रिपोर्ट जिस तरह से हिंदुओं को निशाना बनाए जाने और सत्तारूढ़ दल के नेता के साजिश में शामिल होने की ओर इशारा करती है, इससे पूरे घटनाक्रम के सुनियोजित होने का संदेह ही पैदा होता है। सबसे चिंताजनक बात तो यह है कि हिंसा के दौरान पुलिस पूरी तरह से निष्क्रिय बनी रही, जिससे पीड़ितों को समय पर मदद तक नहीं मिल सकी। मुर्शिदाबाद में जो हुआ, वह दुर्भाग्यपूर्ण था, लेकिन इस पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का रवैया कहीं अधिक दुर्भाग्यपूर्ण रहा।
यह देखते हुए भी कि संशोधित वक्फ अधिनियम को राज्य में लागू नहीं किए जाने के उनके आश्वासन ने काम नहीं किया, उन्होंने कोई कदम नहीं उठाया। जिस तरह उन्होंने स्थितियों से निपटने की कोशिश की और गलतियां स्वीकारने के बजाय अपनी ही सरकार की रिपोर्ट के जरिये खुद की नाकामियों को ढकना चाहा, उसके बाद तो उनकी क्षमता व नीयत पर उठ रहे सवाल जायज ही लगते हैं। उन्हें समझना चाहिए कि किसी कानून का विरोध संविधान व कानून के शासन की सार्वजनिक अवहेलना की वजह नहीं बन सकता।
वह बेशक खुद को सर्वधर्म समभाव की समर्थक बताएं, पर पुलिस की निष्क्रियता, तृणमूल नेताओं की संलिप्तता व पीड़ितों को त्वरित न्याय न मिलने से उनकी सरकार की कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न तो खड़े होते ही हैं। उल्लेखनीय है कि दिसंबर, 2019 में नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए के खिलाफ प्रदर्शनों और पिछले वर्ष रामनवमी के दौरान भी मुर्शिदाबाद में हिंसा भड़की थी।
दरअसल, ये हिंसाएं सिर्फ कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं, ये राजनीतिक और प्रशासनिक विफलता भी हैं, अब उच्च न्यायालय की समिति की रिपोर्ट से इसकी पुष्टि भी हो रही है। राज्य की सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाला मुर्शिदाबाद बांग्लादेश की सीमा से जुड़ा है। यही नहीं, पाकिस्तान व बांग्लादेश के गठजोड़ और बांग्लादेशी घुसपैठियों की समस्या पश्चिम बंगाल को बेहद संवेदनशील बनाती है।
अगले वर्ष यहां विधानसभा चुनाव भी होने हैं। ऐसे में जरूरी है कि पश्चिम बंगाल सरकार सिर्फ राजनीतिक फायदे के बारे में न सोचते हुए निष्पक्ष ढंग से कानून के शासन को दृढ़ता से स्थापित करने का प्रयास करे और अपना ध्यान शासन और विकास पर भी केंद्रित करे। सत्तारूढ़ पार्टी होने के नाते तृणमूल कांग्रेस केवल राजनीतिक विरोधियों पर दोष मढ़कर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती।