आदमी के पास आधार हो, तो बड़ी सुविधा हो जाती है जी। उसका राशन कार्ड बन जाता है, और बताते हैं कि राशन मिलने भी लगता है। उसे गैस भी मिलने लगती है। आधार नहीं हो, तो बिना कुछ खाए गैस बनने लगती है जी। आधार हो, तो मनरेगा का जॉब कार्ड भी मिल जाता है। एक जमाना था साहब, जब रीढ़ की बड़ी कद्र थी, और लोगों की दो श्रेणियां बन गई थीं- एक रीढ़ वाले लोग और दूसरे, बिना रीढ़ के लोग। फिर एक चीज नाक होती थी। कुछेक की नाक बड़ी ऊंची होती थी, जबकि दूसरों की तो कई बार नाक कट भी जाती थी। पर अब इन चीजों का कोई मतलब नहीं।
अब तो बस आधार है। आधार के आधार पर ही श्रेणियां निर्धारित होती हैं। या तो आपके पास आधार है या नहीं है। अगर आधार नहीं है, तो फौरन बनवाओ। पहले राजनीतिक पार्टियों के साथ यही होता था कि 'आधार' नहीं हो, तो वे जीत नहीं सकती थीं। मगर अब समस्या इतनी विकट हो चुकी है कि आदमी भी बिना आधार के नहीं चल सकता। आधार है, तो आदमी टिका रहता है। आधार नहीं है, तो उसे बोरिया-बिस्तर बांधना पड़ता है; ठीक उसी तरह, जैसे आधार छिन जाने पर राजनीतिक दलों को बोरिया-बिस्तर बांधना पड़ता है।
निराधार बातें तो चल जाती हैं, और अच्छे-खासे तथ्यों तक को आधारहीन ठहराया जा सकता है, लेकिन अगर आदमी आधारहीन हो जाए, तो उसके देशविहीन होने का खतरा पैदा हो जाता है। एक जमाने में राशन कार्ड लोगों की पहचान हुआ करता था, फिर वोट का कार्ड पहचान बना। अब आधार के बिना कोई पहचान नहीं।
यह तो दुआ दो सुप्रीम कोर्ट को, जिसने बिना आधार के इंसान को भी इस देश का नागरिक मान लिया, और यह कह दिया कि आधार के बिना लोगों को सरकार से मिलनेवाले लाभ के नहीं मिलने जैसी बातें निराधार हैं। हालांकि एक बार सरकार ने भी आधार को निराधार मान लिया था, पर पता नहीं क्यों फिर वह उसी पर आधारित होने लगी। ऐसे में अच्छा है कि सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया- इन आधारहीन बातों का कोई आधार नहीं।