ऐसा महसूस होने लगा था कि भारत भी आर्थिक संवृद्धि के उसी मॉडल की ओर आकर्षित हो रहा है, जिसकी बदौलत चीन और पूरे पूर्वी एशिया के लाखों लोग गरीबी के मकड़जाल से बाहर निकल पाए हैं। लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था इस समय गड़बड़ी के दौर से गुजर रही है और आने वाले कुछ महीनों में इसकी दशा और बिगड़ने की आशंका है।
मुंबई में आयातित कंप्यूटर हार्ड ड्राइव के थोक विक्रेता विनोद वानीगोटा का कहना है कि पिछले दो हफ्तों में बिक्री में एक-चौथाई गिरावट आई है। हालिया दिनों में भारतीय रुपये की प्रवृत्ति इतनी ज्यादा अस्थिर रही है कि उन्हें हर आधे घंटे में अपनी मूल्य सूची में बदलाव लाना पड़ रहा है। चिप कॉम ट्रेडर्स, जिसके कि वह मैनेजिंग डायरेक्टर और सह-स्वामी भी हैं, का व्यापार इतना ठंडा पड़ चुका है कि उनके पास ट्रकिंग यानी माल की आवाजाही करने वाली कंपनियों को देने के लिए कोई काम ही नहीं है।
वास्तव में आर्थिक बदहाली ने उस पुरानी बीमारी को बेपर्दा कर दिया है, जो थोड़े समय पहले की आर्थिक बयार में छिप-सी गई थी। पुराने ढर्रे की आधारभूत संरचना, मंद पड़ा रोजगार बाजार, रियल एस्टेट की बेकाबू लागत और दागी सरकारी उपक्रमों ने खासतौर से निर्यात से जुड़े विनिर्माण क्षेत्र को मजबूती से आगे बढ़ने का मौका ही नहीं दिया।
पिछले अगस्त माह में डॉलर के मुकाबले रुपये में जितनी तेज गिरावट देखी गई, वह अंतरराष्ट्रीय व्यापार में प्रयुक्त होने वाली 77 दूसरी मुद्राओं की तुलना में कहीं ज्यादा थी। इसकी वजह यह थी कि अधिक से अधिक लाभ कमाने के चक्कर में समृद्ध देशों के निवेशकों ने अपना पैसा वापस निकाल लिया। पिछले कुछ वर्षों से आसमान छू रहा रियल एस्टेट बाजार भी लड़खड़ाता प्रतीत हो रहा है। मुंबई की ऊंची इमारतों पर काम कर रही क्रेनें भी रुक चुकी हैं, क्योंकि उनके संचालकों के पास पैसा ही नहीं है। उभरता हुआ मध्यवर्ग जिन चीजों की सबसे ज्यादा मांग कर रहा है, चाहे वह कार हो, अत्याधुनिक आईफोन हो या विदेशों में छुट्टियां, सभी के लिए अब उसे ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है। इससे उपभोक्ता मूल्य मुद्रास्फीति की स्थिति और ज्यादा खराब होने की आशंका है, जो 10 प्रतिशत वार्षिक की दर से पहले ही एशिया में सबसे ऊंची मानी जाती है। महंगाई के बढ़ने की वजह से अंतरराष्ट्रीय व्यापार घाटे और सरकारी बजट घाटे के परिमाण में बढ़ोतरी होगी, जो पहले से ही बढ़ा हुआ है।
भारत में डीजल और दूसरे आयातित उत्पादों के दामों में बढ़ोतरी से हालत और संकटग्रस्त हो सकती है। डीजल को भारतीय अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा माना जा सकता है। चाहे वह देश की खस्ताहाल सड़कों पर चलने वाला ट्रक हो या महंगी गाड़ियां या गैर-भरोसेमंद बिजली व्यवस्था में सहारा बनने वाला जेनरेटर हो, डीजल सबकी जरूरत है।
कुछ अर्थशास्त्रियों को उम्मीद है कि भारत इन आर्थिक हालात से वापसी जरूर करेगा और अगर कमजोर रुपया संघर्ष कर रहे निर्यातकों को उत्साहित करने पर ध्यान देता है, तो अगले वर्ष की शुरुआत में देश की अर्थव्यवस्था में सुधार देखा जा सकेगा। नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय लोकवित्त और नीति संस्थान के प्रख्यात अर्थशास्त्री अजय शाह कहते हैं, ‘भारत, यूनान नहीं है और यहां के लोगों में उधार लेकर घी पीने की प्रवृत्ति कभी नहीं रही।’ दरअसल भारत की दिक्कत यह है कि वह एक सशक्त निर्यातोन्मुखी औद्योगिक आधार बनाने में नाकामयाब रहा है। पश्चिम के खरीदार जहां एशिया में चीन के लगातार महंगे होते कारखानों का विकल्प ढूंढ रहे हैं, वहीं भारत और इसका कमजोर विनिर्माण क्षेत्र लगातार उपेक्षित हो रहा है।
असल में कमजोर बुनियादी संरचना की वजह से भारत में औद्योगिक रियल एस्टेट के दाम चीन की तुलना में काफी बढ़ गए हैं। पिछले पांच वर्षों के दौरान चीन ने तेज गति वाले 5,800 मील लंबे रेल मार्ग और दो या उससे अधिक लेन वाले चार लाख मील लंबे हाई-वे का निर्माण किया है। इससे हजारों फैक्टरियों को सुदूर बसे हुए छोटे कस्बों तक पहुंच पाने में सहूलियत हुई है, जहां जमीन के दाम भी काफी सस्ते हैं। भारत इस मामले में काफी पिछड़ा हुआ है। इतने ही समय में भारत में तेज गति वाले रेल मार्ग की तो बात ही छोड़ दें, चीन की तुलना में आधी दूरी के ही हाई-वे बन पाए हैं। इसके अलावा भूमि कानूनों की कमजोरी की वजह से जर्जर हो चुकी इमारतों को प्रतिस्थापित करना भी टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। इसीलिए मुंबई जैसे शहर में गगनचुंबी इमारतों के बीच में खस्ताहाल इमारतें भी दिखती हैं। महानगर के दूरवर्ती इलाकों में तमाम फैक्टरियां और ऑफिस खुल गए हैं, जहां कभी खेती होती थी।
21 वर्ष के प्रवासी मजदूर अरुण प्रजापति बताते हैं कि वह एक महीने में तकरीबन 100 डॉलर (करीब 6,600 रुपये) ही कमा पाते हैं, जो कि इतने ही समय में चीन के किसी मजदूर की कमाई का पांचवां हिस्सा ही है। हर महीने इसमें से नौ डॉलर (594 रुपये) एक छोटी सी खोली के किराये के लिए देना पड़ता है, जिसमें उनके साथ पांच और मजदूर रहते हैं। अपने गुजारे के लिए रोटी, दाल और हफ्ते में एक बार मांस या अंडे पर हर महीने 38 डॉलर (2500 रुपये) खर्च होते हैं। जो थोड़ा बहुत बचता है, उसे वह अपनी विधवा मां के पास मध्य भारत में बसे किसी गांव में भेजते हैं। जिस तरह से खर्चा बढ़ रहा है, मुश्किलें भी बढ़ती जा रही हैं। वह कहते हैं, ‘मैं बस जीने की कोशिश में लगा हूं।’