नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा प्रतीकात्मक और वास्तविक, दोनों कारणों से महत्वपूर्ण है। यह उनकी एक ऐसे देश की यात्रा है, जो नौ वर्षों तक उन्हें वीजा देने से इन्कार करता रहा, और आज उनके स्वागत में लाल कालीन बिछाने को तैयार है। न्यूयॉर्क में मोदी 18,000 से ज्यादा भारतीय अमेरिकियों को संबोधित करेंगे, इसका भी प्रतीकात्मक महत्व है। मोदी की यह यात्रा कूटनीति के एक व्यस्त दौर के बाद हो रही है। इसमें चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ उनकी मुलाकात भी थी, जो उसी दौरान सीमा पर गतिरोध के कारण ज्यादा चर्चा में रही। उससे पहले उन्होंने जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे से मुलाकात की, जिन्होंने भारत में 35 अरब डॉलर के निवेश का वायदा किया, तो ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री टोनी अबॉट की मेजबानी भी की, जो भारत को यूरेनियम बेचने पर सहमत हो गए हैं। मोदी इसके अलावा नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के साथ संबंधों को बेहतर बनाने की कोशिश में भी लगे रहे।
वाशिंगटन मोदी के मौजूदा कूटनीतिक चक्र का अंतिम बड़ा पड़ाव है, जहां उन्हें अपना जादू दिखाना ही होगा। अगर वह चाहते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था फले-फूले, तो यह उनके लिए एक बड़ी परीक्षा है। भारत के विकास के लिए अमेरिकी प्रौद्योगिकी और निवेश महत्वपूर्ण है। मोदी के इस दौरे के तीन मुख्य हिस्से हैं-द्विपक्षीय एजेंडे पर बातचीत और उसमें नए आयाम जोड़ना, भारत को दोबारा ऊर्जस्वित करने के लिए विभिन्न अमेरिकी कंपनियों के सीईओ से बातचीत, और भारतीय अमेरिकी समुदाय के साथ संवाद।
रात्रिभोज पर मोदी और ओबामा की मुलाकात एक-दूसरे को समझने के लिए महत्वपूर्ण अवसर हो सकती है। चूंकि मोदी उपवास पर हैं, ऐसे में, उनके पास बातचीत के लिए पर्याप्त समय होगा। ओबामा जहां यूक्रेन संकट और आईएस के खिलाफ छेड़े गए युद्ध के लिए विभिन्न देशों से गठजोड़ चाहते हैं, वहीं मोदी इस्लामी कट्टरपंथ के बढ़ते खतरे के बारे में संभवतः ओबामा को क्षेत्र की रिपोर्ट देंगे, जिसमें पाकिस्तान की संदिग्ध भूमिका भी शामिल होगी।
मगर क्या दोनों नेता एक दूसरे की मदद के लिए कोई रास्ता तलाश पाएंगे? वाशिंगटन में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल क्या ब्रजेश मिश्र की तरह अपनी क्षमता साबित कर पाएंगे? याद रखना चाहिए कि एनडीए के पिछले दौर में लालकृष्ण आडवाणी की सलाह पर भारत इराक के खिलाफ युद्ध में अमेरिका का सहयोगी लगभग बन चुका था, पर आखिर में उसने इरादा बदला, क्योंकि अटल बिहारी वाजपेयी की कूटनीतिक समझ कहीं बेहतर थी। आईएस के खिलाफ भारत संभवतः मदद का प्रस्ताव रखे, क्योंकि उसका अपना हित भी दांव पर है। अल कायदा के दक्षिण एशियाई शाखा की घोषणा निश्चित रूप से मोदी के दिमाग में होगी।
वार्ता का दूसरा प्रमुख मुद्दा रक्षा क्षेत्र में सहयोग से जुड़ा हो सकता है। इस अवसर पर भारत-अमेरिकी रक्षा ढांचा समझौते, जो 2015 में खत्म होने वाला है, के नवीनीकरण की घोषणा हो सकती है। रक्षा व्यापार और प्रौद्योगिकी पहल के तहत दोनों देश अमेरिकी एंटी टैंक मिसाइल के सह-उत्पादन की भी घोषणा करने वाले हैं। साझा अंतरिक्ष अनुसंधान के तहत इसरो और नासा के बीच तालमेल की भी घोषणा हो सकती है।
अगर मोदी को चीन की आक्रामकता रोकने के लिए एशिया में अमेरिकी निवेश और रणनीतिक सहयोग की जरूरत है, तो अमेरिका को सबसे विशाल लोकतंत्र के बाजार और एशिया में शक्ति संतुलन के लिए भारत के सहयोग की जरूरत है। पर दोनों के बीच के पुराने मतभेदों को पाटना भी आसान नहीं। पाकिस्तान के प्रति अमेरिकी नीति असहमति का एक बड़ा क्षेत्र है। पाक सेना और आईएसआई को बार-बार अमेरिका द्वारा धन और हथियार देना भारत पसंद नहीं करता। मोदी की यात्रा से ठीक पहले ओबामा प्रशासन ने पाकिस्तान को 19.8 करोड़ डॉलर की 160 एमआरएपी (माइन रेसिस्टेंट एंबुश प्रोटेक्टेड ह्विकिल) बेचने की घोषणा की है। भारत ने भी इसमें दिलचस्पी दिखाई थी, पर अमेरिका ने इस पर कोई जवाब नहीं दिया।
अमेरिका बार-बार कहता है कि भारत के साथ उसका रणनीतिक रिश्ता दीर्घकालीन है। वह चाहता है कि भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बने। मगर वह भारत से एक खास रणनीतिक दूरी भी बनाए रखना चाहता है। अवसरों के चूकने, अलग-अलग संकेत देने, आकांक्षाओं और उसे पूरा करने में तालमेल की कमी होने और भारत के प्रति ओबामा प्रशासन के शुष्क रवैये के कारण पिछले चार वर्षों में आपसी रिश्ते लड़खड़ाए हैं।
लेकिन मोदी के नेतृत्व में आई भारत की नई सरकार ने अमेरिकी हितों और उम्मीदों को फिर ताजा कर दिया। मोदी सरकार के पहले सौ दिनों के कामकाज को अमेरिका सकारात्मक ढंग से देख तो रहा है, पर भारत में बाजार समर्थक नीतियों के अभाव के कारण वह अभिभूत नहीं है। ज्यादातर अमेरिकी राजनेता और प्रमुख सीईओ मोदी से मिलना चाहते हैं, जो इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश के भूखे भारत के लिए अच्छा संकेत है। मोदी के सामने अमेरिकी कारोबारियों को व्यापार के लिए सहमत करने की कठिन चुनौती है। मोदी और उनके सलाहकारों को याद रखना चाहिए कि उनके दौरे के बारे में ऊपरी तौर पर उत्साह के बावजूद भीतर ही भीतर भारत और वहां के व्यापारिक परिदृश्य के प्रति संशय है।
भारत का परमाणु जवाबदेही कानून द्विपक्षीय एजेंडे का सबसे कठिन पहलू है, जो अमेरिका को भारत के परमाणु उद्योग में निवेश से रोकता है। इसके अलावा मल्टी ब्रांड खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को प्रतिबंधित करने का भाजपा का फैसला और विश्व व्यापार संगठन में व्यापार सुगमता समझौते पर हस्ताक्षर करने से भारत का इन्कार करना भी द्विपक्षीय रिश्ते में आड़े आ सकता है। लेकिन मोदी अगर भारत में जोश भर सकते हैं और इसे रोजगार सृजन के उत्साह में बदल सकते हैं, तो वह भारत-अमेरिका संबंध में भी ऊर्जा भर सकते हैं।
(अंतरराष्ट्रीय मामलों की जानकार वरिष्ठ पत्रकार)