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मूल सवाल चेतना का है

Thu, 05 Sep 2013 08:18 PM IST
मनोज मिश्र
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गजब दृश्य है। किशोरी से बलात्कार जैसे घृणित आरोप से घिरने के बावजूद आसाराम के प्रति उनके भक्तों की आस्था में रत्ती भर फर्क नहीं पड़ा है। वे अब भी अपने आराध्य के पीछे पूरी निष्ठा से खड़े हैं। अभी कुछ दिनों पहले हमने देखा था कि तमाम तरह के कष्टों के निवारण के लिए जलेबी और समोसा खाने जैसे टोटके बताने वाले निर्मल बाबा की किस तरह फजीहत हुई। इसके बावजूद वह फिर से टीवी पर अवतरित हो चुके हैं। इस बार भी समागमों में उनके भक्तों की संख्या में कोई कमी नहीं दिखाई देती।
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आसाराम और निर्मल बाबा का मामला कोई अपवाद नहीं है। समय-समय पर ऐसे तमाम उदाहरण सामने आते रहे हैं, जब इन संत, स्वामी और बाबा जैसी उपाधियों से विभूषित शख्सों के विभिन्न आरोपों में फंसने के बावजूद उनकी प्रतिष्ठा पर कोई आंच नहीं आई। कुछ साल पहले का किस्सा याद आता है। दक्षिण के अरबों-खरबों की संपत्ति के स्वामी एक मठाधीश थे, जो हवा में भभूति और सोने की चेन इत्यादि प्रकट कर देने के लिए मशहूर थे। उन्हें जादूगर पीसी सरकार ने चुनौती दी थी कि जितने चमत्कार बाबाजी दिखाते हैं, वह उससे ज्यादा दिखा सकते हैं, तो क्या उन्हें भी उन्हीं की तरह ईश्वर का अवतार माना जाएगा। सरकार की चुनौती का कोई जवाब नहीं आया। लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ कि दक्षिण के उन स्वनामधारी बाबाजी के प्रति भक्तों की आस्था में कोई फर्क पड़ा हो।

आखिर क्या वजह है कि कलई उतर जाने के बावजूद इस तरह के विवादित साधु-संतों के मठ चलते रहते हैं? दरअसल, हम एक पिछड़ी चेतना वाले समाज में रह रहे हैं। समाज की चेतना को उन्नत करने का कोई गंभीर प्रयास हमारे यहां हुआ ही नहीं। यह विडंबना ही है कि राजनीतिक और सामाजिक विकास के बड़े-बड़े दावों के बावजूद हमारी चेतना का स्तर बेहद कमजोर है। कोई भी समाज इस तरह की विसंगतियों से तभी लड़ सकता है, जब उसमें वैज्ञानिक चेतना हो।
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विज्ञान की जानकारी और विज्ञान की चेतना, दो बिल्कुल भिन्न चीजें हैं। विज्ञान की जानकारी तो बहुतों को होती है, लेकिन वैज्ञानिक चेतना बहुत ही थोड़े लोगों में। यही वजह है कि जब डेढ़ दशक पहले देश भर में गणेश जी को दूध पिलाने की अफवाह फैली थी, तब अनेक वैज्ञानिक भी मंदिर में कतार में नजर आए थे। प्राथमिक स्कूल का एक शिक्षक दिन में अपनी कक्षा में बच्चों को पढ़ाता है कि ग्रहण सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी की स्थितियों के बदलने की वजह से पड़ते हैं। लेकिन जब वह स्कूल से घर पहुंचता है, तो ग्रहण वाले दिन राहु और केतु की काट के लिए दान देना नहीं भूलता।

पूरे समाज का हाल इन्हीं वैज्ञानिकों और शिक्षकों सरीखा है। जनता की चेतना के विकास के सामान्यत: दो ही जरिये होते हैं। या तो वह किसी प्रखर राजनीतिक आंदोलन के दौरान विकसित होती है या फिर सरकारें सचेतन तौर पर इसके लिए प्रयास करती हैं। भारत में इन दोनों ही स्तरों पर कुछ खास नहीं हुआ। गांधी जी ने आजादी की लड़ाई में जिस तरह धर्म का इस्तेमाल किया, उससे भी वैज्ञानिक चेतना के प्रसार की कोई स्थिति नहीं बनी। गांधी जी के प्रयासों से सभी धर्मों के प्रति समभाव का एक भाव तो जरूर विकसित हुआ, लेकिन अंधविश्वासों पर कोई कुठाराघात नहीं हुआ। आजादी के बाद सरकार से इस दिशा में प्रयास अपेक्षित थे। स्कूली शिक्षा के स्तर पर बच्चों में यह चेतना जागृत किए जाने की जरूरत थी, लेकिन सरकार यहां भी चूक गई।

स्कूली पाठ्यक्रमों में ऐसे सबक शामिल किए जा सकते थे, जो बच्चों में वैज्ञानिक सोच के संस्कार विकसित करते। उन्हें दुनिया को अपने ढंग से देखने की प्रेरणा देते। ऐसी प्रश्नाकुल पीढ़ी तैयार करते, जो आसपास की परिघटनाओं को जस का तस स्वीकार करने के बजाय उन्हें स्वविवेक से विश्लेषित करती। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो पाया। अब तो सरकारें जैसे इस दिशा में सोचने को तैयार ही नहीं हैं। जो व्यवस्था हर थाने में एक मंदिर बने रहने पर आंख मूंद लेती हो, उससे यह उम्मीद करना कि वह चेतना के विकास की लड़ाई लड़ेगी, निरर्थक ही है। परिदृश्य जब ऐसा हो, मूढ़ता के अंधेरे का साम्राज्य जब चारों तरफ व्याप्त हो, तो आसारामों और निर्मल बाबाओं की जय-जयकार होगी ही।
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