इसलिए नहीं कि यह समकालीन भारतीय राजनीति के एक दिग्गज की अपनी कहानी के बहाने सत्तर से अस्सी के राजनीतिक दशक का गहराई से चित्रण है, बल्कि इसका महत्व इसलिए भी है कि इसमें आपातकाल के बाद की कांग्रेस के हाल का जिक्र है। लेखक ने आपातकाल लगाने के लिए पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय को जिम्मेदार ठहराया है, जो तथ्यतः गलत भी नहीं है। आपातकाल के बारे में कैबिनेट में फैसला नहीं लिया गया था। गृह मंत्री ब्रह्मानंद रेड्डी को तो रात में प्रधानमंत्री आवास पर तलब किया गया!
लेखक यह तो मानते हैं िक आपातकाल को टाला जा सकता था, पर एकाधिक जगह वह आपातकाल का समर्थन करते दिखते हैं। उसके बाद मिली चुनावी हार से कांग्रेसी नेता इंदिरा गांधी से पीछा छुड़ाने लगे थे, पर प्रणब मुखर्जी ने ठान लिया था कि वह उनका साथ नहीं छोड़ेंगे। तब कांग्रेस अध्यक्ष ब्रह्मानंद रेड्डी ताकतवर हुए और इंदिरा गांधी को किनारे कर दिया गया था। लेखक ने जिक्र किया है कि तब अमेरिकी राष्ट्रपति के दिल्ली आगमन पर किस तरह इंदिरा गांधी को ट्रैफिक जाम में फंसना पड़ा था।
इस किताब में नटवर सिंह जैसी आत्मप्रशंसा नहीं है। अपनी शुरुआती दो उपलब्धियों का प्रणब दा ने जिक्र किया है-मंत्री के तौर पर देश में ग्रामीण बैंकों की शुरुआत करना और आर्थिक अपराधों के खिलाफ तेजी से कार्रवाई करना। लोकसभा चुनाव हारने पर इंदिरा गांधी द्वारा उन्हें डांटने का जिक्र है, तो गर्दिश के दिनों में प्रियरंजन दासमुंशी के तेजी से उभरने का भी उन्होंने वर्णन किया है। आपातकाल में महारानी गायत्री देवी की गिरफ्तारी के उनके फैसले को लेकर पार्टी के भीतर उनकी आलोचना हुई। लेखक कई जगह सिलेक्टिव हैं।
जैसे-आपातकाल के दौरान इंदिरा और संजय गांधी द्वारा की गई अनियमितताओं के बारे में तो किताब में चुप्पी है, पर जनता पार्टी शासन में मोरारजी देसाई सरकार की कमजोरियों और उनके बेटे की कथित अनियमितताओं का उल्लेख किया गया है। बेशक जनता शासन उम्मीदों के बोझ और महत्वाकांक्षाओं की लड़ाई से टूटा। पर यह भी सही है कि आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का सबसे दुर्भाग्यजनक अध्याय था। आत्मकथा का यह खंड मूलतः इंदिरा गांधी के नेपथ्य में जाने और जनता सरकार के पतन के बाद फिर ताकतवर होकर उभरने पर केंद्रित है। इस उद्देश्य में लेखक भले सफल हुए हों, पर किताब रोचक नहीं है और कहीं-कहीं तो सरकारी दस्तावेज की तरह लगती है। प्रणब मुखर्जी को भी किताब में ज्यादा जगह नहीं मिली। उम्मीद करनी चाहिए कि आत्मकथा के आगामी खंडों में रोचकता दिखेगी और भारतीय राजनीति के कुछ और अनछुए पहलू भी सामने आएंगे।
द ड्रामेटिक डिकेड- द इंदिरा गांधी ईयर्स
लेखक-प्रणब मुखर्जी
प्रकाशन- रुपा पब्लिकेशंस