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वक्त परीक्षा के इम्तहान का

मनीषा सिंह Updated Wed, 21 Feb 2018 06:17 PM IST
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मनीषा सिंह
हमारे देश में रट्टू तोते की तरह की गई पढ़ाई के आधार पर परीक्षा में ऊंचे अंक-प्रतिशत हासिल करने वाले छात्र ही उच्च शिक्षा और अच्छी नौकरियों में आगे बढ़ते हैं। पर यदि लाखों छात्र एक झटके में परीक्षा ही छोड़ दें, तो इस व्यवस्था का मकसद ही क्या रह जाता है! दावा यह है कि इस बार यूपी बोर्ड की हाई स्कूल और इंटरमीडिएट की परीक्षाओं में लाखों छात्र नकल रोकने के सख्त इंतजामों के चलते अनुपस्थित हैं। हमारे देश में परीक्षा का यह चलन ब्रिटिश शैली की शिक्षा व्यवस्था के तहत आया।


परीक्षा प्रणाली का जनक हालांकि चीन है, जहां 7 वीं सदी में शाही अफसरशाही के लिए अधिकारी चुनने के लिए परीक्षा ली जाने लगी थी। पर परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह साफ-सुथरा और उद्देश्यपूर्ण नहीं माना जाता। जरूरी नहीं कि परीक्षा में उत्तीर्ण व्यक्ति नाकाम रखने वाले से श्रेष्ठ ही हो। चीन में हर साल एक करोड़ से ज्यादा छात्र एक प्रतियोगी परीक्षा- गाओकाओ में बैठते हैं, जिसमें रैंकिंग से उनका भविष्य तय होता है। चीनी बच्चे इसमें अच्छी रैंकिंग के लिए दस-दस साल तक तैयारी करते यानी रट्टा लगाते हैं।


नकल पर सख्ती करने और परीक्षा ही छोड़ देने के इस प्रसंग में यह देखा जाना चाहिए कि आज हमारी शिक्षा में बच्चों को किस चीज के लिए प्रेरित किया जा रहा है। लक्ष्य सिर्फ एक ही है कि कैसे बच्चे परीक्षा में अच्छे नंबरों से पास हों, ताकि उच्च शिक्षा या नौकरी में वे विफल न हों। हर साल नामी इंजीनियरिंग, प्रबंधन संस्थानों से निकले कुछ छात्रों को लाखों-करोड़ों के शुरुआती पैकेज मिलने पर अभिभावक सोचते हैं कि क्या उनका बच्चा भी ऐसा करिश्मा कर पाएगा। पर उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले वे बच्चे इन सुहाने सपनों को साकार करने के लिए क्या करें, जिन्हें पढ़ाई के लिए कायदे के संसाधन तक नहीं मिल पाते।


मीलों पैदल चलकर स्कूल पहुंचने और रास्तों में शोहदों से परेशान होने पर गांव-कस्बों की लड़कियों के सामने पढ़ाई और परीक्षा छोड़ देने या नकल से परीक्षा पास करने के अलावा विकल्प नहीं होता। अतीत में रूबी और गणेश जैसे ‘टॉपरों’ को गिरफ्तार करने वाली और इस साल लाखों छात्रों को भयभीत कर परीक्षा ही छुड़वा देने वाली व्यवस्था से यह सवाल तो पूछना चाहिए कि क्या परीक्षा छोड़ने वाले इन लाखों विद्यार्थियों को साल भर स्कूल जाने का मौका मिला था, क्या वहां शिक्षक और पर्याप्त संसाधन थे? गांव-कस्बों के स्कूलों में न तो पढ़ाई के माकूल प्रबंध हैं और न वहां शिक्षक पढ़ाने के प्रति गंभीर रहते हैं। 2016 में ‘प्रथम’ ने 12 वीं तक के छात्रों पर पिछले कई वर्षों में किए गए अध्ययन से एक रिपोर्ट तैयार की थी, जो बताती थी कि पांचवीं में पढ़ने वाले छात्र दूसरी कक्षा की किताबें भी ठीक से नहीं पढ़ पाते। शिक्षा तंत्र का सारा जोर बिना पढ़ाए परीक्षा लेने पर रहता है।


ऐसे में छात्रों के लिए परीक्षा पास करने के लिए नकल ही एकमात्र जरिया बचता है। पर यदि नकल रोकने की सख्ती की जाती है-जिसमें जेल भेजने का भी प्रावधान हो, तो परीक्षा छोड़ना ज्यादा समझदारी भरा कदम प्रतीत होता है। हमारा समाज और नौकरियों का पूरा तंत्र यह सोच पाने में नाकाम रहा है कि प्रतिभा के आकलन का और क्या तरीका हो सकता है। जब परीक्षा में मिले अंक ही पूरे जीवन में काम आते रहेंगे, तो उसमें धांधलियों की आशंका तो बनी ही रहेगी।
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