खेल में जीत तभी मिलती है, जब खिलाड़ी मौके पर खेलें। एकदिवसीय क्रिकेट का विश्व कप खिलाड़ियों को यही मौका देता है। खेल की अच्छी लय और दबाव की स्थिति में ही मौके की सफलता सराही जाती है। ऑस्ट्रेलिया में विश्व विजेता बनने के लिए चार सर्वसम्मत दावेदार टीमें सेमीफाइनल में पहुंची थीं। मेजबान ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के अलावा बेहतरीन खेलती भारत और प्रतिभा संपन्न, मगर दम-घोंटू दक्षिण अफ्रीका आखिरी चार दावेदार थे। पहले सेमीफाइनल में जो क्रिकेट खेला गया, उसने एकदिवसीय खेल की गरिमा को बचाया और उसमें चार चांद लगाए हैं। दिल की धड़कनों को तेज करते हुए न्यूजीलैंड ने दक्षिण अफ्रीका को खुद दम-घोंटने पर मजबूर किया। इस तरह पहली बार न्यूजीलैंड की टीम फाइनल में पहुंची, जबकि दक्षिण अफ्रीका का फाइनल में खेलना सपना ही रह गया।
वहीं दूसरी तरफ, मेजबान ऑस्ट्रेलिया चार बार और भारत दो बार विश्व विजेता बन चुका है। दोनों को फाइनल में जीतना और दबाव में खेलना बखूबी आता है। इन दोनों में से जो जीतेगा, उसके लिए फाइनल का भय तो नहीं होगा, पर सफल होने का दबाव जरूर होगा।
खेलने के मौके और दर्शकों के दबाव में ही बाजार का भी खेल चलता-फलता है। उसे नित नए हीरो और नई परिस्थिति को भुनाने का मौका मिलता है। पिछले तीन महीने में सभी मैच हारने के कारण भारत को कोई भाव नहीं दे रहा था। लेकिन विश्व कप के पहले मैच से ही टीम इंडिया ने अपने खेल में गजब का समन्वय, संतुलन और आत्मविश्वास दिखाया है। अब तक के सारे मैच जीतते हुए उसने शान से सेमीफाइनल में प्रवेश किया, जहां आज उसका मुकाबला ऑस्ट्रेलिया से है। भले ही ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पिछले चार महीने में भारत ने कोई मैच नहीं जीता है, मगर कहना अतिशयोक्ति नहीं कि यही भारतीय टीम ऑस्ट्रेलिया को हराने की काबिलियत भी रखती है।
इस बदलाव का श्रेय बहुत हद तक कप्तान धोनी को जाएगा। उन्होंने भारतीय टीम को विश्व कप के लिए जिस तरह समेटा, संगठित किया और आत्मविश्वास दिया, वह बेहतर नेतृत्व दर्शाता है। भारतीय टीम ऑस्ट्रेलिया दौरे के शुरुआती दिनों में कमजोर, थकी-हारी और बिखरी हुई लग रही थी। मगर अब ऐसा लग रहा है कि धोनी ने ऑस्ट्रेलियाई दौरे को दो भाग में बांट दिया था, जहां पहला भाग सिर्फ विश्व कप की तैयारी में योजना बनाना और माहौल आदि से संबंधित था, जबकि दूसरे भाग में विश्व विजेता का प्रदर्शन करना।
भारतीय टीम जहां अभी मौके की लय और आत्मविश्वासी समन्वय से खेल रही है। वहीं ऑस्ट्रेलिया की टीम भी दबाव में निखरने की आदी है। खेल में सफलता निश्चय ही खेलने वालों के संघर्ष-कौशल पर निर्भर करती है। लिहाजा अभी भारतीय टीम मौके के मुहाने पर है। दूसरी तरफ, एकदिवसीय क्रिकेट के विश्व विजयी मौके का विश्व के सबसे विशाल बाजार को भी इंतजार है। विदेशी जमीन पर विश्व कप जीतना घरेलू मैदान पर जीतने से कहीं ज्यादा गरिमामय है। परिस्थिति को तराशना ही मौके को मथना है। बाजार खेल के मौके को तो दर्शा सकता है, लेकिन मौके पर खिला नहीं सकता। यह काम तो खिलाड़ियों का ही होता है। क्या भारतीय टीम मौके पर चौका मार पाएगी?