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खिलने का समय मुरझाने के समय से बहुत छोटा है!

Sat, 24 Jan 2015 08:26 PM IST
देवप्रकाश चौधरी
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बसन्त चौधरी 'भारतीय कवि' नहीं हैं, फिर भी वह भारतीय परिवेश में खुद को बेहद सहज पाते हैं। वह नेपाल के हैं। उन्हें आप 'आधुनिक कवि' भी नहीं कह सकते, लेकिन वह एक ऐसे कवि जरूर हैं, जो आधुनिक समय में जीते हैं। शायद यही वजह है कि वह अपनी कविताओं में आधुनिकता से न तो ज्यादा आक्रांत दिखते हैं और न ही भारतीय हिंदी कविताओं से ज्यादा सम्मोहित-"कविता लिखने से पहले मेरे लिए तय करना कठिन होता है कि इसे नेपाली भाषा में लिखूं या फिर हिंदी में। हां कविता की शुरुआत जरूर नेपाली भाषा से हुई थी, अब हिंदी भी अपनी सी लगती है।"
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नेपाली भाषा में कई चर्चित किताबों के इस कवि को मंच पर भी बहुत पसंद किया जाता है। इनके नाम गीतों के कई अलबम दर्ज हैं। श्रेया घोषाल , मोहित चौहान, शान, नीति मोहन, रूप कुमार राठौड़, जावेद अली और पलक मुचाल जैसे नए और जोश से भरपूर गायक इनके गीतों को बार-बार गाना चाहते हैं तो इसके पीछे है, इनके गीतों की लयात्मकता। ''गोपाल दास नीरज के गीतों को गाते-गुनगुनाते और सुनते बड़ा हुआ हूं। कुंवर बेचैन को बहुत पढ़ा है। हरिवंश राय बच्चन और गोपाल सिंह नेपाली जैसे महान कवियों की किताबों से दोस्ती रही। तब से आज तक लय की तलाश रही है।'' अपनी बात कहते समय बसन्त चौधरी शर्माते हुए यह बताना नहीं भूलते कि लेखन की शुरुआत छोटी-छोटी कहानियों से हुई थी- "मैंने कुछ छोटी कहानियां लिखी थीं, पर अब अपने आप को शिद्दत के साथ कविता-गीत और गजल से जोड़ लिया है। लगभग 1985 से मैं कविता लिख रहा हूं। मैंने अपनी पहली कविता नेपाली में लिखी थी। 1999-2000 से हिंदी में कविता लिखना शुरू किया।"

बसन्त चौधरी साहित्य के भीतर के आदमी हैं, लेकिन साहित्य से बाहर भी उनकी सक्रियता इतनी ज्यादा है कि उनके यहां निरंतर साहित्य के बाहर और साहित्य के अंदर को एक साथ देखने और समझने की मासूम कोशिश चलती रहती है। यही वजह है कि उनकी रचनाओं में समय बीतने का एक बहुत ही तीखा अहसास होता है। इसके चलते ही उनकी
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कविताओं में एक उत्सवी पक्ष भी प्रकट होता है-''लिखता हूं तो सुकून महसूस करता हूं/ अंकुरित शब्दों को जी भर के उगने देता हूं/ इसलिए कि मैंने अपने मौन से आवाज पा ली है/ अब यहां पर/ कल्पनाओं का दशहरा/ लेखनी की दीवाली है।'' हाल ही में आई उनकी किताब 'मेघा' में नेपाली के साथ-साथ उनकी कुछ हिंदी कविताएं भी संकलित हैं। एक हिंदी कविता की किताब प्रेस में है।

पेशे से सफल और चर्चित उद्योगपति, स्वभाव से कवि और प्रयास से कहानीकार। बसन्त चौधरी को जानने के लिए इतना काफी नहीं है। लेकिन वह खुद को एक कवि या गीतकार के रूप में पेश करते हुए बेहद सुकून का अनुभव करते हैं। उनकी पहली हिंदी कविता थी, ‘तुम थी तो बात ही कुछ और थी’। इस कवि को पढ़ते हुए आप पाएंगे कि इनके यहां खिलने का समय मुरझाने के समय से बहुत छोटा है।

यानी पीड़ा का स्वर कुछ तीखा है। यही नहीं, और एक बात इस कवि को लेकर गौर करने की है कि  इनके पास अनुभव का विशाल परिदृश्य है, जिसकी वजह से इनके लेखन और कविताओं के बारे में कुछ ‘प्रिडिक्ट’ नहीं किया जा सकता। यह इस कवि की ताकत भी है, क्योंकि इसकी वजह से उनको पढ़ने का कौतूहल और उत्तेजना कभी मंद नहीं पड़ती। बातचीत के दौरान ऐसी बातों को वह दार्शनिक अंदाज में टाल जाते हंै और सिर्फ इतना कहते हैं, “आज इस दीवार पर फिर एक रंग चढ़ गया है/अपनी उम्र का सफर और थोड़ा बढ़ गया है।”
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