पहले वे 13 वर्ष की मलाला यूसुफजई को निशाना बनाने आए थे, उसके एक साल बाद उनके निशाने पर किशोरवय के लड़के थे, जिन्हें उन्होंने दिन-दहाड़े मार डाला। बुधवार ऐसा ही एक और रक्तरंजित दिन साबित हुआ, जब जनवरी के इस सर्द मौसम में अभिभावकों को अस्पतालों से अपने बच्चों के शव लेने के लिए आना पड़ा, ताकि वे सूर्यास्त से पहले उन्हें सुपर्दे खाक कर सकें! इनमें से अनेक विद्यार्थियों के सिर पर गोली मारी गई, मानो उन्हें मौत की सजा दी गई हो। खैबर पख्तूनख्वा के इन बच्चों में गजब का जज्बा है। तालिबान ने उनके स्कूलों, कॉलेजों को तबाह कर दिया, अनेक विद्यार्थियों को मार डाला। इसके बावजूद वे उठ खड़े होते हैं और जोर देकर कहते हैं कि वे चुपचाप घर पर नहीं बैठेंगे, क्योंकि तालीम हमारा हक है।
इस बार उन्होंने पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के पेशावर शहर के नजदीक चारसद्दा स्थित बाचा खान यूनिवर्सिटी के छात्रों को निशाना बनाया। सीमांत गांधी के नाम से प्रसिद्ध रहे गफ्फार खान के नाम पर बनी यह यूनिवर्सिटी पेशावर से पचास किलोमीटर दूर है। उस वक्त यूनिवर्सिटी के ऑडिटोरियम में उनकी याद में कार्यक्रम हो रहा था, लेकिन देखते ही देखते पूरा हॉल रक्तरंजित हो गया। 20 से अधिक छात्रों, प्राध्यापकों और सुरक्षा बल के जवानों को नजदीक से गोली मारी गई। अविभाजित भारत में गफ्फार खान अहिंसा और शांति की ही पैरोकारी करते थे, वह हिंसक राजनीति के खिलाफ थे और युवा पख्तूनों, खासकर महिलाओं की शिक्षा पर खासा जोर देते थे। यदि आज वे जीवित होते, तो देखते कि इन छात्र-छात्राओं ने इस हमले का किस तरह पूरे आत्मविश्वास के साथ मुकाबला किया।
इस यूनिवर्सिटी में 3,000 से अधिक छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं और बुधवार को मुशायरे की वजह से छह सौ मेहमान भी यहां आए हुए थे। इस हमले के बाद पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सीनेटर शेरी रहमान ने सवाल उठाया है कि जब एक हफ्ते से खैबर पख्तूनख्वा के स्कूलों पर हमले की धमकियां मिल रही थीं, तो फिर इस कार्यक्रम के लिए सरकारी सुरक्षा का इंतजाम क्यों नहीं किया गया। ऐसे ही सवाल और लोग भी उठा रहे हैं और कह रहे हैं कि शिक्षण संस्थानों पर ऐसे हमले पाकिस्तान के भविष्य और एक प्रमुख बौद्धिक केंद्र पर हमला है। ऐसे में यह जरूरी है कि इतने महत्वपूर्ण संस्थानों की सुरक्षा और बढ़ाई जाए।
वास्तव में तालिबान की धमकियों के कारण इस हफ्ते यहां अधिकांश स्कूल बंद ही रहे हैं। बुधवार को भी अनेक अभिभावक अपने बच्चों को लेने के लिए यहां आए थे। स्कूल, कॉलेज और बच्चों को पोलियो ड्रॉप पिलाने के अभियान से जुड़े लोग तालिबान का आसान निशाना हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि दूसरे संस्थानों में कहीं अधिक कड़ी सुरक्षा व्यवस्था है। हमले के तुरंत बाद वहां पुलिस और आर्मी पहुंच गई थी। चार घंटे तक दोनों ओर से गोलीबारी होती रही। अभिभावक अपने बच्चों की तलाश करते एंबुलेंसों के पीछे भाग रहे थे। कुछ बच्चों ने खुद को बाथरूम में भी बंद कर लिया था। सौ से अधिक लोग घायल हुए हैं, जिनमें अनेक की हालत गंभीर है, जिससे लगता है कि मृतकों की संख्या और बढ़ सकती है।
तालिबान ने दिसंबर, 2014 में पेशावर के आर्मी स्कूल में ऐसा ही हमला किया था। उस हमले में शामिल रहे पाकिस्तानी तालिबान के सीनियर कमांडर उमर मंसूर ने बाचा खान यूनिवर्सिटी में हुए इस हमले की भी जिम्मेदारी ली है। उसका कहना है कि यह यूनिवर्सिटी आर्मी की मदद करती है, इसलिए इस हमले को अंजाम दिया गया। इससे पाकिस्तानी आर्मी की बेबसी पता चलती है। जून, 2014 में पाकिस्तानी आर्मी ने तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान और इस्लामिक मूवमेंट ऑफ उज्बेकिस्तान जैसे आतंकी संगठनों के खिलाफ ऑपरेशन जर्ब-ए-अज्ब शुरू किया था, लेकिन ताजा आतंकी हमले से यह साबित होता है कि पाकिस्तानी आर्मी का यह पूरा ऑपरेशन नाकाम हो गया। तालिबान ने जनवरी महीने में ही न केवल इस यूनिवर्सिटी पर हमला किया है, बल्कि सुरक्षा बलों की चौकियों को भी निशाना बनाया है। इसका यह मतलब भी है कि तालिबान आज भी इतना ताकतवर है कि वह अपनी मर्जी से कहीं भी हमले कर अपनी मौजूदगी का विजिंटग कार्ड छोड़ सकता है!
यह विडंबना ही है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनके आर्मी प्रमुख जनरल राहील शरीफ सऊदी अरब और ईरान के साथ अपने रिश्तों को मजबूत करने में तो खासा वक्त जाया कर रहे हैं, लेकिन देश के भीतर सुरक्षा की स्थिति लगातार खराब होती जा रही है। हालांकि यह बात भी सही है कि पुलिस और आर्मी ने यदि तत्परता और पेशेवराना तरीके से स्थिति को नहीं संभाला होता, तो नुकसान कहीं अधिक हो सकता था। यह हमला जनरल राहील शरीफ के लिए कहीं अधिक बड़ी चुनौती है, क्योंकि यह पूरा ऑपरेशन आर्मी का था। इस क्षेत्र में तालिबान के निशाने पर आर्मी है, जैसा कि इससे पहले पेशावर के आर्मी स्कूल पर हुए हमले से भी पता चलता है। यह ठीक है कि आर्मी ने पुलिस के साथ मिलकर इस ऑपरेशन को अंजाम दिया, मगर उसकी चुनौतियां कम नहीं हो रही हैं। कहीं न कहीं शिक्षण संस्थानों की सुरक्षा व्यवस्था पर भी गौर करने की जरूरत है, क्योंकि तालिबान की ओर से यहां लगातार धमकियां मिल रही थीं।
ऐसे कठिन समय में भी कुछ लोग हैं, जो नायक की तरह उभरते हैं। बाचा खान यूनिवर्सिटी में केमेस्ट्री के युवा प्राध्यापक सैयद हामिद हसन ने साहस का परिचय देते हुए अपने कई विद्यार्थियों की जान बचाई, लेकिन वह खुद एक हमलावर की गोली का निशाना बन गए!
क्या यही ठीक समय नहीं है, जब विचार किया जाए कि आखिर अफगानिस्तान अब क्यों पाकिस्तान तालिबान के प्रमुख मुल्ला फजिलुल्ला के लिए सुरक्षित गलियारा बना हुआ है, जहां से वह पाकिस्तान के भीतर हमले के निर्देश देता है!
लेखिका पाकिस्तान की वरिष्ठ पत्रकार हैं