गुजरात कैडर के पूर्व आईपीएस अधिकारी डी जी वंजारा के जमानत पर छूटने पर एक बड़ा विवाद पैदा हो गया है। गुजरात में फर्जी मुठभेड़ के कई मामलों में वंजारा का नाम आने के बाद 2007 में उन्हें गिरफ्तार किया गया था। इस हफ्ते जेल से छूटने के बाद उन्होंने कहा, 'उन पुलिस अधिकारियों के अच्छे दिन आ गए हैं, जो फर्जी मुठभेड़ मामलों में वर्षों से गुजरात की जेलों में बंद थे।' वंजारा तब गुजरात की सीमा से लगी बॉर्डर रेंज के इंस्पेक्टर जनरल थे, जब एक छोटा-मोटा अपराधी सोहराबुद्दीन, उनकी पत्नी कौसर बी और उनके सहयोगी तुलसी प्रजापति बस से आंध्र प्रदेश से गुजरात आते वक्त पुलिस के हाथों मारे गए। सर्वोच्च न्यायालय की देखरेख में सीबीआई ने उस मामले की जांच की और एक आरोपपत्र दायर किया, जिसमें वंजारा और अमित शाह समेत कई लोगों को फर्जी मुठभेड़ का आरोपी ठहराया गया। अमित शाह उस वक्त गुजरात के गृह मंत्री थे। अमित शाह को हाल ही में मुंबई उच्च न्यायालय ने इस आधार पर बरी कर दिया कि सोहराबुद्दीन, उनकी पत्नी और तुलसी प्रजापति के फर्जी मुठभेड़ में उनका हाथ होने के कोई सुबूत नहीं हैं।
वंजारा सभी पुलिस वालों के अच्छे दिन आने का दावा इस वजह से कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें भरोसा है कि अदालत में साबित हो जाएगा कि सोहराबुद्दीन समेत दूसरे लोगों की हत्या में कुछ भी गलत नहीं था। उल्लेखनीय है कि इशरत जहां और तीन दूसरे आतंकवादियों की हत्या के आरोपियों में भी वंजारा का नाम शामिल है। इशरत जहां वगैरह पर आतंकवादी साजिश रचने का आरोप था। वंजारा का दावा है कि फर्जी मुठभेड़ के आरोप में सलाखों के पीछे रहने वाले उनके समेत गुजरात के 26 दूसरे पुलिसवालों ने कुछ भी गलत नहीं किया है। पिछले वर्ष गुजरात सरकार को जेल से लिखी एक चिट्ठी में उन्होंने कहा था कि पुलिस अधिकारियों को बलि का बकरा बनाया गया, जबकि वे नेताओं को मिलने वाली आतंकी धमकियों से आक्रामकता से निपटने की सरकार की नीति का ही पालन कर रहे थे। चिट्ठी में उन्होंने यह भी लिखा था कि अमित शाह की वजह से इन पुलिस अधिकारियों का सिर नीचा हुआ है, और सरकार की नीति का पालन करने की कीमत इन्हें जेल में दिन काटते हुए चुकानी पड़ रही है। गुजरात सरकार को वह चिट्ठी भेजने के बाद वंजारा ने पुलिस सेवा से इस्तीफा दे दिया। हालांकि राज्य सरकार ने उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया, लेकिन हकीकत यह है कि वंजारा जेल में ही रिटायर हो गए।
यह दिलचस्प है कि जेल से रिहा होने के बाद वंजारा ने चिट्ठी में लिखी बात फिर से दोहराई है कि गुजरात सरकार की वजह से राज्य के पुलिस अधिकारियों को शर्मिंदा होना पड़ा है। यह जानना भी उतना ही दिलचस्प है कि फर्जी मुठभेड़ का आरोप झेल रहे तकरीबन सभी 28 पुलिस अधिकारियों और कांस्टेबलों को हाल ही में जमानत मिली है। इस हफ्ते वंजारा की रिहाई से पहले बहुत से दूसरे पुलिस अधिकारियों को न सिर्फ जमानत मिली, बल्कि उन्हें गुजरात सरकार ने कानून-व्यवस्था और विजिलेंस जैसे विभागों में महत्वपूर्ण पदों पर बहाल भी किया। लोगों की नाराजगी इस बात को लेकर है कि इन मामलों में चल रहे आपराधिक मुकदमों के खत्म होने से पहले ही आरोपी पुलिस अधिकारियों को ऐसी महत्वपूर्ण नियुक्तियां आखिर किस तरह दे दी गईं? टेलीविजन चैनलों पर भाजपा के प्रवक्ता सफाई देते हुए यह कह रहे हैं कि सेवा के नियम आरोपी पुलिस अधिकारियों की सेवा में बहाली की मंजूरी देते हैं, दोषसिद्धों की बहाली को नहीं, और इन अधिकारियों पर दोष साबित नहीं हुए हैं। जबकि कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि आरोपी पुलिस वालों की ऐसे महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति करना नैतिक तौर पर गलत है, क्योंकि ऊंचे पदों पर बैठकर ये अधिकारी मुकदमों की कार्यवाही पर असर डाल सकते हैं।
भूलना नहीं चाहिए कि जिन अधिकारियों पर मुकदमे चल रहे हैं, उन पर हत्या के गंभीर आरोप हैं। कानून के मुताबिक, जमानत पर रिहा हुए किसी शख्स को ऐसी नियुक्ति नहीं दी जा सकती, जहां से वह जांच या गवाहों को प्रभावित कर सके। इन मामलों में जांच बेशक पूरी हो चुकी हो, मगर सुनवाई शुरू होनी अभी बाकी है। जिन पुलिस अधिकारियों की पुनर्नियुक्ति हुई है, उनमें अभय चूड़ासमा भी शामिल हैं, जिन्हें सुपरिंटेंडेंट विजिलेंस जैसा ताकतवर पद दिया गया है। जबकि दूसरे पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति पुलिस मुख्यालय में हुई है। यह समझना जरूरी है कि फर्जी मुठभेड़ मामलों में कुछ गवाह पुलिस वाले भी हैं। जबकि जो आरोपी हैं, उन्हें इन गवाहों के ऊपर नियुक्ति दी जा रही है! मानो यही कम बड़ी विडंबना न हो, उच्चतर अदालतों ने खासकर जिन पुलिस अधिकारियों के जिम्मे फर्जी मुठभेड़ मामलों की जांच सौंपी थी, उनकी नियुक्ति सजा के तौर पर पूर्वोत्तर और ऐसे ही दूसरे क्षेत्रों में कर दी गई है। यही नहीं, दबाव बनाने के लिए उनके खिलाफ छोटे-मोटे मामले भी दर्ज करा दिए गए हैं, ऐसे में उन अधिकारियों को अब अदालतों में अपने अधिकारों की लड़ाई लड़नी पड़ रही है।
दरअसल, फर्जी मुठभेड़ के इन मामलों में पूरा अपराध तंत्र बुरी तरह ध्रुवीकृत गुजरात और बाकी देश के बीच कहीं उलझ-सा गया है। ऐसी स्थिति में न्याय बाधित हुआ-सा लगता है। कुल मिलाकर देखें, तो फर्जी मुठभेड़ मामलों से संबंधित इतने सारे पुलिस अधिकारियों की प्रभावशाली पदों पर दोबारा बहाली न्याय के लिहाज से अच्छी बात नहीं है। इनमें से कुछ मामलों में तो सर्वोच्च न्यायालय की प्रत्यक्ष निगरानी में सीबीआई ने जांच की थी। यह देखना वाकई बहुत दिलचस्प होगा कि पिंजरे में बंद तोता कही जाने वाली सीबीआई इन मुकदमों की सुनवाई के दौरान किस तरह से पेश आती है। नैतिकता की बुनियाद पर टिकी हमारे न्यायिक तंत्र के लिए यह परीक्षा की घड़ी है।