हालिया घटना कराची के गुलिस्तान-ए-जौहर इलाके की है, जहां आतंकियों ने सिंध रेंजर्स के मुख्यालय पर हमला किया, जिसमें कुछ पाकिस्तानी रेंजर्स की मौत हो गई। इस गंभीर आंतरिक विफलता की समीक्षा करने के बजाय पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और गृह मंत्री मोहसिन नकवी समेत पूरे तंत्र ने इस हमले के पीछे भारत का हाथ होने का झूठा राग अलापना शुरू कर दिया। दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तानी सेना यह स्वीकार कर चुकी है कि इस वारदात के पीछे प्रतिबंधित चरमपंथी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के धड़े ‘जमात-उल-अहरार’ के आतंकियों का हाथ है।
दरअसल, आतंकवाद को अपनी राज्य नीति के एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने वाले पाकिस्तान के लिए यह कोई नया रवैया नहीं है। पिछले कई दशकों से पाकिस्तान में जब भी हिंसा या उग्रवाद बढ़ता है, तो वह इसका आरोप भारत पर मढ़ देता है। वह भूल जाता है कि वैश्विक आतंकी ओसामा बिन लादेन से लेकर हाफिज सईद और मसूद अजहर जैसे कुख्यात आतंकवादियों को पालने-पोसने वाली धरती उसकी अपनी ही रही है।
भारत तो दशकों से पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का सबसे बड़ा शिकार रहा है। वर्ष 1993 के मुंबई सिलसिलेवार बम धमाकों से लेकर 2001 में संसद पर हमला, 2008 का मुंबई आतंकी हमला, 2016 का पठानकोट एयरबेस हमला, उरी में सैन्य शिविर पर हमला और 2019 का पुलवामा हमला-इन सभी घटनाओं ने बार-बार पाकिस्तान स्थित आतंकी नेटवर्क की भूमिका की ओर ही इशारा किया है। फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) ने भी आतंकवाद की फंडिंग और मनी लॉन्ड्रिंग न रोक पाने के लिए पाकिस्तान को कई वर्षों तक ‘ग्रे लिस्ट’ में रखा था।
इसके बावजूद, अगर पाकिस्तान भारत पर आरोप लगा रहा है, तो यह न केवल हास्यास्पद है, बल्कि आतंकवाद के मुद्दे पर उसके दोहरे रवैये का भी परिचायक है। पाकिस्तान को यह समझने की जरूरत है कि उसकी सबसे बड़ी लड़ाई उन आतंकी विचारधाराओं और संगठनों से है, जिन्होंने उसकी अपनी सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय साख को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है। यदि वह इस चुनौती का ईमानदारी से सामना करता है, तो इसका लाभ न सिर्फ उसे, बल्कि पूरी दुनिया को मिलेगा।