1947 के हमले को उसने अफगानिस्तान और पाकिस्तान की सीमा पर बसे कबाइलियों द्वारा, 1965 के हमले को स्थानीय कश्मीरियों और 1999 के कारगिल हमले को भी स्थानीय कश्मीरी आतंकवादियों का ही कृत्य बताने की कोशिश की थी। अक्सर पाकिस्तानी सेना अपनी छवि को बचाने के लिए युद्ध में धोखेबाजी और अपनी भागीदारी को छिपाने का प्रयास करती आई है, लेकिन हर बार उसका काला सच उजागर होता रहा है। 1947 में विभाजन के फौरन बाद पाकिस्तानी सेना ने कश्मीर पर हमला कर दिया और इस हमले में अपनी संलिप्तता छिपाने के लिए घोषणा की कि पाकिस्तान-अफगानिस्तान की सीमा पर बसे पठान कबाइलियों ने यह हमला किया है। उस समय तक जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय नहीं हुआ था, इसलिए वहां की छोटी-सी सेना उसके इस हमले का मुकाबला नहीं कर सकी। इसी कारण पाकिस्तानी सेना उस पर कब्जा करते हुए बारामुला तक पहुंच गई, जो श्रीनगर से केवल 60 किलोमीटर दूर है। इस समय जम्मू-कश्मीर के शासक ने भारत में विलय का निर्णय ले लिया, जिसके बाद भारतीय सेना ने फौरन श्रीनगर पहुंचकर हमलावरों को खदेड़ दिया। लेकिन इसी समय भारत सरकार यूएनओ में चली गई और यूएनओ ने युद्ध विराम की घोषणा कर दी, जिस कारण कश्मीर के कुछ हिस्सों पर अब तक पाकिस्तान का कब्जा है, जिसे पाक अधिकृत कश्मीर बोला जाता है।
पाकिस्तानी सेना की धोखेबाजी का सबसे बड़ा उदाहरण कारगिल युद्ध है। इस युद्ध को भी पाकिस्तानी सेना ने 1965 की तरह दिखाने की कोशिश की तथा प्रचार किया कि कश्मीर के स्थानीय निवासियों ने ही कारगिल की पहाड़ियों पर कब्जा किया है और वे कश्मीर को भारत से अलग कर पाकिस्तान के साथ मिलाना चाहते हैं। भारतीय सेना ने इस हमले का मुकाबला करते हुए पाया कि यह हमला पूरी तरह से पाकिस्तानी सेना ने ही किया है। इस हमले में भी पाकिस्तान को हार मिली और हद तो तब हो गई जब पाकिस्तानी सेना ने अपने मारे गए सैनिकों के शवों को भी लेने से इन्कार कर दिया।
पाकिस्तान ने चार युद्धों में भारत के हाथों बुरी हार पाई और उसके बाद उसको विश्वास हो गया कि वह भारतीय सेना से आमने-सामने के युद्ध में नहीं जीत सकता। इसके बाद वह पूरी तरह से आतंकी हमलों के जरिये भारत में अशांति फैलाने की साजिश रचने लगा। उसने 2001 में संसद और 2008 में मुंबई आतंकी हमले कराए। इन दोनों हमलों को भारत ने नाकाम कर दिया, परंतु उस समय भारत सरकार ने ऐसे कदम नहीं उठाए, जिनसे पाकिस्तान में पलने वाले आतंकी संगठनों को समाप्त किया जा सके, लेकिन पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सोच-समझकर पाकिस्तान में स्थित आतंकी संगठनों के न केवल ठिकानों को नष्ट किया, बल्कि कई आतंकियों को भी मार गिराया। इस कार्रवाई से भारत ने पाकिस्तान को बता दिया कि वह पाकिस्तान में घुसकर इन आतंकी कैंपों को समाप्त करने में सक्षम है।
पाकिस्तान के आग्रह पर भारत ने संघर्ष विराम कर दिया, लेकिन एक बार फिर वहां की सरकार और सेना में सामंजस्य का घोर अभाव दिखा। पाकिस्तानी सेना ने संघर्ष विराम का उल्लंघन कर फिर से भारत पर ड्रोन हमलों का दुस्साहस किया, लेकिन भारत ने उसके इस हिमाकत को नाकाम कर दिया। सेना के आगे पाकिस्तानी सरकार की कुछ नहीं चलती, तभी तो ऑपरेशन सिंदूर में भारत के हाथों मुंह की खाने के बावजूद पाकिस्तान की सरकार जनरल असीम मुनीर को फील्ड मार्शल बनाने को मजबूर हुई है। ऐसे में इस बात की ही फिर पुष्टि होती है कि पाकिस्तान भरोसे लायक देश नहीं है और वह अपनी नापाक हरकतों से बाज आने वाला भी नहीं है।
अब भारत को विश्व पटल पर पाकिस्तान की 1947 से लेकर अब तक की हरकतों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करना चाहिए और संयुक्त राष्ट्र में मजबूती से यह बताना चाहिए कि किस प्रकार पाकिस्तान पूरे विश्व में आतंकवादियों का निर्यात कर रहा है। अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला हो, या फिर दुनिया के किसी भी हिस्से में आतंकी वारदात में कहीं न कहीं पाकिस्तान का हाथ जरूर होता है। इतिहास गवाह है कि चाहे कुछ भी कर लिया जाए पाकिस्तान सुधरने वाला नहीं है।